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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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पद को सलाम भई, सीट को सलाम

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मैंनें दूर से ही भाईजी को देख लिया था । उन्‍हें सरप्राईज देने के लिए दबे पांव उनके पीछे आकर चुपचाप खड़ा हो गया था । सुना भाईजी कुछ बड़बड़ा भी रहे थे – जब मैं  काम संभाल रहा था तब तो ना जानें कितनें प्‍यार से बोलते थे । भाईजी आप ही सब कुछ है । आप ही माई-बाप है । हमें एक बार सेवा का मौका तो दीजिए । आप जो कहेंगें हम करेंगें, बस आप आदेश तो कीजिए । और आज जब थोड़ा-सी छूट क्‍या मांग ली, ऐसे बोल रहे हैं जैसे मैंनें उनसे कुछ नाजायज कह दिया हो । अरे क्‍या आपका कोई ग्राहक कभी कीमत कम करने के लिए नहीं कहता । भाड़ में जाए सा…… । भाईजी की जबान पर गाली जरूर कोई गंभीर मामला है । मैं तत्‍काल भाईजी के सामनें आ गया । देखा भाईजी का चेहरा तमतमाया हुआ था । वे बड़े गुस्‍से में नजर आ रहे थे ।

 

‘क्‍यों भाईजी आज किसकी शामत आई थी जिसनें आपको नाराज कर दिया ?’ मैंनें पूछा । देखा भाईजी मुझे देखकर कुछ संयत हो रहे है । यकायक बोले, ‘अच्‍छा, पारीकजी ये बताइयें लोग व्‍यक्ति के व्‍यवहार को देख कर दोस्‍ती करते हैं या पद अथवा कार्य के स्‍थान को ?’ 

 

‘देखिये, भाईजी इस बारे में प्रत्‍येक व्‍यक्ति का नजरिया अलग-अलग होता है । मैं और आप अच्‍छे दोस्‍त है क्‍योंकि मेरी नजर में आपकी सोच परिपक्‍व है और आप पढ़े-लिखें व समझदार भी हैं । आपके पद और कार्य के बारे में तो मैंनें आज तक पूछा ही नहीं ।’

 

‘मैं आपसे पूछता कुछ हूँ और आप बात को दूसरी ओर घुमा देते हैं । अरे भाई मेरे… मैं कह रहा हूँ कि लोग दोस्‍ती के लिए व्‍यवहार को देखते हैं या व्‍यक्ति की ताकत को ।’ भाईजी ने ऐसे पूछा जैसे यदि मैंनें ठीक से जबाव नहीं दिया तो शायद वे अपनी ताकत का प्रदर्शन ही कर बैठे । लेकिन अपनी आदत से बाज भी नहीं आया । इसलिए कह बैठा – ‘अब महाबली खली या दारा सिंह आकर कहें कि मुझसे दोस्‍ती कर तो मैं मूर्ख थोड़े ही हूँ कि अपने हाथ-पॉंव तुड़वाऊँगा, ऐसे में तो दोस्‍ती करना ही बेहतर है । हॉं कोई सींकिया पहलवान हो जिसकी टांगें सिगरेट जैसी और कद-काठी बस ककड़ी-सी तो जरूर ये सोचूँगा कि आदमी समझदार व पढ़ा-लिखा है भी या नहीं । यदि नहीं, तो उसे रोजाना दूर से ही सलाम कर दिया करूँगा ।’ और मन ही मन कहा कि आप जैसे पहलवान से दोस्‍ती का राज भी यही हैं ।

 

‘अच्‍छा ठीक है फिर मैं चला आज आप ठीक से बात भी नहीं करेंगें ना । सोचा था आप मेरे मित्र हैं शायद आपसे बात कर कुछ परेशानी का समाधान कर सकूँ ।’ भाईजी बोले ।

 

