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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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ये शहर बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे.....

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भाईजी बोले, ‘पारीक जी, किसी भ्रष्‍ट आचरण से किसकी छवि ज्‍यादा खराब होती है? स्‍वयं उस भ्रष्‍ट नेता/व्‍यक्ति की, या उसकी पार्टी/ऑफिस की या उस मकान/दूकान/घर/बंगले की या उस राज्‍य या देश की जहां वह रहता है, बताइयें किसकी छवि खराब होगी?’

 

‘अरे भाईजी, और किसकी खराब होगी स्‍वयं उस व्‍यक्ति की या फिर नेता है तो उसकी पार्टी की भी’ मैंनें जबाव दिया ।

‘अमां आप भी कमाल करते हैं आपने नए मुख्‍यमंत्री श्रीमान् पृथ्‍वीराज चव्‍हाण का बयान नहीं पढ़ा । वे कह रहे थे कि आदर्श घोटाले से मुम्‍बई दागदार हुई है, मुम्‍बई की छवि खराब हुई है। कुछ समझे इससे आप?’ भाईजी ने पुछा ।

 

’जी हां। बहुत कुछ तो समझ में आ गया है, कि यह एक ‘आदर्श घोटाला’ है, जिसका सभी घोटालेबाजों को अनुसरण करना चाहिए, लेकिन आप ज्‍यादा समझदार है आप ही खुलकर बताइये?’ मैंनें भाईजी की राय जाननें के लिए कहा ।

 

‘भाईसाहब आप इसे ‘आदर्श घोटाला’ समझ रहे हैं और हमें तो यह समझ आया कि आप घोटालें करिये, भ्रष्‍टाचार करिये। इससे आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा। बदनाम होगा तो केवल आपका शहर। अरे ज्‍यादा बदनाम हो जाए तो शहर ही बदल दीजिये। आप तो साफ सुथरे रहेंगें। कालिख पुती तो शहर के चेहरे पर। आपका क्‍या? शहर से ज्‍यादा ही लगाव है तो चार-पॉंच साल बाद लौट आइए, लोगों की याददाश्‍त बहुत कमजोर होती है। कहिये है ना पते की बात?’ भाईजी ने फिर प्रश्‍न दाग दिया था। लेकिन मैं जानता था अभी उनकी बात पूरी नहीं हुई हैं। उनके मन में अभी कुछ और भी है। इसलिए केवल गर्दन हॉं में हिलानें की जहमत करता हूँ।

 

भाईजी फिर बोलनें लगते हैं, ‘भला हो कलमाड़ी जी, महेंद्रू जी और दरबारी जी का उन्‍होनें लगे हाथों दो-दो राजधानियों को बदनाम कर डाला। लंदन और दिल्‍ली। कितना अच्‍छा काम किया। इन अंग्रेजों को भी पता चलेगा कि हम केवल अपनें देश में ही कालिख नहीं पूतवातें, हम तो विदेशों तक कालिख पूतवा सकते हैं। अरे आप राजा साहब को लीजिए बेचारे ना जानें कब से भारत देश के चेहरें पर कालिख पूतवा रहे थे। लेकिन अब जाकर सरकार की नींद टूटी और सरकार ने उनके इस कृत्‍य को सम्‍मान देने के लिए उनका इस्‍तीफा मंजूर किया। तो क्‍यों ना उन्‍हें भारत-रत्‍न की उपाधि दे दी जाएं? क्‍योंकि सरकार में रहकर पूरे देश के मुँह पर कालिख पौतना, उन्‍होंनें कितना महान कार्य किया है। ये रतन टाटा भी अजीब आदमी है। अरबों रूपये कमाते हैं लेकिन उसमें से केवल 15 करोड़ मंत्री जी को सिंगापूर एयरलाईन्‍स के साथ मिलकर नई एयरलाईन्‍स शुरू करने के लिए नहीं दे सकें। अरे इसमें इनका क्‍या नुकसान था ये या तो मुम्‍बई में रहते हैं या टाटानगर में। बदनाम ज्‍यादा से ज्‍यादा दिल्‍ली या यह देश भारत ही तो होता। वैसे पारीक जी, ये बीजेपी वाले भी अजीब लोग है, जांच की मांग कर रहे हैं। भला बताइये किस चीज की जांच करेंगें, किस दूकान से कालिख खरीदी गई, या किस व्‍यक्ति को इसका ठेका दिया गया, या फिर कालिख पूतवाने के लिए इन्‍हें कितने पापड़ बेलने पड़े? अरे मेरे भाई आप लोग क्‍यों यह सब जानना चाहते हैं यदि आप यह सब सीख जाएंगें तो इस पार्टी का क्‍या होगा जो वर्षो से यही काम करती आई है और बार-बार उस पर सफेदी पोतती रही है।’

