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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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स्‍...स...साली वेश्‍या, स्‍पॉट-न्‍यूज, आज का सच

Posted On: 30 Nov, 2010 Others में

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‘स्‍…स…साली वेश्‍या’

 

इस अंधेरे मोड़ पर आकर सभी ठिठक जाते हैं, थोड़ा रूकते हैं; फिर आगे बढ़ जाते हैं।

 

यहाँ फूटपाथ पर बैठी, चिथड़ों में लिपटी गाडि़या लूहार परिवार की एक लड़की लोहे के एक टूकड़े को कोई आकृति देने का प्रयत्‍न कर रही है। किन्‍तु हिलने से उसके चिथड़ों से झॉंकतें अंग-प्रत्‍यंग धधकती अग्नि के प्रकाश में चमक उठते हैं। यही रहस्‍य है, प्रत्‍येक राहगीर के ठिठकनें का।

 

 

वे भी इधर ही आ रहे हैं। इस मोड़ पर पहूँचते हैं और ठिठक कर रूक जाते हैं। चोर नजरों से इधर-उधर देखते हैं। जेब में हाथ डाल कर कुछ निकालते हैं और उस लड़की की तरफ भद्दे इशारे करते हैं।

 

 

अनायास ही मैं सामनें आ जाता हूँ। वे घबरा जाते हैं, इस तरह पकड़े जाने पर। फिर हँसनें का प्रयास करते हुए लड़की की तरफ इशारा करते हैं और कहते हैं- ‘स्‍…स…साली वेश्‍या।’ और तेजी से आगे बढ़ जाते हैं। मैं ठगा-सा उन्‍हें जाते देखता रहता हूँ।

 

ये इस क्षेत्र में कार्यरत ‘नारी संरक्षा व कल्‍याण समिति’ के प्रधान हैं।

 

**********

 

‘स्‍पॉट-न्‍यूज’

 

रात्रि का समय है। मैं शहर के सबसे बड़े समाचार-पत्र के कार्यालय के सामनें से गुजर रहा हूँ। वहाँ लगे ‘स्‍पॉट-न्‍यूज’ के बोर्ड पर अनायास ही मेरी निगाह चली जाती है।

 

 

मेरी ऑंखें स्थिर हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानों सारा शहर ही रूक गया है। चारों ओर जैसे शॉंति छा गई है। मैं स्‍तब्‍ध-सा खड़ा हूँ। सोचता हूँ – क्‍या ऐसा भी हो सकता है?

 

‘स्‍पॉट-न्‍यूज’ के बोर्ड पर समाचार लिखा था – ‘आज एक भी नव-विवाहिता नहीं मरी’।

 

**********

 

‘आज का सच’

 

वह भीड़ से निकला और खुला छूरा लिए गॉंधी जी की प्रतिमा के निकट पहूँच गया था। उसने गॉंधी जी की प्रतिमा की छाती पर एक पोस्‍टर चिपकाया था और ठीक उसके बीच छूरा घोंप कर भीड़ में ओझल हो गया था। चौराहें पर खड़ें पुलिस वाले उसके पीछे भागे। लेकिन वह उनकी नजरों से कहीं दूर निकल चुका था।

 

यह सबनें देखा था। पुलिस वाले हारे हुए से लौट रहे थे। चौराहें पर खड़ी भीड़ भी जैसे सोते-से जागी थी। सबनें एक साथ एक स्‍वर से पढ़ा, पोस्‍टर पर लिखा था – आज का सच।

**********

 

ये लघुकथाएं मैंनें आज से लगभग 28 वर्ष पूर्व लिखी थी। लेकिन लगा कि आज भी प्रासंगिक है तो क्‍यों ना इन्‍हें आपके साथ बॉंटा जाए। आपकी प्रतिक्रियाएं ही बताएंगी कि ये आपकों कैसी लगी ।

अरविन्‍द पारीक

 



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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

JLSINGH के द्वारा
11/04/2011

मन को झकझोड़ती लघुकथाये!

