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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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काँटों को अलविदा कहनें का त्यौहार - Valentine Contest

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भाईजी एक हाथ में कोई उपहार और दूसरे में फूलों का गुलदस्‍ता लिए बड़ी तेजी से चले आ रहे थे। मेरे पास से इस तरह से निकलनें लगे गोया मुझे देखा ही नहीं है। कमाल है एक अच्‍छा-खासा छह फुट का इंसान उन्‍हें नजर नहीं आया। अब तो मुझे मेरे इंसान होने पर ही शक होने लगा था। इसलिए गला खँखार कर मैंनें उन्‍हें आवाज लगाई, “भाईजी सुनिए! कहाँ भागे जा रहे हैं?”

 

वे ठिठके जरूर लेकिन फिर आगे की और कदम बढ़ा दिए। मुझे लगा कि आखिर वे मुझे अनदेखा कैसे कर सकते हैं? इसलिए दुलकी चाल से दौड़तें हुए ठीक उनके बराबर में ही पहुँच गया और कंधे पर हाथ रख दिया, “तो आपकों भी वेलेन्‍टाइन का बुखार चढ़ गया है, वह भी इस उम्र में, अमां मियां कुछ तो अपने बालों का ख्‍याल कीजिए। माना की आपकों दीपक जोशी जी की दायरा कविता बहुत पसंद आई थी। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं की अपनें मित्रों से भी छुपाते फिरें। ये चश्‍मा ऐसे ही नहीं लगा रखा है इससे एक्‍सरे की तरह दिल के अंदर भी झाँक लेता हूँ, बताइये क्‍या छिपा रहे हैं? किस खुबसूरत नगीनें के लिए ये उपहार और ये बुके लिया है?”

 

भाईजी चुपचाप खड़ें मुझे घूर रहे थे। एक बार तो मैं घबरा ही गया कहीं इस तरह रोकनें पर झगड़ ना पड़ें, वैसे भी मुझसे भारी डील-डौल के हैं और जल्‍दी ही ताव खानें की आदत भी है। लेकिन सुना भाईजी कह रहे थे, “पारीक जी, यदि कोई शुभ काम के लिए जा रहा हों तो उसे पीछे से कभी भी आवाज नहीं लगानी चाहिए, लीजिए आपने मेरा काम बिगाड़ ही दिया। अपने एक्‍सरे वाले चश्‍में से देख लेते मुझसे क्‍यों पूछ रहे हैं?”

 

“भाईजी नाराज ना होइये, ये वेलेन्‍टाइन सप्‍ताह है तो मैं तो यही समझा कि आप भी इसी का शिकार हो गए हैं। आइए बैठतें है कुछ चाय-शाय लेते हैं। पीछे से लगाई आवाज का दोष भी मिट जाएगा और मुझे भी इस उपहार और बुके का रहस्‍य पता चल जाएगा।” मैंनें एस.के. स्‍वीट्स की और बढ़ते हुए कहा। भाईजी और कर भी क्‍या सकते थे। मेरे साथ हो लिए।

 

मैंनें दो चाय और समोसे का आर्डर दिया। तभी भाईजी बोले, “100 ग्राम जलेबी भी मंगा लीजिए।” भाईजी स्‍वयं मीठा मँगवानें को कह रहे हैं। अब तो मुझे पूरा यकीन हो गया था कि मामला कुछ संगीन है। लेकिन भाईजी यदि स्‍वयं बताएं तो मजा ही दूसरा होगा। अभी मैं यह सोच ही रहा था कि भाईजी बोले, “पारीक जी, असलियत यही है कि मैं वेलेटाइन मनानें ही निकला था।” इतना सुनते ही मुझे पक्‍का विश्‍वास हो गया कि भाईजी का आज एक नया चेहरा सामनें आ रहा है। “आपको पता है वेले टाइन का अर्थ क्‍या होता है?” भाईजी ने पूछा।

 