 

‘हॉं ये तो आप ठीक कह रहे हैं। 1952 का के.डी. मालवीय और सिराजुद्दीन का मामला, 1958 का जगमोहन मूंधड़ा समूह का घोटाला, 1964 का प्रतापसिंह कैरों कांड, 1971 का नागरवाला कांड, 1981 के एच.डी. डब्‍ल्‍यू पनडूब्‍बी के सौदे, 1982 में अंतुले का सीमेंट घोटाला, 1983 का चुरहट लॉटरी घोटाला, 1984 में फैयरफेक्‍स का मामला, 1987 में बोफोर्स तोप घोटाला, 1990 का एयरबस 320 का मामला, 1991 में वेस्‍टलैंड हेलीकॉप्‍टर सौदा, 1992 में प्रतिभूति घोटाला, 1992 में ही बंगारप्‍पा क्‍लासिक कम्‍प्‍यूटर सौदा, 1992 में ही गोल्‍डस्‍टार व भूपेन दलाल की सांठ-गांठ, 1992 में ही एशिया ब्राउन बोवेरी स्‍लीपर कोच का सौदा, 1993 में हर्षद मेहता का नरसिंह राव पर आरोप और उसके बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्‍वत कांड, यूरिया घोटाला, साड़ी घोटाला और चारा घोटाला…।’

 

मैं अभी अपनी विद्वता का और प्रदर्शन करता लेकिन भाईजी ने टोका, ‘आप सारे घोटालों का रिकार्ड रखें हुए है, भई क्‍या बात हैं? अच्‍छा, ये बताइयें, इन घोटालों के चक्‍कर में कौन-कौन से शहर बदनाम हुए? और इनकी जांच के बाद कितनों को सजा हुई?’

 

‘अरे भाईजी ये घोटालों का रिकार्ड नहीं है। लेखक हूँ ना इसलिए कुछेक मामलों के बारे में पढ़ा था वे ही दिमाग में रह गए। आप क्‍या सोचते हैं कि क्‍या इस देश में स्‍वतंत्रता के बाद केवल 25-30 घोटालें ही हुए हैं? हॉं, ये जरूर है कि ये सभी मामलें शहरों में ही अंजाम दिए गए हैं।’

 

‘अच्‍छा तो आप भी ये कहना चाह रहे हैं कि इनसे शहर बदनाम हुए हैं।’ भाईजी ने कहा।

‘मैंने ऐसा कब कहा?….’ मैं और कुछ कहता उससे पहले ही भाईजी ये गाते हुए नौ दो ग्‍यारह हो चुके थे- ‘ये शहर बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे घोटाले से…..’ और सदैव की तरह अनेक प्रश्‍नचिह्न मेरे हवाले कर गए।

 

मैं सोच रहा था भले ही भ्रष्‍टाचार से शहर बदनाम हो या गांव नुकसान तो देश का ही होता है। क्‍या घोटालों, भ्रष्‍टाचार को पूरी तरह मिटाना संभव है? भ्रष्‍टाचार हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र बन गया है। हम गांधी जी के बंदर बने बैठे हैं, न तो बुरा देखते हैं, न बुरा बोलते हैं और न ही बुरा सुनते हैं – इस प्रकार हम अप्रत्‍यक्ष रूप से भ्रष्‍टाचार का समर्थन करते हैं। क्‍या यही भ्रष्‍टाचार की असल जड़ नहीं हैं कि हम जान कर भी अनजान हैं।

 - अरविन्‍द पारीक



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62 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R. P. Prasad के द्वारा
09/12/2010

प्रिय पारिक साहब, भ्रष्टाचार के लिए हमलोग स्वयं जबाबदेह है। अगर हर व्यक्ति जागेगा तभी समस्या का समाघान होगा। निशचित रूप से वह समय आएगा और हम सभी व्यक्ति जागेंगे।

sdvajpayee के द्वारा
27/11/2010

भाई श्री अरविंद जी, घपले-घोटाले कमजोर चरित्र और सोच की देन होते हैं! हमें अपेक्षित परिवर्तन के प्रयास करने चाहिए।