omprakash pareek के द्वारा
13/01/2011

अरविन्दजी भाईजी वाकई ग्रेट हैं. अमेरिका में एक लेखक हुए थे जिनका नाम Dos Passos है उन्हों ने भी अमरीकी समाज की विसंगतियों पर छोटी-छोटी laghu kathaon पर adharit vishal granth likhe jo kafi lokpriy rahe us jamane me. main kamna karoonga की aap भी aisa एक sankalan prakashit karen jisme in samajik विसंगतियों पर dilchsap kissagoi भी ho aur log sabak le. . Yaane deekhan में छोटी lage पर ghav kare gambhir.

kailash nautiyal के द्वारा
31/12/2010

Pyare Bhaiji 28 saal kya aap ke haath aur kalam mein maa sarswati virajman hai. kaka ka aashirwad aapke saath hai. lage raho kailash nautiyal

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    03/01/2011

    आदरणीय श्री नौटियाल जी, काका जी का आर्शीवाद पाकर मैं धन्‍य हुआ। मेरा प्रयास रहेगा कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सकूँ। शुभकामनाओं के लिए आभारी हूँ। अरविन्‍द पारीक

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
19/12/2010

आदरणीय पारिक जी ………….. आपकी इस खबर ‘स्‍पॉट-न्‍यूज’ के बोर्ड पर समाचार लिखा था – ‘आज एक भी नव-विवाहिता नहीं मरी’। को आज इस तरह से लिखा जाता की ‘स्‍पॉट-न्‍यूज’ के बोर्ड पर समाचार लिखा था – ‘आज केवल एक ही नव-विवाहिता मरी’।

    Arvind Pareek के द्वारा
    30/12/2010

    प्रिय श्री पियुष पंत जी, समाचार कैसे भी लिखा जाए बात लोगों के दिलों तक पहूँचनी चाहिए। आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। देर से प्रत्‍युतर देने के लिए क्षमा चाहता हूँ। अरविन्‍द पारीक

R. P. Prasad के द्वारा
09/12/2010

प्रिय पारिक जी, क्या बात है अब तो सब आसान है सर जी। कोई घबराने वाली बात ही नही है। मैं 10 मिनट में सब कुछ सीख गया। धन्यवाद।

    Arvind Pareek के द्वारा
    30/12/2010

    प्रिय श्री राम प्रवेश जी, यह जानकार अच्‍छा लगा कि आपको हिन्‍दी में टाईप करना अच्‍छा लगा । चलिए मेरा प्रयास सार्थक तो हुआ। आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

