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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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वो रात भर नहीं आई...

Posted On: 16 Apr, 2010 Others में

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आज भाई जी ने मिलते ही दुआ-सलाम करने की बजाय पहला प्रश्‍न दागा – ‘आपकी रात कैसे कटी?’ अभी मैं कुछ बोलता, उससे पहले ही भाई जी ने अगला उत्तर प्रश्‍न दाग दिया था । क्‍योंकि इसमें उत्तर भी था और प्रश्‍न भी – ‘रात वो नहीं थी ना, जरूर परेशानी हुई होगी? नींद भी ठीक से नहीं ले पाए होंगें ।’

 

मुझे लग रहा था कहीं भाईजी मेरी जासूसी तो नहीं करने लगे हैं । इन्‍हें कैसे पता चला कि कल दोपहर ही मेरी पत्‍नी मायके गई है । मेरे चेहरे पर उभरते प्रश्‍न चिन्‍हों को अपनी मुस्‍कराहट के इरेजर से मिटाते हुए मैं भाईजी की ओर देखता हूँ । कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन उनकी भरी एके-47 फिर चल पड़ती है । ‘भई, मैं भी रात भर सो नहीं सका, अगर बता कर जाती तो पहले ही कोई व्‍यवस्‍था कर लेता । किसी के पास चला जाता ।’

 

मेरा गुस्‍सा बढ़ने लगा था । मैं भाई जी को शरीफ आदमी समझता था । उफ, ये तो लगता है…। मेरा मन उनकी बातों से उचाट होने लगा था । मैं उनसे पिंड छुड़ाने का उपाय ढूँढनें लगा था । सीधे-सीधे कहने में पता नहीं क्‍यों मेरी जबान साथ नहीं देना चाहती थी ।

 

‘अच्‍छा, आप बताइयें, आपकी रात कैसे कटी? रात भर जगे रहे या कोई और व्‍यवस्‍था की थी?’  भाईजी की राइफल आज पूरी तरह लोडिड थी और लगातार चल रही थी । सामने वाले का क्‍या हाल है, उन्‍हें इससे कोई मतलब नहीं था ।

 

‘इस गर्मी में, उसके बिना सोना बहुत कठिन है । पहले तो कम से कम रात में छत पर सो जाते थे । ताजी ठंडी बयार के झौंके में उसकी कमी, कभी नहीं खलती थी, लेकिन अब तो गर्मी ने ये हाल कर रखा है कि यदि कुछ मिनट के लिए भी चली जाए तो लगता है जीवन का अंत आ गया है । उम्र भी कुछ ऐसी हो गई है कि उसके बिना सब बेकार लगता है ।’

 

बिल्‍ली के भाग से छींका टूटा हैं । अखबार वाले को देख कर आवाज लगाने की बजाय मैं यह कहते हुए वहां से खिसक लेता हूँ कि मैं जरा आज का ‘जागरण’ लेकर आता हूँ । अखबार वाले के पीछे चलते हुए थोड़ा दूर निकल जाता हूँ । भाई जी की नजर बचा कर स्‍टेशन पर बने एक चाय के स्‍टाल की ओट में छिप जाता हूँ । वहीं से भाई जी पर नजर रखता हूँ । देखता हूँ, वे चुपचाप खड़े हैं । कभी जिधर से गाड़ी आने वाली है उधर, तो कभी मैं जिधर गया था उधर, देखने लगते हैं । कुछ बैचेन लग रहे हैं । लेकिन मेरा क्‍या ? ऐसे व्‍यक्ति से दोस्‍ती ठीक नहीं हैं । मेरा मन लेकिन ये माननें को तैयार नहीं हैं । भाईजी को रात काटनें के लिए व्‍यवस्‍था करनी पड़ती है, सोच कर ही घिन आने लगती है । पहले पता होता तो व्‍यवस्‍था कर लेते । किसी के पास चला जाता । कितना बेधड़क होकर कह रहे थे । लेकिन पहले तो कभी ऐसा बोलते नहीं सुना । लेकिन मैं इन्‍हें जानता भी कितने समय से हूँ ? एक महीना ही तो हुआ है । क्‍या पता …। मेरे विचारों को गाड़ी की सीटी विराम लगा देती है । गाड़ी प्‍लेटफार्म पर आ चुकी है । मुश्किल से दो मिनट रूकती है । मैं तेजी से लपकता हूँ और जनरल डब्‍बे में चढ़ जाता हूँ । भाई जी से बचने के लिए भीड़ में अपने को छुपाने की असफल कोशिश करता हूँ ।