वास्‍तव में मामला संगीन हो गया था । इसलिए मैंनें गंभीरता से कहा, ‘बात दरअसल ये है कि मैं आपका मुड कुछ ठीक करने की कोशिश कर रहा था । अब बीरबल तो हूँ नहीं कि अपनी हरकतों व बातों से आपकों हँसा सकूँ या आपके चेहरे पर मुस्‍कराहट ला सकूँ । बस कोशिश ही कर सकता हूँ । आप तो बुरा मान गए ।’

 

‘न..न । ऐसी बात नहीं हैं ।’ भाईजी मुस्‍करानें लगे थे । ‘बात दरअसल ये है कि मैं पहले अनेक सरकारी कार्यालयों में काम कर चुका हूँ । ऐसी सीटों पर भी जिन्‍हें लोग मालदार व रसभरी कहते थे । आपसे कसम से कहता हूँ मैंनें किसी से कभी किसी प्रकार की सेवा नहीं करवाई व ना ही कभी कुछ लिया । इस कारण अब तक किसी भी स्‍थान पर छह-सात महीनें या एक-डेढ़ साल से अधिक काम भी नहीं किया है । लगभग 40-50 ट्रांसफर झेल चुका हूँ । लेकिन मुझे इससे कोई शिकायत नहीं हैं । अरे मेरे भाई यदि कुछ गलत कहोगें तो मैं वह नहीं करूँगा, बस यही मेरा उसुल है । हॉं सही के लिए चाहे कितना ही बड़ा ऑफिसर अड़ जाए उससे भी भिड़नें में मुझे कोई हर्ज नहीं होता । मैं बिना किसी वजह के किसी को चक्‍कर भी नहीं लगवाता । कोशिश तो यही रहती है कि मेरे पास यदि कोई आया है तो उसका काम एक बार में ही हो जाए । मैं तो सूचना का अधिकार अधिनियम आनें से पहले ही सारी जानकारी देता रहा हूँ ।’ मैं भाईजी की बातें बड़े ध्‍यान से सुन रहा हूँ ।

 

‘लेकिन लोग बाज नहीं आते । कुछ ना कुछ गलत जरूर चाहते हैं । जब स्‍वास्‍थ्‍य विभाग में था तो डॉक्‍टर और तकनीकी स्‍टॉफ यह चाहते थे कि उनकी तैनाती मनमाफिक स्‍थान पर हो जाए । कुछेक अस्‍पताल/औषधालय या कार्यालय ऐसे थे जहां कोई जाना ही नहीं चाहता था । तब सब ऐसे गिड़गिड़ाते थे कि लगता था मैं शंहशाह बन गया हूँ । जब मैं वहां उनके मनमुताबिक नहीं चला तो कस्‍टम में भेज दिया गया । वहां ना जानें क्‍या-क्‍या प्रलोभन देकर मुझे बिना कस्‍टम ड्यूटी के माल निकालनें को कहते थे । पुलिस विभाग में थानों में रौब दिखानें वाले पुलिस वाले मेरे सामनें ऐसे भीगी बिल्‍ली बन जाया करते थे जैसे मैं ही पुलिस कमिश्‍नर या महानिदेशक हूँ । मैं चाहता तो किसी को भी नाजायज तरीके से फँसा कर अपना काम निकलवा सकता था । अरे पारीकजी मैंनें इतनें पापड़ बेले हैं कि क्‍या कहूँ ।’

 

मैंनें टोका, ‘लेकिन खाया एक भी नहीं । अब भाभीजी का काम भी आप ही करेंगें तो गड़बड़ तो होगी ही । खैर मैं आपकी बात समझ गया । आप कहना चाहते हैं कि लोग व्‍यक्ति के पद व उसके कार्य को देखकर ही दोस्‍ती (दरअसल जिसे हम लालच व प्रलोभन कह सकते हैं) का हाथ बढ़ातें हैं, और बदलें में जायज व नाजायज कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं । लेकिन जब आप उस पद या कार्य से हट जाते हैं तो वही लोग आपकों पहचानते भी नहीं हैं ।’