R. P. Prasad के द्वारा
09/12/2010

प्रिय अरंविद पारिक जी, मै तो अपना हौसळा खो दिया था। ळेकिन इन तीनो लेख को पढ.कऱ मेरा हौसला जाग उठा। अब मेरी हाथों मै नई जान सी आ गई है। मुझे एक नया कलम मिल गया है। पारिक सर, आपने जो काम किया है वह इस देश की राजभाषा को खुब आगे बढ़ाएगा और एक नई उचाईं देगा। आप हमारे देश की राजभाषा को बढ़ाने में दिल से प्रयास कर रहे है। इतना बड़ी समस्या थी की मैं पिछले एक वर्ष से इसको सीखना चाहता था। आप इसे कुछ भी कह दो लेकिन यह राजभाषा के विकास के लिए एक अदना सा प्रयास नहीं है परन्तु बहुत ही मेहनती प्रयास है। आप वाकई में बधाई के पात्र है, और ईश्वर से प्रार्थना करते है की वे आपके हौसले का और उचाँई दे ताकि सभी भारतवासी आप पर गर्व करें। इन चीजों से जो बात उभर कर आती है वह यह है कि आप सच्चे दिल से राजभाषा को आगे बढ़ाने के लिए अटूट परिश्रम करते है। मैं आपकी इस जानकारी के लिए बहुत आभारी हैं। बड़ा उपयोगी बात आपने बताई है। अब मुझे एक जानकारी चाहिए कि मैं जब मैं एम. एस. बोर्ड पर इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर टाइप करता हूँ उदाहरण के लिए (मुझे ६८५ कि. मी. चलना है।) इसमे ६८५ को मैं 685 (रोमन अंक) इस तरह से लिखना चाहता हूँ। और मैं रनिंग टाइप करते हुए इनस्कृप्ट की-बो़र्ड से 685 लिखना चाहता हूँ। जबकि मुझे बार-बार रोमन अंक लाने के लिए टाँस्क बार पर जाकर इगलिश का EN सलेक्ट करना पड़ता है। कृप्या मुझे इसके लिए कोई सार्ट-की कोई हो तो बताएं। एक बात मै इस संदर्भ में बताना चाहता हूँ की यही समस्या गुगल ट्रास-लिटेरेशन पर आँन लाईन आता है, तो वहाँ पर CTRL + G दबाने से रोमन अंक आना शुरू हो जाता है। जबकि एम. एस. वर्ड में ट्रास-लिटेरेशन की-बोर्ड सलेक्ट करने पर टाइप करते समय रोमन अंक तो अपने आप आना शुरू हो जाता है। परन्तु इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर अगर अंक टाइप करता हूँ तो वह हिन्दी में अंक आता है। जैसें कि ४४५२४, तो मुझे लगातार टाईप करते हुए 44524 चाहिए। कृप्या समस्या का सामाधान करें। आभारी राम प्रवेश, आणंद, गुजरात। चुकिं यह कमेंट आपके अंग्रेजी की बोर्ड से हिन्दी में टाईप करें – 3, कुछ सवाल कुछ समाधान के बाँक्स में नहीं ले रहा था, इस वजह से मैं अपना कमैंट इस बाक्स में छोड़ रहा हूँ। क्षमा करिएगा।

R. P. Prasad, Inspector के द्वारा
08/12/2010

मै तो अपना हौसळा खो दिया था। ळेकिन इन तीनो लेख को पढ.कऱ मेरा हौसला जाग उठा। अब मेरी हाथों मै नई जान सी आ गई है। मुझे एक नया कलम मिल गया है। पारिख सर, आपने जो काम किया है वह इस देश की राजभाषा को खुब आगे बढ़ाएगा और एक नई उचाईं देगा। आप हमारे देश की राजभाषा को बढ़ाने में दिल से प्रयास कर रहे है। इतना बड़ी समस्या थी की मैं पिछले एक वर्ष से इसको सीखना चाहता था। आप इसे कुछ भी कह दो लेकिन यह राजभाषा के विकास के लिए एक अदना सा प्रयास नहीं है परन्तु बहुत ही मेहनती प्रयास है। आप वाकई में बधाई के पात्र है, और ईश्वर से प्रार्थना करते है की वे आपके हौसले का और उचाँई दे ताकि सभी भारतवासी आप पर गर्व करें। इन चीजों से जो बात उभर कर आती है वह यह है कि आप सच्चे दिल से राजभाषा को आगे बढ़ाने के लिए अटूट परिश्रम करते है। मैं आपकी इस जानकारी के लिए बहुत आभारी हैं। बड़ा उपयोगी बात आपने बताई है। अब मुझे एक जानकारी चाहिए कि मैं जब मैं एम. एस. बोर्ड पर इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर टाइप करता हूँ उदाहरण के लिए (मुझे ६८५ कि. मी. चलना है।) इसमे ६८५ को मैं 685 (रोमन अंक) इस तरह से लिखना चाहता हूँ। और मैं रनिंग टाइप करते हुए इनस्कृप्ट की-बो़र्ड से 685 लिखना चाहता हूँ। जबकि मुझे बार-बार रोमन अंक लाने के लिए टाँस्क बार पर जाकर इगलिश का EN सलेक्ट करना पड़ता है। कृप्या मुझे इसके लिए कोई सार्ट-की कोई हो तो बताएं। एक बात मै इस संदर्भ में बताना चाहता हूँ की यही समस्या गुगल ट्रास-लिटेरेशन पर आँन लाईन आता है, तो वहाँ पर CTRL + G दबाने से रोमन अंक आना शुरू हो जाता है। जबकि एम. एस. वर्ड में ट्रास-लिटेरेशन की-बोर्ड सलेक्ट करने पर टाइप करते समय रोमन अंक तो अपने आप आना शुरू हो जाता है। परन्तु इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर अगर अंक टाइप करता हूँ तो वह हिन्दी में अंक आता है। जैसें कि ४४५२४, तो मुझे लगातार टाईप करते हुए 44524 चाहिए। कृप्या समस्या का सामाधान करें। आभारी राम प्रवेश, आणंद, गुजरात। चुकिं यह कमेंट आपके अंग्रेजी की बोर्ड से हिन्दी में टाईप करें – 3, कुछ सवाल कुछ समाधान के बाँक्स में नहीं ले रहा था, इस वजह से मैं अपना कमैंट इस बाक्स में छोड़ रहा हूँ। क्षमा करिएगा।