 

लेकिन भाई जी पास आ जाते है । ‘अरे भाई ‘जागरण’ नहीं मिला क्‍या ? शायद रात में कोई बड़ा फॉल्‍ट होगा । तभी तो बिजली रात भर नहीं आई ।’

 

उनकी बात सुनकर सहसा मेरे चेहरे पर कुछ छिपाती सी मुस्‍कराहट उभर आई है । भाई जी कह रहे हैं – ‘आज आप कुछ बोल ही नहीं रहे हैं, कहीं रात भर बिजली ना होने से गूँगे तो नहीं हो गए हैं ।’ और जोर से ठठाहकर हँसने लगते हैं ।

अरविन्‍द पारीक



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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

subhash bhardwaj के द्वारा
10/06/2010

pareek ji apka blog padha. Kafi achchha likha hai. Is busy life or tension bhari life mein is tarah ke lakh kafi achchhe lagte hain. saara din kaam kaam or kaam. padh kar hansi bhi aaye aur aakhir tak ek suspense bhi bana raha aakhir kaun nahi aayi. thank you pareek ji aap ke is lekh ke liye. umeed karta hun is prakar ke lekh aage bhi padhne ko milnge. regards subhash.

    Arvind Pareek के द्वारा
    11/06/2010

    प्रिय सुभाष जी, एक पुरानी पोस्‍ट पर नई टिप्‍पणी पा कर मन प्रसन्‍न हो गया । आपका धन्‍यवाद अल्‍य पोस्‍ट को भी पढ़े और अपने विचारों से अवगत कराएं । अरविन्‍द पारीक

kmmishra के द्वारा
06/05/2010

बात पुरानी हो चुकी है पर उम्मीद करता हूं कि अब वह आ चुकी होंगी ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    07/05/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, ये बात तो कभी पुरानी नहीं होगी । हॉं उसका आना-जाना लगा रहता है । कभी दिन भर नहीं तो कभी रात भर नहीं और कभी दिन में या रात में कई कई बार गायब । खैर प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Shivendra Mohan Singh के द्वारा
05/05/2010

जमाना ही द्विअर्थी का चल रहा है, उसमे आपका ब्लॉग भी चार चाँद लगा रहा है …. हा हा हा हा … सुंदर है ब्लॉग आपका

    Arvind Pareek के द्वारा
    07/05/2010

    प्रिय श्री शिवेन्‍द्र मोहन सिंह जी, ब्‍लॉग को सुंदर बताने के लिए धन्‍यवाद ।  अरविन्‍द पारीक

Sday के द्वारा
19/04/2010

The Link not displayed, hence it is submitted again being in english.

Sday के द्वारा
19/04/2010

इसे कहते है ब्लॉलग । जो पढ़े बस मुस्क।राएं । इसलिए आपसे आज्ञा लिए बिना मैंनें आपका ब्लॉेग ब्लाएगवाणी में प्रस्तुेत कर दिया है । जिसका लिंक है – आप जब भी नया ब्लॉ ग लिखे इस पर क्लिक कर दें । इससे मुझे वह ब्लॉ>ग वाणी में दिख जाएगा । आशा है अपने प्रशंसक के लिए इतना अवश्यख करेंगें ।

mihirraj2000 के द्वारा
16/04/2010

maja aa gaya srimaan… kafi achchha likha hua aalekh. padh पढ़ कर मुस्कुराता रहा kafi der tak poora luft uthaya.. mihirraj2000.jagranjunction.com

    mihirraj2000 के द्वारा
    16/04/2010
    Arvind Pareek के द्वारा
    17/04/2010

    आप देर तक मुस्कराए, पढ़कर लगा मेहनत सफल हो गई । लेकिन टिप्पणी मिली जूली भाषा में देखी तो पता चला कि आपने केवल इस आलेख को ही पढ़ा हैं । काश, आपने ‘अंग्रेजी की बोर्ड से हिन्दी में टाईप करें भाग 1 व 2 भी पढ़ा होता व एमएस वर्ड में टाईप कर अपनी टिप्पणी यहां पेस्ट की होती तो मजा दूगना हो जाता । फिर भी आपकी टिप्पणी के लिए बार-बार धन्यवाद । अरविन्द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    17/04/2010

    आपकी टिप्पणी के लिए बार-बार धन्यवाद । अरविन्द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com


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