    Arvind Pareek के द्वारा
    30/11/2010

    आदरणीय श्री एस.डी. वाजपेयी जी, आपकी बात कुछ हद तक सही है कि घपले-घोटाले करने वालों का चरित्र व सोच कमजोर होती है। लेकिन यदि हम जान कर भी अनजान बनें रहेंगें तो ये कमजोर चरित्र व सोच वाले सदैव घपले-घोटालों के लिए उत्‍साहित होते रहेगें। आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ।

Anil Kumar के द्वारा
26/11/2010

इस मंच का नाम हुआ डार्लिंग तेरी इस पोस्‍ट से ….. बधाई ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    27/11/2010

    प्रिय श्री अनिल कुमार जी, इस मंच का नाम तो आप सभी की टिप्‍पणियों से अधिक होता है । हमारी पोस्‍ट तो मात्र उसका माध्‍यम है । कुछेक पाठक तो केवल टिप्‍पणियां ही पढ़ना पसंद करते हैं । आपकी बधाई व प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ, धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

RENU के द्वारा
25/11/2010

सच ही है भ्रष्ट्राचार वाकई राष्ट्रीय चरित्र बना बैठा है कारण यही है कि हम सभी आख, मुख, कान बंद किये बैठे है, घोटाला कोई उठता है तो मीडिया की सुन समझ लेते है, और अपने कम धंधे में लग जाते है हम जाने अनजाने रूप से भ्रष्ट्राचार को समर्थन करते रहते है.. सच है घोटाले करने की तारीख, साल बदलती रहती है और घोटालो के पैसे भी उसी तरह जयादा होतै जा रही है.. भ्रष्टाचार के कारण वाकई देश की बहुत बदनामी होती है.. पर वाकई आपकी तारीफ करनी पड़ेगी घोटालो को स्मरण करने की और आपके भाई जी की भी जो आपका साथ बखूबी निभाते है… आपको बहुत ही अच्‍छे व्‍यंगात्‍मक लेख के लिए बधाई…

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/11/2010

    सुश्री रेणू जी, भई मान गए आपको । आपने अपना वादा पूरा किया और प्रतिक्रिया लिख डाली । सराहना के लिए धन्‍यवाद से इतर कोई शब्‍द सुझ नहीं रहा है इसलिए धन्‍यवाद । लेकिन आपने यह भी सही आकलन किया है कि घोटाले करने की तारीख व साल बदलते रहते है और घोटालो के पैसे भी उसी तरह ज्‍यादा होते जा रहे है,  यानि घोटालें भी मंहगे हो रहे है । आखिर महंगाई जो बढ़ रही है । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Mahender Kumar के द्वारा
25/11/2010

प्रिय पारीक जी, अशोक जी से आपके ब्‍लॉग के हॉल ऑफ फेम में आने की जानकारी मिली। इसलिए बधाई देने चला आया । आज आपका दिया साफ्टवेयर काम आ गया । आप दोष किस पार्टी को दे रहे हैं । कांग्रेस को या सत्ता में रहने वाली पार्टियों को या हम सब को । मेरी राय में तो दोषी सभी है । आपकी रचनाओं का कोई सानी नहीं है । बधाई । महेन्‍द्र कुमार

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/11/2010

    प्रिय महेन्‍द्र कुमार जी, चलिए अशोक जी के मार्फत ही सही आप इस ब्‍लॉग तक पहुँचे तो । बधाई के लिए धन्‍यवाद । मैं तो सोच रहा था कि साफ्टवेयर  को जंग लग गया होगा । आपकी राय ही उचित है दोषी तो सभी हैं । प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । बस एक निवेदन है कि इसी तरह इस मंच पर आने का रास्‍ता याद रखें और मुहावरे के रूप में कहूँ तो भूल जाएं । बस आपकी ये टिप्‍पणियां मुझे निरंतर लिखनें के लिए प्रेरित करती रहेगी । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Aakash Tiwaari के द्वारा
23/11/2010

आदरणीय श्री पारीक जी, देर से आने के लिए क्षमा चाहूँगा.. आपका लेख कांग्रेस के मुह पे एक जोरदार तमाचा है मगर बेशर्म है न ये सब कोई असर नहीं पड़ता और हमारे देश की जनता या यूँ कहे की हम सब सबसे बड़े मूर्ख है जो बार-बार कांग्रेस का ही चुनाव करते है जबकि इतिहास गवाह रहा है की जितने भी बड़े घोटाले हुए है सब कांग्रेस की राज में हुए है..महंगाई ने हमेशा कांग्रेस के राज में विकराल रूप धारण किया है.. आकाश तिवारी