    Arvind Pareek के द्वारा
    09/12/2010

    प्रिय श्री राम प्रवेश जी, सर्वप्रथम तो आपका धन्य्वाद की आपनें मुझे आणंद जाकर भी याद रखा और दूसरा धन्यकवाद इसलिए कि आपनें मेरी प्रशंसा करते हुए इतने शब्दा हिन्दी में लिखें । प्रशंसा के लिए भी आभारी हूँ । मुझे यह जानकर अत्य धिक प्रसन्नएता है कि आपनें अभी भी हिन्दी में लिखना नहीं छोड़ा है । इसके लिए आप भी बधाई के पात्र हैं । अब बात आपकी समस्याै की । जब आप हिन्दीै इन्सिक्रिप्ट की बोर्ड से टाईप कर रहे हों और अंतरराष्ट्री य अंको का प्रयोग करना चाहते हो तो इसके लिए आप को केवल लेफट अल्टि की के साथ शिफ्ट की (Left Alt के साथ shift) दबानी होगी । तब इससे भाषा परिवर्तित होकर आपकी डिफॉल्टव भाषा अंग्रेजी हो जाएगी । आप पुन: अंतरराष्ट्री य अंको को टंकित करने के बाद पिछली भाषा पर लौटने के लिए यही की फिर एक साथ दबाएं तथा हिन्दीी इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड से टाईप करना प्रारंभ कर दें । मेरे विचार से इससे आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा । कृपया अन्य लेख भी पढ़ें व टिप्पएणी देंगें तो मुझे हार्दिक प्रसन्न्ता होगी व यह भी चाहूँगा कि कृपया इस ब्लॉंग को नियमित रूप से पढ़तें रहे व अपने विचारों से अवगत कराते रहें । एक बार फिर धन्येवाद । अरविन्दर पारीक

rajkamal के द्वारा
02/12/2010

उनके अल्फाज़ खत्म होने पर ही हम आ पाए है …. होठ अपना काम कर चुके है मगर निगाहों का काम अभी भी बाकि है ,

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/12/2010

    प्रिय श्री राजकमल जी, होठों से आपनें उचित ही काम लिया होगा अब निगाहों का भी उचित प्रयोग कीजिएगा। थोड़ी-सी चूक सोच की असलियत को सामनें ले आती है। आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। अरविन्द पारीक

syeds के द्वारा
01/12/2010

अरविन्द जी, न सिर्फ आज यह के हालात में प्रसांगिक हैं बल्कि स्थिति २८ वर्ष पहले कि तुलना में और भी खराब हुयी है. http://syeds.jagranjunction.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय श्री सईद जी, आपका कहना सत्‍य है व अभी तक की सभी टिप्‍पणियों में यही कहा गया है । इसलिए मैं क्षमा चाहते हुए आदरणीय श्री एस.पी. सिंह जी को दिए गए जबाव को ही दोहरा रहा हूँ क्‍योंकि कुछ नया कहने के लिए अब बचा ही नहीं है – 28 वर्ष पूरानी बाते यदि आज प्रासंगिक है तो उसके लिए दोषी हमीं हैं । हमनें अपनी नैतिकता को सुधारनें की कभी कोशिश ही नहीं की है अपितु उसे बद से बदतर कर रहे हैं । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

s.p.singh के द्वारा
01/12/2010

भैया जी लगता है समय ठहर गया हो जो चीज २८ वर्ष पहले प्रसांगिक थी आज भी उतनी ही फ्रेश ही लगती है —- एस.पी.सिंह