“हाँ- हाँ क्‍यों नहीं” मुझे अपनी विद्वता के प्रदर्शन का मौका मिल रहा था इसलिए मैंनें तत्‍काल कहा और साथ ही अर्थ भी बताया, “प्रेमिका, प्रेमी या प्रेम पत्र को वेलेन्‍टाइन कहते हैं और यदि आप वेलेन्‍टाइन डे कहेंगें तो यह 14 फरवरी का दिन है संत वेलेन्‍टाइन का जन्‍म दिन, या प्रेमी, प्रेमिका का दिन।”

 

“हाँ ये तो इसका वह अर्थ है जो सबको पता है, लेकिन इसका वास्‍तविक अर्थ हैं – अलविदा काँटों”।

 

“क्‍या?”

 

“जी हाँ पारीक जी, वेले का अर्थ है अलविदा और टाइन काँटें को कहते हैं इसलिए यह काँटों को अलविदा कहनें का समय है। इसलिए मैंनें सोचा कि मैं भी अपनी जिंदगी के काँटों को अलविदा कह दूँ।”

 

“आपकी जिंदगी के काँटें……” कह कर मैं सोचनें लगा तो ध्‍यान आया कि भाईजी के प्रत्‍येक कार्य में रोड़ा अटकानें वाले, उन्‍हें पल-पल परेशान करने वाले उनके एक साथी यहाँ रहते हैं। तो मुझे समझते देर नहीं लगी की अवश्‍य ही भाईजी उन्‍हें ही यह उपहार और बुके देने जा रहे हैं। लेकिन मन में एक संशय था कि क्‍या वे इसे स्‍वीकार करेंगें?

 

मैं भाईजी से कुछ कहता उससे पहले ही भाईजी बोले, “रामचरित उपाध्‍याय जी ने कहा है- ‘क्षमा से कमा लो गंवाए हुए को, क्षमा से हंसा लो रूलाए हुए को’ और कबीर जी ने कहा है, ‘छिमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्‍पात, कहा विष्‍णु को घट गयो, जो भृगु मारी लात’।”

 

“अच्‍छा तो इस वेलेन्‍टाइन सप्‍ताह में आपकों अपनें शत्रु के प्रति प्रेम उपजा है।” मैंनें पूछा।

 

“आप इसे कुछ भी मानिए, लेकिन मैं गांधीजी के वचनों को भूल नहीं सकता। उन्‍होने कहा था, ‘प्रेम हमें अपने पड़ोसी अथवा मित्र पर ही नहीं, अपितु जो हमारे शत्रु हैं उन पर भी रखना है’ और रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है, ‘प्रेमी की यह पहचान, परूषता को न जीभ पर लाते हैं, दुनिया देती है जहर, किन्‍तु वे सुधा छिड़कते जाते हैं’।”  कहते हुए भाईजी चलने लगें। तो मैंनें कहा, “अच्‍छा, तो अब भाईजी कविताएं पढ़नें लगे हैं”। भाईजी आगे बढ़ चुके थे, लेकिन वहीं से बोले, “प्‍लेटो ने कहा है, ‘प्रेम के स्‍पर्श से हर व्‍यक्ति कवि बन जाता है’।”

 

मैं भाईजी को दूर जाते देखता रहा और सोचने लगा कि क्‍या वास्‍तव में वेलेंटाइन का त्‍यौहार अपनी जिंदगी के काँटों को अलविदा कहनें का त्‍यौहार है?

 

- अरविन्‍द पारीक



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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajeev के द्वारा
16/02/2011

Very interesting meaning of Valentine! Goodone Keep it up.