    Arvind Pareek के द्वारा
    24/11/2010

    प्रिय श्री आकाश तिवारी जी, देर आयद दुरूस्‍त आयद । इसलिए आप देर से नहीं है । आप ने मेरी बात को और स्‍पष्‍ट करके लिख दिया है । लेकिन मैं यह भी कहूँगा कि घोटाले ज्‍यादा सत्तासीन पार्टियों के राज में उनके द्वारा ही किए जाते है क्‍योंकि जब हम है काजी तो डर काहे का । प्रतिक्रिया के लिए आभार हूँ, धन्‍यवाद ।

deepak joshi के द्वारा
23/11/2010

प्रिय अरविंद जी, भई इतने दिनों तक गायब रहने के बाद वापस आते ही फिर से बहु चर्चितों की पंक्तियों में नजर आने लगे, भई क्‍यों न हो, भाईजी के मसालों का राज है जो आपके लेखों को चटपटा बना देता है, और भई आपकी मेमोरी की भी तारिफ करनी होगी जो इन सभी काण्‍डों को सिलसिले वार आप ने याद रखा हुआ था मुझे तो ऐसा लगाता है जैसे किसी लाईब्रेरी में इंडेक्‍स कार्ड होते है उसी तरह आप ने भी अपने दिमाग रूपी कम्‍पूटर में इन्‍हें सेव कर के रखा हुआ है और जब जरूरत हुई उन्‍हें रचनाओं में उकेर दिया। बहुत ही अच्‍छे व्‍यंगात्‍मक लेख के लिए बधाई -दीपकजोशी63

    deepak joshi के द्वारा
    23/11/2010

    भाई साहब, आप का लेख हाल ऑफ फेम में चुना गया उस के लिए बहुत-बहुत बधाई। -दीपकजोशी63

    Arvind Pareek के द्वारा
    24/11/2010

    प्रिय श्री जोशी जी, भाईजी के मसाले है ही ऐसे कि कुछ भी हो उसे चटपटा बना ही देते है । मेमोरी की तारीफ के लिए शुक्रिया । कुछेक घोटालें याददाश्‍त से और कुछ भाईजी यों की कृपा से याद आ गए वही आपकी सेवा में प्रस्‍तुत कर दिए थे । प्रत्‍येक तरह की तारीफ के लिए आभारी हूँ । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    Arvind Pareek के द्वारा
    24/11/2010

    पुनश्‍च: हाल ऑफ फेम में चुने जाने पर आपकी बधाई के लिए बहुत-बहुत आभारी हूँ । बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए और हॉल आफ फेम त‍क पहूँचाते रहिए ।

Rashid के द्वारा
22/11/2010

पारीख जी ,, आप के हाल ऑफ़ फेम में चुने जाने से बहुत ख़ुशी हुयी !! मेरी मुबारक बाद कुबूल करे !! भ्रष्टाचार एवं नैतिक पतन के कारण वाकई देश की बहुत बदनामी होती है !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    24/11/2010

    प्रिय श्री राशिद जी, आदाब, बधाई के लिए तहे दिल से आभारी हूँ । आपके स्‍नेह व प्‍यार के कारण ही आज यह मुकाम हासिल हुआ है बस टिप्‍पणियों के रूप में इसे इसी तरह बरसाते रहे । मैं आपसे हॉल आफ फेम में शामिल की गई पोस्‍ट http://bhaijikahin.jagranjunction.com/?p=136 को पढ़नें की गुजारिश भी करूँगा । अरविन्‍द पारीक

Animesh Chatterjee के द्वारा
22/11/2010

अति उत्तम, सर्वोत्तम । लेकिन ये तो बताइये कि ए राजा के घोटाले कौन सा शहर बदनाम हुआ है । देश बेचारा तो घोटालो के नाम से सदा ही बदनाम रहा है । यहां एक सवाल और है कि कौन सी पार्टी अधिक बदनाम होगी । कांग्रेस या डीएमके । मजेदार व्‍यंगात्‍मक लेख । अनिमेष चटर्जी

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/11/2010

    प्रिय श्री अनिमेष चटर्जी जी, आपको यह लेख व्‍यंग अति उत्तम, सर्वोत्तम लगा । धन्‍यवाद । कृपया इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए । भाई जी ने कहा ही है कि देश बदनाम हुआ है यदि आप शहर का नाम चाहते है तो दिल्‍ली से बेहतर और क्‍या होगा । पार्टीयां तो दोनों ही बदनाम होगी । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद ।