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    आदरणीय श्री एस.पी. सिंह जी, 28 वर्ष पूरानी बाते यदि आज प्रासंगिक है तो उसके लिए दोषी हमीं हैं । हमनें अपनी नैतिकता को सुधारनें की कभी कोशिश ही नहीं की है अपितु उसे बद से बदतर कर रहे हैं । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
30/11/2010

प्रिय अरविंद जी, प्रणाम, भई कहते है लेखक एवं कवि बहुत दूर तक देख सकता है, आप के कहे अनुसार जो लघु कथाएं आप ने 28 साल पहले लिखी थी वह आज भी ताजा ही लगती है क्‍योंकि हमारा समाज और हम तो वहीं है। कुछ भी नहीं बदला। सब कुछ आज ही व्‍यतीत होता लगा। -दीपकजोशी63

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय जोशी जी, बदला तो बहुत कुछ है आपके काले बाल सफेद हुए और उड़ गए। मेरे बालों ने भी साथ छोड़ना जारी रखा है। दिल्‍ली ही नहीं पूरे भारत का रंग रूप भी बदल गया व बदल रहा है । बस ये कह सकते हैं कि मानसिकता नहीं बदली है व जस की तस है । इसी कारण सब कुछ आज ही व्‍यतीत होता लग रहा है । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद ।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
30/11/2010

भाई जी को प्रणाम …. मैंने तो भाई जी को कबी ऐसे तेवरों में नहीं देखा था ..यकीं मानिए हर एक पंक्ति आज भी प्रासंगिक है……ये लघु कथाये बहुत कुछ समेटे हुए है….

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय श्री निखिल पांडेय जी, भाईजी भी मनुष्‍य ही हैं इसलिए उनके पास हर तरह के तेवर हैं बस आगे-आगे देखिय होता है क्‍या। आपको लघु कथाये पसंद आई बहुत बहुत धन्‍यवाद । प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ, धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Aakash Tiwaari के द्वारा
30/11/2010

श्री अरविन्द जी, लघु कथा जरूर है मगर बहुत विशाल विचारों को समेटे हुए है…. आज भी ताज़ी है….. आकाश तिवारी

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय श्री आकाश तिवारी जी, सराहना व प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । इनकी प्रासंगिकता तो लगता है सदैव बनी रहेगी । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा
30/11/2010

बिलकुल अरविन्द जी, ये अज भी प्रासंगिक हैं और दर्शाती हैं कि इन २८ वर्षों में हमारा कितना सांस्कृतिक विकास हुआ है.

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    ऐ अनाम बंधु मैं आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपकों धन्‍यवाद देता हूँ और अपेक्षा करता हूँ कि आप भविष्‍य में अपना कुछ नाम अवश्‍य लिखेंगें भले ही वह छदम् हो ताकि आपकों सम्‍बोधित किया जा सके । अरविन्‍द पारीक

K M Mishra के द्वारा
30/11/2010

पारिक जी नमस्कार । ये दर्शाता है कि पिछले 28 साल में हमारी सोच में कोयी सुधार नहीं हुआ है, गंदी तो खैर थी है और भविष्य में और गंदी ही होगी ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय श्री के.एम मिश्रा जी, आपका कहना भी बिलकुल सही है हम कल जैसे थे आज उससे भी बदतर हो गए हैं। तथापि चातक जी की कामना की पूर्ति के लिए आमीन तो कह ही सकते हैं । आपका आभार व प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

priyasingh के द्वारा
30/11/2010

jeevan ki kadvi sachhai jo aaj bhi utni hi praasangik hai…………..bahut achhi laghukathaye… translation server lagta hai kaam nahi kar rha …..