 

‘हॉं…हॉं मैं यही कहना चाहता था । दरअसल मैं आज जिस दूकानदार के पास गया था उससें इलैक्ट्रिक टोस्‍टर के दाम में कुछ ज्‍यादा कटौती का अनुरोध कर बैठा था । क्‍योंकि जब मैं सेल्‍स टेक्‍स में था तो यही मुझे कहा करता था कि बस एक बार सेवा का मौका दीजिए । कई बार गिफ्ट के नाम पर अनेकों इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स आईटम देने की कोशिश भी की थी । तब मना करने पर कहता था एक बार दूकान पर आईये तो सही, आपकों बिलकुल उचित दाम पर ही सामान दूँगा । और आज जब पहूँचा तो इलैक्ट्रिक टोस्‍टर की कीमत साथ वाले दूकानदार से भी ज्‍यादा बता रहा था । उसे याद दिलाया कि भाईसाहब मैं जब सेल्‍स टेक्‍स में था तो आपनें कहा था कि एक बार दूकान पर आईये तो सही, आपकों बिलकुल उचित दाम पर ही सामान दूँगा, लेकिन आप तो बहुत ज्‍यादा कीमत लगा रहे हैं । कुछ तो ठीक कीजिए । तो जनाब ने कहा कि मैंनें कोई लंगर नहीं खोल रखा कि आपकों फ्री में सामान दे दूँ । अरे उससे फ्री में मॉंग कौन रहा था । कीमत नहीं कम करनी थी ना करता, बोलता तो ठीक से । मैं कौन-सा उसे …..’ भाईजी और कुछ कहते उससे पहले ही उनकी बस आ गई वे तेजी से बस की और लपक पड़ें । जानें फिर कितनी देर में आएं ।

 

मैं सदैव की तरह अकेला, सोचनें लगा कि हम भी कितनें अजीब लोग हैं कि इंसान को नहीं उसके व्‍यवहार को नहीं बल्कि पद व कार्य के आधार पर व्‍यक्ति को आदर सम्‍मान देते हैं । मुन्‍ना भाई एमबीबीएस में सफाईवाले को गले से लगाकर जब मुन्‍ना जादू की झप्‍पी देता है तो वाह, वाह कह उठते हैं लेकिन सड़क पर झाड़ू लगातें सफाईवाले को ऐसे हिकारत की नजर से देखते हुए गुजर जाते हैं कि मानों सारी गंदगी उसी ने फैलाई है उसे ही साफ करनी चाहिए ।

 

- अरविन्‍द पारीक



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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

omprakash pareek के द्वारा
30/09/2010

अरविन्दजी, आपका “सीट को सलाम…………..” सही है है. अभी-अभी सेवा निवृत्त CVC प्रत्युष सिन्हाजी ने पिच्छले हफ्ते कहा की अब लोग आदमी के पैसे और शानो-शौकत को सलाम करने लगे हैं और इस बात से किसी को कोई मतलब या एतराज़ नहीं की वो पैसा उसने कैसे कमाया. याने चाहे चोरी, डकैती या रिश्वतखोरी से कमाया हो कोई फर्क नहीं. और अगर मोहल्ले, गाँव पडोश में कुछ बाँट देता है तो लोग सहर्ष ले कर उसकी वह-वाही करेंगे. पहले के ज़माने में ऐसा नहीं था. समय बदला है, ज़माना बदला है रौब, ताकत सीट, ओहदे को सब सलाम करते हैं गांधीजी रो रहे हैं वहां ऊपर.