Tarun के द्वारा
22/11/2010

एक अच्‍छे शीर्षक के साथ सर्वोत्‍तम रचना । ये शहर बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे घोटाले से….. लेकिन अंत में कही आपकी बात बिलकुल सटीक लगती है । भ्रष्‍टाचार हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र बन गया है। हम गांधी जी के बंदर बने बैठे हैं, न तो बुरा देखते हैं, न बुरा बोलते हैं और न ही बुरा सुनते हैं – इस प्रकार हम अप्रत्‍यक्ष रूप से भ्रष्‍टाचार का समर्थन करते हैं। क्‍या यही भ्रष्‍टाचार की असल जड़ नहीं हैं कि हम जान कर भी अनजान हैं। तरूण

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/11/2010

    प्रिय तरूण, यह रचना आपको पसंद आई उसके लिए आभारी हूँ । इसी तरह प्रतिक्रिया देते रहें । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद ।

AANCHAL के द्वारा
22/11/2010

भाईजी व पारीक जी आपकी जोड़ी सलामत रहे और हमें इसी तरह जानकारी से भरपूर व्‍यंग्‍य पढ़नें को मिलते रहें । सुंदर रचना । आंचल

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/11/2010

    सुश्री आंचल जी, आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्‍यवाद । मेरा तो यही प्रयास रहेगा कि आपको इसी तरह की रचनाएं पढ़ने को मिल सके । रचना की प्रशंसा के लिए व प्रतिक्रिया के लिए भी धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Ravi Arya के द्वारा
22/11/2010

क्‍या खुब लिखा है आपनें । पृथ्‍वीराज चौहान के बहानें सभी की खबर ले ली है । सुंदर व्‍यंग्‍य रचना । रवि आर्या

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/11/2010

    प्रिय श्री रवि आर्या जी, इस रचना की प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । जब आप लोग प्रशंसा करते है तो लगता है मेहनत सफल हुई । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Nishant के द्वारा
22/11/2010

जी हां आप बिलकुल सही कह रहे हैं यही भ्रष्‍टाचार की जड़ है कि हम जान कर भी अनजान है । भ्रष्‍टाचार हमारी रग रग में बस गया है । अच्‍छा व्‍यंग्‍य ।

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/11/2010

    प्रिय श्री निशांत जी, प्रशंसा के लिए आभारी हूँ, प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Hari Kishore के द्वारा
20/11/2010

पारीक जी, आज काफी दिनों बाद आपके लेखों को पढ़नें का अवसर मिला । सभी को पढ़ा बहुत अच्‍छा लगा । बायरल बुखार और यह भ्रष्‍टाचार वाले व्‍यंग्‍य तो बहुत ही गजब के हैं । नीचे लिखे कमेंट से पता चला कि आपकी पोस्‍ट जागरण में भी आई है । बधाई । हरि किशोर

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/11/2010

    प्रिय श्री हरि किशोर जी, आपको मेरे लेख पसंद आए, धन्‍यवाद । बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए । जागरण में इस पोस्‍ट का अंतिम पैरा छपा है। जैसा कि श्री कैलाश जी ने लिखा है । वहां प्रतिदिन किसी ना किसी पोस्‍ट से कोई अंश छापा जाता है । तथापि बधाई के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Kailash Kumar के द्वारा
20/11/2010

आज के जागरण के सम्‍पादकीय पृष्‍ठ पर जागरण.काम में पत्र कॉलम के साथ आपके नाम से लिखी टिप्‍पणी ने ध्‍यान आकर्षित किया तो इस पोर्टाल पर चला आया । बड़ी कठिनाई से आपके इस ब्‍लॉग तक पहूँचा हूँ । आपकी टिप्‍पणी के रूप में इस पोस्‍ट का अंतिम पैरा वहां छापा गया है यदि उसके नीचे ब्‍लॉग का लिंक भी दे दिया जाता तो ढूँढना आसान हो जाता । बहुत ही मजा आया इस पूरी पोस्‍ट को पढ़कर । अब तो लगता है नियमित रूप से इस ब्‍लॉग को पढ़ना होगा । कैलाश