K M Mishra के द्वारा
16/02/2011

पारीक जी प्रणाम । वैलेन्टाईन डे पर गांधीवाद, ये भाईयाजी भी दुनिया से एक कदम आगे की बात करते हैं । ऊपर से कबीर से लेकर प्लेटो तक सब एक सांस में फटकार दिये । मगर आज दुनिया को इसी की सबसे अधिक जरूरत है न कि 14 फरवरी के दिन नये लिव इन रिलेशन की नींव रखने की । अगर शत्रु पट जाता है तब तो वाकई कांटे दूर हो जायेंगे । वैलेन्टाईन का असली मतलब बताने के लिये और समझाने के लिये भी आप दोनों का आभारी हूं ।

Deepak Joshi के द्वारा
15/02/2011

प्रिय अरविंद जी, भई पहले तो वेलेंटाईन कॉटेस्‍ट में भाग लेने व वेलेंटाईन शब्‍द के विषय को समझाने के लिए बहुत सारी बधाई। भाईजी के ज्ञान भंडार से हमें भी कुछ ज्ञान प्राप्‍त हुआ – ‘क्षमा से कमा लो गंवाए हुए को, क्षमा से हंसा लो रूलाए हुए को’ । आप की नव प्रज्ञा भी बहुत ही सुन्‍दर कविता लगी। उस के लिए अलग से बधाई। दीपकजोशी63

Nikhil के द्वारा
12/02/2011

आदरणीय पारीक जी, भाई जी ने जो कहा उसने इस दिन की एक नयी व्याख्या दी. अपने लेखों से हमारा मार्गदर्शन करने के लिए आभार. निखिल झा

alkargupta1 के द्वारा
12/02/2011

श्री पारीकजी , सादर अभिवादन आपके इस सुन्दर से व उत्तम कोटि के विचारों से युक्त लेख पर कुछ भी कहने की सामर्थ्य नहीं है बस इतना ही कह सकती हूँ कि आपने इस ‘ valentine’ शब्द के एक अद्वितीय व व्यापक रूप को वर्णित कर दिया है जिसका हर व जीवन में अहम् महत्त्व है !

vinitashukla के द्वारा
12/02/2011

प्रेम की ये व्याख्या कुछ हटकर थी. अच्छी पोस्ट के लिए बधाई.

Ramesh bajpai के द्वारा
12/02/2011

आदरणीय श्री पारीक जी प्रेम की इस यथार्थ वास्तविकता को सलाम करने का मन कर रहा है | इतनी व्यापक परिभाषा के लिए भाई जी को भी बधाई | प्रेम का यह अंदाज आपसी भाईचारे व सामाजिक सदभाव के लिए पर्याप्त है | बधाई , हार्दिक मंगल कामनाये

rajkamal के द्वारा
11/02/2011

आदरणीय श्री पारिक जी ….सादर अभिवादन ! आज बहुत समय के अंतराल के बाद प्रिय भाई जी से मुलाक़ात हुई ….. लेकिन सिर्फ १०० ग्राम जलेबी , मन की आपको शुगर है लेकिन हम तो भजन भट्ट है ….. जब आप और हम मिलेंगे तो कम से कम आधा किलो का आर्डर दीजियेगा …. धन्यवाद सहित शुभकामनाये

HIMANSHU BHATT के द्वारा
11/02/2011

बहुत सुंदर व्याख्या की है आपने वैलेंटाइन डे की…… सुंदर लेख…..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
11/02/2011

क्‍या वास्‍तव में वेलेंटाइन का त्‍यौहार अपनी जिंदगी के काँटों को अलविदा कहनें का त्‍यौहार है? सार्थक प्रश्न ओर एक खूबसूरत लेख………. के लिए बधाई……..

वाहिद काशीवासी के द्वारा
11/02/2011

आदरणीय पारीक जी, आपके लेख के अंत में जो अनुत्तरित प्रश्न है उसने मेरा ध्यान सबसे अधिक आकृष्ट किया| बाकी मेरी इतनी हैसियत नहीं कि आपके लेख की समीक्षा कर सकूं. साभार,

आर.एन. शाही के द्वारा
11/02/2011

श्रद्धेय पारीक जी, आपका यह नया वैलेंटाइन-दर्शन है तो अज़ीब सा, परन्तु पेशानी पर बल डालते हुए सोचने पर मजबूर भी कर रहा है । इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि जीवन रूपी दरिया में बढ़ती कश्ती का सामना धार से गुजरते समय विभिन्न प्रकार के कंटक युक्त शैवाल और कुंभियों से होता ही है, जिन्हें झटके बिना ज़िन्दगी उन्हीं में उलझकर अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाती है । हमें भाईजी का शुक्रग़ुज़ार होना चाहिये, जिन्होंने इतना मूल्यवान मंत्र आपके माध्यम से हम तक पहुंचाया । आप और भाईजी को हार्दिक बधाइयां । उन्हें मेरा कृतज्ञ नमस्कार अवश्य कहियेगा ।

roshni के द्वारा
11/02/2011

पारीक जी नमस्कार , वेलेंटाइन का ये नया अर्थ बहुत ही खुबसूरत है ……..