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    सुश्री प्रिया सिंह जी, आपनें लघु कथाओं को अच्‍छा बताया व पसंद किया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ । बहुत बहुत धन्‍यवाद । आप सर्वर के काम न करने की समस्‍या से छ़ुटकारा पा सकती है यदि आप मेरे आलेख अंग्रेजी की बोर्ड से हिन्‍दी में टाईप करें के तीनो भाग पढ़े व तदनुसार साफ्टवेयर इंस्‍टाल करले तो। या फिर इस संबंध में ही लिखा हुई राजकमल जी की पोस्‍ट भी पढ़ सकती हैं । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
30/11/2010

स्नेही श्री पारीक जी, २८ वर्षों में पूरी एक पीढ़ी जवान से बुजुर्ग जो गई, दूसरी बचपन छोड़ जवानी के गीत गाने लगी लेकिन व्यवस्था की मशीन में किसी ने तेल ना डाला सो अपनी जगह पर ही जस की तस बनी रही| आपकी इन संवेदनाओं पर मरहम तो नहीं लगा लेकिन अब उनके नासूर बनने का दर्द जरूर साल रहा होगा| आप भी तो न बदल सके, २८ वर्ष पहले भी आप आम आदमी थे और आज भी आम आदमी ही हैं| बशर्ते आम पहले आपकी पहुँच में थे आज आपकी पहुँच के बाहर हो गए| ये हमारी स्वाधीनता के फल है पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं बस पैकिंग बदल रही है, इसका रस आज भी आम आदमी के लिए कसैला ही है| सभी लघु-कथाएँ अच्छी हैं और समीचीन भी| काश कि आने वाले दिनों में ये सिर्फ कहानियाँ ही रह जाएँ! आमीन!

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    स्‍नेही व सर्वप्रिय श्री चातक जी, आपकी उत्‍साह बढ़ाती व सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए मैं आभारी हूँ । वास्‍तव में आज आम तो क्‍या कुछ भी हमारी पहुँच में कहां रहा है । समय ने बहुत कुछ बदला भी है लेकिन मानसिकता नहीं बदल सका । शायद समय मनुष्‍य नाम के प्राणी के मन-मस्तिष्‍क को प्रभावित नहीं कर सकता । लघु कथाओं को आपने पसंद किया उसके लिए आभारी हूँ । मैं भी यही चाहूँगा कि ये मात्र कहानियां ही रह जाएं और आपके साथ कहूँगा आमीन । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

ashutoshda के द्वारा
30/11/2010

२८ सालों बाद भी समाज में कोई परिवर्तन नहीं ताज्जुब है आशुतोष दा

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    आदरणीय आशुतोष दा, अब तो आश्‍चर्य समाज तब बदलेगा तब होगा । क्‍योंकि बदलनें की उम्‍मीद कहीं दूर तक भी नजर नहीं आती । हॉं और बिगड़ना संभव है । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

rkpandey के द्वारा
30/11/2010

आदरणीय पारीक जी, समाज का सच यही है. दिन के उजाले में साफ-साफ कपड़े पहने लोग हकीकत में कितने भेड़िए हैं इसका पता जब चलता है तो फिर दिल कचोट उठता है. बहुत अच्छी पोस्ट.

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    आदरणीय पांडेय जी, निस्‍:संदेह दिल तो तब और कचोट रहा है जब ये रचनाएं आज भी अपना अर्थ कायम रखे हुए है । ना जानें हम कब सुधरेंगें । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

abodhbaalak के द्वारा
30/11/2010

पारीक जी मै आपके आजके लेखों को देख कर विस्मित होता था पर आज आपके २८ साल पहले लिखे लेख ने तो …….. उस समय भी आपकी सोच परिपक्व थी और लेखनी, शब्द नहीं हैं ….. और क्या कहूं. और शायद यही कारण हैं की आप उन लेखकों में से हैं जिन की अगली रचना की प्रतीछा सदा रही है http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय श्री अबोध जी, मैं आपकी प्रशंसा के आगे नतमस्‍तक हूँ ।…… क्‍या कहूँ ….. क्‍या लिखूँ …… शब्‍द विहीन हो गया हूँ । तथापि आपका आभार तो व्‍यक्‍त कर ही सकता हूँ । शुक्रिया, धन्‍यवाद । आप कभी निराश ना हो यही प्रयास रहेगा । पुन: धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

roshni के द्वारा
30/11/2010

पारीक जी नमस्कार आज के हर वर्ग के सच को बयाँ करती ये लघुकथाएं लघु हो कर भी बहुत बड़ी है अर्थ में ………. बहुत बढ़िया