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    20/11/2010

    प्रिय श्री कैलाश जी, आपकों इस पोस्‍ट तक पहूँचनें में परेशानी हुई उसका खेद है । आपको पोस्‍ट पसंद आई उसके लिए आभारी हूँ । आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद । निरंतर पढ़े व उत्‍साह बढ़ाते रहें यही कामना है । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
20/11/2010

प्रिय अरविन्द जी, आपको लाख लाख बधाई ! आपका यह लेख प्रिंट मीडिया में भी चर्चा का विषय बना है ! आज दैनिक जागरण समाचार पत्र में आपके इस लेख के बारे में चर्चा है ! आपके नाम के साथ ! फिर से बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    20/11/2010

    आदरणीय श्री खुराना जी, बधाई के लिए धन्‍यवाद । यह आप सभी का स्‍नेह व प्रेम हैं जो मुझे इस रूप में मिल रहा है । मैं दैनिक जागरण समाचार पत्र अभी देख नहीं पाया हूँ । आपका बधाई के लिए पून: धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

rpraturi के द्वारा
20/11/2010

अरविन्द जी, घोटालों पर अच्छा व्यंग्य है. क्या हम जागरण के संपादक मंडल से अनुरोध कर सकते हैं कि ऐसे लेख जो जन-सरोकार से जुड़े हों , समाचार पत्र में भी छपने चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इन्हें पढ़ सकें क्योंकि ब्लॉग की अपनी सीमितता होती है.

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    20/11/2010

    प्रिय श्री आर.पी. रतुड़ी जी, व्‍यंग्‍य की प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । जी हां आप जागरण के संपादक मंडल से अनुरोध कर सकते हैं इसके लिए आप चाहें तो मेरी जानकारी के अनुसार feedback@jagranjunction.com पर मेल भेज सकते हैं । आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

K M Mishra के द्वारा
19/11/2010

पारीक जी सादर प्रणाम । शहरों कें मुंह पर कालिख पोतने वालों ने इसी लिये शायद कामनवेल्थ गेम्स के लिये खेलगांव बसाया था कि अब की कालिख गांव पर पोतेंगे । वैसे पंचायत चुनाव में हुयी हिंसा और भ्रष्टाचार को देख स्वंय गांधी जी भी सोच रहे होंगे कि बेकार में ग्रामस्वराज्य का नारा लगवा दिया । ग्राम स्वराज्य की बात न कहते तो कम से कम गांव तो बचे रहते कालिख पोतने से । आजकल कालिख की डिमांड खूब हो गयी है । कोयले की दलाली से भी ज्यादा नफा इस धंधे में दिख रहा है । आभार ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    20/11/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, आपने ठीक पहचाना कुछ तो नया करना ही था । महात्‍मा के नाम पर सभी महान आत्‍मा बनना चाहते है लेकिन भूल जाते है कि जब तक ना होगा मन चंगा तब तक ना होगी कठौती में गंगा। प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ, धन्‍यवाद ।

chaatak के द्वारा
19/11/2010

स्नेही श्री पारिक जी, हिन्दुस्तान कब घोटालों का देश बन गया पता ही नहीं चला| हाँ घोटालों को दबाने के खेल जरूर चल पड़े और नेताओं ने समझौतों पे समझौते कर डाले| तू मेरी मत बोलियों मैं तेरी न खोलूँगा| सब मिल के चरें-खाएंगे| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    प्रिय श्री चातक जी, प्रशंसा व प्रोत्‍साहन के लिए आभारी हूँ । इस दबा-दबी के खेल के साथ जान कर भी अनजान होना हमें बहुत भारी पड़ रहा हैं । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद अरविन्‍द पारीक

ashvinikumar के द्वारा
18/11/2010

भाई पारिक जी नेता लोग गिनीज बुक आफ वर्ल्ड में देश का नाम दर्ज करवाना चाहते हैं …जय भारत

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    प्रिय श्री अश्विनी कुमार जी, गिनीज बुक आफ वर्ल्ड में देश का नाम दर्ज करवाने के लिए एक ही बड़ा सा घोटाला काफी हैं इतनें घोटालों की क्‍या जरूरत थी । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
18/11/2010

इन घोटालों की सूची पढ़कर ये लगने लगा है की ये घोटाले कहीं उस विकास का पर्याय तो नहीं की जिसको सरकारें करने का वडा करती है और पांच साल बाद होने की खबर भी देती हैं …………. बढ़िया लेख हार्दिक बधाई………