11/02/2011

पारीक जी नमस्कार, बड़े दिनों बाद आपका लेख पढ़ने को मिला, वेलेंटाइन का एक नया और खूबसूरत अर्थ सामने लाने के लिए…बधाई.

Bhagwan Babu के द्वारा
11/02/2011

आपके भाईजी कही आपको तो कॉटा नही समझ लिये थे खैर बहुत ही बढिया लेख लिखते है आप बहुत अच्छी कला है आपमे शुभकामनाएँ http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2011/02/10/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-valentine-contest/#comment-1155

chaatak के द्वारा
11/02/2011

स्नेही श्री अरविन्द जी, सादर अभिवादन, वेले टाइन का सही अर्थ भाई जी से जानकर अच्छा लगा| कितना अच्छा होता की हम इस दिन भोंडे प्रेम के प्रदर्शन की जगह जीवन से कांटे निकाल कर दुनिया को ही प्रेम और स्नेह से भर पाते| शुभकामनाएं!

omprakash pareek के द्वारा
11/02/2011

अरविन्दजी, भाईजी कमाल के खालिश हिन्दुस्तानी जीव है. कोई मिलावट नहीं. अब देखिये न की वो ही मेरी बात समझ पाएंगे की यहाँ राधा कृष्ण का अमर प्रेम है , बाजबहादुर रानी रूपमती की प्रेम गाथा है, सलीम-अनारकली का प्यार है और ऐसी ही अनेकों प्रेम कथाएं चप्पे-चप्पे में इस धरती पर बिखरी है फिर भला हमारे जवां दिलों को valentyne डे ही मनाने की जुगत कहाँ से आई. शायद आप के ‘भाईजी” बता पायें. फिलहाल आपका व्यंग्य लेखन बहुत ऊंचे दर्जे का है और इसे प्रकाशित होना चाहिए.oppareek43

R K KHURANA के द्वारा
11/02/2011

प्रिय अरविन्द जी, बहुत ही सुंदर ढंग से आपने वेलेन्‍टाइन डे को परिभाषित किया है ! हास्य का पुट लिए आपका यह लेख बहुत ही सुंदर बन पड़ा है ! एक बार फिर आपने “भाई जी” के माध्यम से सुंदर लेख पढने का मौका हमें दिया ! बधाई आर के खुराना

Aakash Tiwaari के द्वारा
11/02/2011

श्री अरविन्द जी, “प्‍लेटो ने कहा है, ‘प्रेम के स्‍पर्श से हर व्‍यक्ति कवि बन जाता है’।” ये बात मुझे बिलकुल सत्य लगती है….काँटों को निकालने का ही तो त्यौहार है मगर जो अपने प्रेम में उपज रहे हो,…..एक दिन तो छोड़ दीजिये प्रेमी जोड़े के लिए…बाकी दिन दुश्मनों का भी ख्याल कर लेंगे…. http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

deepak pandey के द्वारा
11/02/2011

पारीक जी, व्यंग्य की एक अपनी भाषा होती है, और असरदार भी. आपका ये लेख कितने सन्देश छुपाये हुए है . सार्थक रचना के लिए बधाई..

allrounder के द्वारा
11/02/2011

अरविन्द जी, नमस्कार आपके लेख पर बस इतना ही कह सकता हूँ, क्यों करें हम बातें काँटों की भला जब चमन मैं हर तरफ गुलाब खिले हैं ” एक अच्छे लेख पर बधाई, और प्रतियोगिता के लिए शुभकामनायें !


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