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/10/2010

    माननीय, आपने अपनी प्रतिक्रिया देकर मेरा उत्‍साह बढ़ाया । मैं आपका आभारी हूँ । मैं यूआरएल http://oppareek43.jagranjunction.com पर आपके द्वारा अंग्रेजी व हिन्‍दी में लिखी पोस्‍टों का रसास्‍वादन करता रहा हूँ । लेकिन आपके लिखे पर टिप्‍पणी का साहस कभी-कभी ही जुटा पाता हूँ । सिन्‍हा जी ने भी भाईजी की बात का ही समर्थन किया है । दुनिया आजकल पद को या सीट को सलाम करती है । प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत चपड़ासी भी पशुधन विभाग के आई.ए.एस. से अधिक सलाम पाता है । यही नियति है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

poonam के द्वारा
25/09/2010

आदरनिये पारीकजी ,हमेशा की तरह इतने सुंदर तरीके से इस सामाजिक समस्या को उठाने के लिए आप बधाई के पात्र है |भाईजी व् आपका साथ इसी तरह बना रहे ,ताकि हमारी अक्लो पर से परदे उठते रहे |सादर वन्दे

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    26/09/2010

    प्रिय पूनम, भाईजी व मेरा साथ तो ऐसा हो गया है कि अब पीछा छूड़ाने से भी नहीं छूटेगा । बस यदा कदा भाईजी कहीं चले जाते है या मैं अपनी व्‍यस्‍तता में उनसे मिल नहीं पाता हूँ तभी कुछ अलग पढ़नें को मिलता है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार व धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

NIKHIL PANDEY के द्वारा
22/09/2010

आपकी कलम ऐसे मुद्दे उठाती है जो हमेशा सही लगते है लेकिन भाईजी की समस्या से हम सभी रूबरू होते है क्योकि व्यावहारिकता और सोच में यही फर्क है ,,संजय दत्त पर ताली बजा सकते है पर खुद संजय दत्त सा व्यवहार नहीं कर सकते… और दूसरी तरफ सम्मान आपके सामर्थ्य का ही होता है ,, पद हो या आप दबंग चुलबुल पण्डे हो … नहीं तो साहब लोग तो कुर्सी से हटने के बाद राष्ट्रपति को भी नहीं कुछ समझते…शायद आपको याद होगा कलम साहब राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब अपने नए घर में गए… तो उन्हें भी पता चल गया पद की महिमा… क्योकि पूर्व सुचना के बाद भी उनके घर में लाइट और साफ़ सफाई की भी व्यवस्था ठीक से नहीं करी गई थी… जब मिडिया में हल्ला हुआ तब जाके व्यवस्था की गई… क्या करे ऐसा ही है… भाई जी तो सब जानते ही है

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    23/09/2010

    प्रिय श्री निखिल पांडेय जी, सराहना व प्रशंसा के लिए आभार व विस्‍तृत टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

K M Mishra के द्वारा
22/09/2010

अरविंद जी इंसान को तभी इंसान माना जाता है जब तक वह वह गधा न हो जिसे बाप बनाने की मजबूरी पड़ती है । दुनिया उसी गधे को अपना बाप बनाती है जिससे उसको कोई काम करवाना होता है अन्यथा सिर्फ इंसान होना बहुत मंहगा शौक है आज कल । समाज के कलमुंहे चेहरे को आईना दिखाती और सोचने पर मजबूर करती बेहतरीन पोस्ट के लिये आभार ।

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    23/09/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, मेरे उत्‍साह को बढ़ानें वाली आपकी इस टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद । वास्‍तव में आज इंसान होना महंगा हो गया है । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
22/09/2010

प्रिय श्री पारीक जी, समाज की रगों में जहर की तरह बढ़ते उपभोक्तावाद और अवसरवाद को बखूबी दर्शाया आपने| इसी भाव को अल्फ्रेड लोर्ड टेनिसन ने लिखा है- Authority forgets a dying king. अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    23/09/2010