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    सुश्री रोशनी जी, आपनें इन लघु कथाओं को पसंद किया व सराहना की उसके लिए आपका आभारी हूँ । बहुत बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

nishamittal के द्वारा
30/11/2010

समाज के यथार्थ पर प्रकाश डालता आपका आलेख .कथनी करनी का अंतर.नारी समिति के प्रधानों की यही वास्तविकता है.

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    सुश्री निशा मित्तल जी, ये तो बस समाज के यथार्थ को बयां करने का एक प्रयास भर है। इस देश में नारी समितियों के ही नहीं अन्‍य अनेक संस्‍थानों के प्रधान ऐसे भुखे भेडि़ये ही हैं। आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक 

आर. एन. शाही के द्वारा
30/11/2010

श्रद्धेय पारीक जी, ये सभी सच हमेशा सच ही रहेंगे । जिन कपड़ों से ग़रीबी झांकती है, उसे सुलभ शौचालय से अधिक महत्व कभी भी प्राप्त नहीं हुआ, परन्तु फ़ारिग होने के लिये लोग लाइन तो लगाते ही हैं । हर एक हज़ार में एक विवाह दहेज़ के लिये विवादास्पद बनता है, फ़िर भी अगर किसी दिन कोई नवविवाहिता नहीं मरी, तो घोर आश्चर्य होना भी स्वाभाविक है । हम तो थानों में दर्ज़ मामलों के आधार पर तैयार आंकड़ों को ही देखने के अभ्यस्त हैं, जबकि असल मौतों का आंकड़ा उससे कई गुना अधिक है । रही राष्ट्रपिता को छुरा घोंपने की बात, तो उस नौजवान ने फ़िर भी नैतिकता दिखाते हुए सीने में खंज़र घोंप कर सच दिखाया, यहां तो रोज़ उन्हीं के अनुयायी नित्यप्रति उनका नाम जप-जप के पीठ में छुरा घोंपे जा रहे हैं । अच्छे प्रस्तुतिकरण के लिये बधाई ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    आदरणीय श्री शाही जी, आपने जिस तरह से इन तीनों लघु कथाओं का विश्‍लेषण कर अपनी प्रतिक्रिया दी है उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ । आपने तीनों लघु कथाओं का मान बढ़ा दिया है । बधाई व प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Rashid के द्वारा
30/11/2010

वास्तविकता बयान करता एक शानदार लेख !!

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय भाई राशिद जी, आपने इन लघु कथाओं को लेख के रूप में शानदार बताया उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

div81 के द्वारा
30/11/2010

२८ साल पहले लिखा गया सच | बहुत अच्छी लघुकथाएं

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    सुश्री दिव्‍या जी, लघु कथाओं की प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

allrounder के द्वारा
30/11/2010

अरविन्द जी, २८ वर्ष पूर्व लिखी आपकी ये लघु कथाएं आज भी तार्किक हैं !

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    प्रिय श्री सचिन देव जी, मुझे तो ऐसा लग रहा है कि ये सदैव ही तार्किक रहेंगी । क्‍योंकि शायद यह हमारे खुन में ही है कि हम नहीं सुधरेंगें। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
30/11/2010

प्रिय अरविन्द जी, सशक्त लघु कथाएं ! पहली बार आपकी लघु कथा पढ़ी ! अच्छा लगा ! राम कृष्ण खुराना

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/12/2010

    आदरणीय श्री खुराना जी, ये लघु कथाएं आपको अच्‍छी लगी । लग रहा है कि मेरा लिखना सार्थक हो गया है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ, धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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