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    प्रिय श्री पियुष पंत जी, ये घोटाले जान कर भी अनजान बनने की सजा हैं। और कुछ नहीं क्‍योंकि घोटालों से विकास की गति धीमी होती है विकास रूकता नहीं हैं बस अनजान बन जानें से जो मिलना था वह मिलता नहीं हैं। लेख की प्रशंसा के लिए आभारी हूँ धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

rajkamal के द्वारा
18/11/2010

क्‍या यही भ्रष्‍टाचार की असल जड़ नहीं हैं कि हम जान कर भी अनजान है… आदरणीय भाई जी ..सादर अभिनंदन…. अब मुझको तो यही समझ में नहीं आ रहा है की भाई जी आपके कारण हमारी श्री पारीक जी से मुलाकात होती है या फिर पारिक जी के कारण आपसे …. जहां तक भ्रष्टाचार की जड़ का सवाल है तो उसके बारे में मेरा तो यही कहना है की उसके लिए मेरा इस देश में ज़न्म लेना ही सबसे बड़ा कारण है ..क्योंकि यहाँ पर मैं खुद भी इस भर्ष्ट तंत्र के पहिये का एक अहम हिस्सा बन गया हूँ …..अगर लेता नहीं हूँ तो देने का पुण्य कार्य तो करना ही पड़ता है …. एक शानदार लेख के लिए बधाई , जिसमे की एक कमी भी खली जोकि खली पहलवान जैसी ही मालूम पड़ती है मुझको …और वोह है ….”कफन घोटाला”

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    प्रिय श्री राजकमल जी, यह भाईजी का मामला है अजीब । दीपक जोशी जी ने मिलनें की कोशिश की तो शीर्षासन करवा दिया था । इसलिए जब वे आए तो उनसे चुपचाप मिल लीजिए । आपने भी देखा होगा मैं भी इसी डर से जब भाईजी के साथ होता हूँ तो ज्‍यादा चुप रहना ही पसंद करता हूँ । आपनें लेख की कमी पूरी की उसके लिए आभारी हूँ लेकिन मैं भी ऊपर लिख चुका था कि आप क्‍या सोचते हैं कि क्‍या इस देश में स्‍वतंत्रता के बाद केवल 25-30 घोटालें ही हुए हैं? यहां प्रश्‍नचिह्न छोड़नें का कारण यही था कि यह लिस्‍ट भी अधुरी है । आपको लेख पसंद आया धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Dharmesh Tiwari के द्वारा
18/11/2010

आदरनीय परिक जी,धोटालों के रिकार्ड से भरा यह ब्यंगात्मक लेख……………..एक जबरदस्त प्रहार,धन्यवाद!

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    प्रिय श्री धर्मेश तिवारी जी, आपकों लेख पसंद आया उसके लिए आभारी हूँ । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा
18/11/2010

‘एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्ताँ करने को हर साख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा

    div81 के द्वारा
    18/11/2010

    माफ़ किगियेगा बिना लोगिन किये ही reply कर दिया ‘एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्ताँ करने को हर साख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    सुश्री दिव्‍या जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । यदि हर शाख पर उल्‍लू होते तो अंजाम अच्‍छा ही होता । क्‍योंकि अंग्रेजों के गुलाम उल्‍लू को बुद्धिमान प्राणी मानते हैं । अरविन्‍द पारीक

roshni के द्वारा
18/11/2010

आदरनिये पारीक जी, घोटाले पे घोटाला इतने सारे घोटाले और उसपर आपकी नज़र में हर घोटाला .. आप तो CID हो गए … घोटाले कम हो न हो मगर हैं gk के लिए अच्छी जानकारी मिल गई … वैसे अगर गाँधी जी अपने बंदरों के कान नाक और आंख खुली रखवाते तो शायद आज तस्वीर कुछ और होती … धन्यवाद सहित

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    सुश्री रोशनी जी, सीआईडी बनानें का शुक्रिया । गांधी जी ने तो बंदरों को कान, नाक और आंख खुली रखनें को ही कहा था, लेकिन ये बंदर कुछ ज्‍यादा समझदार थे कहने लगे कि सभी को ये कैसे समझ आएगा कि गांधी जी ने क्‍या कहा था । इसलिए कान, नाक और आंख बंद कर बैठे । जो ज्‍यादा समझदार थे वे कभी-कभी उन्‍हें खोल कर इधर उधर तांक झांक कर कुछ हथिया लेते थे । हॉं यह जरूर सही है कि यदि सभी आंख खोल लें तो तस्‍वीर तो दूसरी होगी ही । बहुत दिनों बाद ही सही आपनें प्रतिक्रिया दी इसके लिए आभारी हूँ धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    roshni के द्वारा
    19/11/2010