    प्रिय श्री चातक जी, न जाने आप किस नजर से देखते हैं कि जो मैंनें सोचा भी नहीं होता उस भाव को कभी-कभी ढूँढ कर व्‍यक्‍त कर देते हैं । फिर जब उस नजरिये से देखता हूँ तो लगता है शायद मैं यही कहना चाहता था । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

roshni के द्वारा
21/09/2010

पारीक जी बिलकुल सही कहा अपने चढ़ते सूरज को सलाम होता है डूबते को नहीं … और अगर व्यक्ति इमानदार हो फिर तो लोग पहचानते भी नहीं… सुन्दर लेख पर बधाई

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    23/09/2010

    सुश्री रोशनी जी, बधाई व प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । सच यही है कि लोग लाभ-हानि देख कर ही रिश्‍ते बनानें लगे है । अरविन्‍द पारीक

navneet k srivastava के द्वारा
21/09/2010

अच्छे लेख और शानदार प्रस्तुतिकरण के लिए बधाई..। 

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री नवनीत के. श्रीवास्‍तव जी, बधाई व प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Aakash Tiwaari के द्वारा
21/09/2010

वाह-वाह पारीख जी क्या सटीक लिखा है आपने… आकाश तिवारी

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री तिवारी जी, आपकी प्रतिक्रिया व सराहना के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

ajaykumarjha1973 के द्वारा
21/09/2010

क्या बात है अरविंद जी …आपकी धाराप्रवाह शैली के तो कहने ही क्या ..अक्षरश: सहमत

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री अजय कुमार झा जी, प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । शैली की तारीफ का शुक्रिया व सहमति व प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

rajkamal के द्वारा
21/09/2010

सच में ही हमारी कथनी और करनी एक नहीं है …शायद हो भी नहीं सकेगी ..

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री राजकमल जी, प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ । आपनें अक्षरश: सच लिखा है । धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
21/09/2010

आदरणीय पारीक जी ……… बेहद गभीर विषय को बड़ी सरलता से प्रस्तुत किया है……….. अच्छा लेख……………. हार्दिक बधाई……..

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री पीयुष पंत जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Ramesh bajpai के द्वारा
21/09/2010

आदरणीय श्री पारीख जी बहुत ही रोचकता से वर्तमान सामाजिकता को परि भाषित किया है जहा मानवीय मूल्यों से ज्यादा पद और ओहदे को पोषित किया जाता है बहुत बहुत बधाई

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    आदरणीय श्री वाजपेयी जी, सराहना के लिए आभारी हूँ । आपकी प्रतिक्रिया व बधाई के लिए धन्‍यवाद । बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए । अरविन्‍द पारीक

rkpandey के द्वारा
21/09/2010

आदरणीय अरविंद जी, आपने विषय को बड़ी गहरायी से छुआ है. यकीनन इंसानी फितरत ही ऐसी है कि ओहदा महत्वपूर्ण हो जाता. सामने वाले की हैसियत देख के उससे बातचीत का लहजा तय होता है. त्रासदी है मानवता के लिए जिससे हम सभी अभिशप्त हैं.

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री पांडेय जी, प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । यह भाईजी की आपबीती केवल इसलिए बताई कि भाईजी वास्‍तव में इस कारण बहुत कष्‍ट में थे । शायद यहां प्राप्‍त हो रही टिप्‍पणियां उनके लिए मरहम का काम कर सके । अरविन्‍द पारीक

abodhbaalak के द्वारा
21/09/2010

पारिख जी, हम हैं ही दर असल इस तरह के, लोगों को उपदेश देने में महारत रखते हैं पर अपने पर उसे लागू नहीं करते, और ये तो खुली सच्चाई है की आज दोस्ती भी दोस्ती कहाँ रह गयी है, आजकल दोस्ती बहुत साड़ी चीज़ों को देख कर की जाती है जिसमे व्यक्ति की आर्थक स्थिति भी और उसके पद को नाप तौल कर दोस्त बनाया जाता है.

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    22/09/2010

    प्रिय श्री अबोधबालक जी, आपकी टिप्‍पणी से आप अबोध और फिर बालक भी नजर नहीं आते । आपनें बिलकुल ठीक लिखा है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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