    अरविन्द जी मैंने बहुत दिनों के बाद कहाँ टिप्पणी की?? … मैंने आपकी last सभी लेखों पे विचार दिए है … आप देखो तो सही ……. धन्यवाद सहित

आर.एन. शाही के द्वारा
18/11/2010

श्रद्धेय पारीक जी, कहा गया है कि दर्द की दास्तान से ही व्यंग्य की उत्पत्ति होती है । आपका यह आलेख इस फ़लसफ़े का जीवन्त प्रतीक है । चलिये इसी बहाने इतने सारे घोटालों को एक साथ एक मंच पर लाकर आपने एक तरह का घोटालों का संस्मरण भी प्रस्तुत कर दिया । रोज़ नए घोटाले होते हैं, दो दिन की हाय तौबा मचती है, फ़िर नया घोटाला पिछले को विस्मृत कर कभी-कभी ही पढ़े जाने वाले इतिहास के पन्नों में धकेल देता है । इस बीच जांच समितियों के गठन की रस्म अदायगी कर घोटालों का श्राद्ध भी संपन्न कर दिया जाता है । ऐसी जांच, जिसकी कोई रिपोर्ट या कार्रवाई किसी को कभी देखने को नहीं मिलनी है । तो हम बन्दर करें भी तो क्या! ‘किस-किस को याद कीजिये, किस-किस को रोइये, आलू-प्याज कहीं बड़ी चीज़ है, बटुए को टोइये’ । साधुवाद ।

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    आदरणीय श्री शाही जी, बिलकुल ठीक कहा आपनें । हम बन्दर करें भी तो क्या! ‘किस-किस को याद कीजिये, किस-किस को रोइये, आलू-प्याज कहीं बड़ी चीज़ है, बटुए को टोइये’ । लेकिन आंख मुंद कर देर तक रहना भी मुश्किल है । बट़ुए में टोने लायक भी तो कुछ होना चाहिए । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

priyasingh के द्वारा
18/11/2010

इस लेख को पढने के बाद यही लगता है की सारे घोटाले कांग्रेस के शाशन काल में ही हुए है……….. इस मंच पर लगता है सब सरकार विरोधी ही है …….. नहीं नहीं सिर्फ सरकार विरोधी ही नहीं सोनिया विरोधी भी ………..अच्छा लेख ….

    priyasingh के द्वारा
    18/11/2010

    माफ कीजिएगा टिपण्णी लिखने के बाद महसूस हुआ की कुछ गलत लिख दिया …….वैसे भी मै किसी एक पार्टी की पक्षधर नही हूँ पर टिपण्णी पढने से मुझे स्वयंम प्रतीत हुआ की कांग्रेस का पक्ष ले रही हूँ ……….

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    सुश्री प्रिया सिंह जी, जब केन्‍द्र में ज्‍यादा समय तक एक ही पार्टी की सरकार है और घोटाले भी हुए है तो उसका दोष किसी ओर पार्टी को कैसे दिया जा सकता है। इस मंच पर मेरी राय में सभी भ्रष्‍टाचार-विरोधी हैं ना कि किसी पार्टी या व्‍यक्ति के विरोधी । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

nishamittal के द्वारा
18/11/2010

पारीक जी, सटीक व्यंग्य .लेकिन दोषी कौन उन्हें लूट मचाने योग्य बनाने के लिए?

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    सुश्री निशा मित्तल जी, व्‍यंग्‍य को पसंद करने के लिए शुक्रिया । दोषी तो आप मैं और हम सब ही हैं । और कौन होगा । प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ ।

R K KHURANA के द्वारा
18/11/2010

प्रिय अरविन्द जी, इतने घोटालों का रिकार्ड रखने के लिए बधाई ! बहुत सुंदर “घोटाला” (रचना) है ! वो तो यही सोचते है की बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो होगा ! हम गांधी जी के बंदर बने बैठे हैं, न तो बुरा देखते हैं, न बुरा बोलते हैं और न ही बुरा सुनते हैं ! बहुत सुंदर कहा ! राम कृष्ण खुराना

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    19/11/2010

    आदरणीय श्री खुराना जी, बधाई के लिए व रचना पसंद करने के लिए आभारी हूँ । आपका यह प्रोत्‍साहन मुझे निरंतर लिखनें की प्रेरणा देता रहता हैं । धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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