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यह खबर कैसे हो सकती है ?

Posted On: 12 Sep, 2010 Others,न्यूज़ बर्थ में

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हाल ही में माननीय सांसद श्री वैश्‍य ने संसद में हिन्‍दी में पूछे गए प्रश्‍न का अंग्रेजी में जबाव दिए जाने की बात का पुरजोर विरोध किया था.  लेकिन एक-आध खबरिया चैनल व समाचार-पत्रों को छोड़ कर किसी भी खबरिया चैनल या समाचारपत्र में इस खबर की दो पंक्तियां भी सुननें या पढ़नें को नहीं मिली. लेकिन टवीटर पर कौन वीआईपी अंग्रेजी में कैसे चहचहाया इसे लगभग सभी चैनल व समाचारपत्र दिखा रहे हैं. भले ही वे हिन्‍दी की रोटी खा रहे हों.

खैर इस बारे में और बात करने से पहले, आप यदि हिन्‍दी भाषा से परिचित हैं व देश में इसका विकास चाहते हैं तो ना जाने कितनी बार आपने संविधान के अनुच्‍छेद 343 का अध्‍ययन किया होगा जो बताता है कि भारत संघ की राजभाषा हिन्‍दी व लिपि देवनागरी होगी तथा भारतीय अंकों के अंतर्राष्‍ट्रीय रूप का प्रयोग किया जाएगा. आपने यह भी पढ़ा होगा कि संविधान के प्रारंभ से पन्‍द्रह वर्ष की अवधि तक जिन कार्यो के लिए ऐसे प्रारंभ से पहले अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता रहा है उन सभी कार्यो के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता रहेगा.

मैंनें सोचा चलिए उन सभी कार्यो की जानकारी जुटाते हैं कि ऐसे प्रारंभ से पहले अंग्रेजी का किन-किन कार्यो के लिए प्रयोग किया जाता रहा है. पहले तो नेट को ही खंगाल डाला. बहुत सी नई बातें पता चली लेकिन वह सूची कहीं नहीं मिली जिनमें उन कार्यो का जिक्र हो जो संविधान लागू होने से पहले अंग्रेजी में किए जाते थे या जिनमें अन्‍य किसी भारतीय भाषा का प्रयोग किया जाता था. फिर कुछेक बुजूर्ग विद्वानों से जानकारी चाही कि क्‍या उनकी जानकारी में ऐसी कोई सूची थी. लेकिन यहां भी निराश होना पड़ा. अलबत्ता इतना अवश्‍य हुआ कि वे अपनी याददाश्‍त के बल पर व माता-पिता से सुनें वे कार्य गिनानें लगें जो ऊर्दू या फारसी में किए जाते थे. पुस्‍तकॉलय आदि की खाक छानने पर कुछेक कार्यो की भाषा का उल्‍लेख तो अवश्‍य कई स्‍थानों पर पढ़ा. लेकिन मैं वह सूची नहीं खोज पाया जिसमें यह उल्‍लेख मिले कि उन सभी कार्यो में कौन-कौन से कार्य आते थे.

अत: मैं समझ गया कि ऐसी कोई सूची बनाई ही नहीं गई थी. अर्थात संविधान में पंद्रह वर्ष की जो शर्त रख कर/लगा कर हिन्‍दी को विकलांग बनाया गया था उसके साथ-साथ बैशाखियां भी हटा दी गई थी और फिर इसी अनुच्‍छेद के खंड-3 में पंद्रह वर्ष बाद भी कानुन बना कर अंग्रेजी के प्रयोग को सुनिश्चित करने का अवसर देकर हिन्‍दी भाषा की राजभाषा के रूप में स्‍थाई विकलांगता का बंदोबस्‍त भी कर दिया गया था.

इसी खोज के दौरान संविधान के अनुच्‍छेद 120 तथा 210 पर नजर गई. तो देखा कि इन अनुच्‍छेदों में क्रमश: संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा तथा विधान-मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा का उल्‍लेख है - भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संसद (अनुच्‍छेद 210 में यहां विधान-मंडल शब्‍द है) में कार्य हिंदी  में या अंग्रेजी में किया जाएगा. दोनों ही अनुच्‍छेदों के खंड (2) कहते हैं कि जब तक संसद (अनुच्‍छेद 210 में यहां विधान-मंडल शब्‍द है) विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात्‌ यह अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो   “या अंग्रेजी में”  शब्दों का उसमें से लोप कर दिया गया हो.

एक आस बंधी की शायद ऐसे उपबंध न किए गए हों और “या अंग्रेजी में” शब्‍दों का उसमें से लोप हो गया हो व संसद और विधान मंडलों की भाषा सिर्फ हिन्‍दी या राज्‍य की राजभाषाएं ही रह गई हों. लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी. हमारे देश में किसी भी आवश्‍यक विधि के निर्माण में देरी हो सकती हैं लेकिन राजभाषा की स्‍थाई विकलांगता के लिए विधि निर्माण में कभी भी देरी नहीं हुई.

यहां संविधान का उल्‍लेख करने का कारण है हमारी मानसिकता के बारे में बताना. हम कितने विद्वान थें कि संविधान के निर्माण के समय ही भविष्‍य के दर्शन कर लिए थे. हमें पता था कि भविष्‍य केवल अंग्रेजी का है, हिन्‍दी का नही. इसलिए हमनें संविधान में ऐसे प्रावधान किए.

अब प्रारंभ में उल्लिखित समाचार के बारें में लिखनें का कारण, वह यह है कि 14 सिंतबर का दिन फिर आ गया हैं. जिसे हम और आप हिन्‍दी दिवस के रूप में जानते हैं. लेकिन हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हिन्‍दी के बारे में नियमों की अवहेलना कौन कर रहा है ? यदि किसी सरकारी कार्यालय में राजभाषा हिन्‍दी के नियमों की अनदेखी हो रही है तो फिर यह खबर कैसे हो सकती है ? खबर तो केवल ऐसी सनसनी बन सकती है जो बिक सके. या फिर हमारे अंग्रेजीदां संवाददाताओं को लुभा सके. यह खबर कैसे हो सकती है कि हिन्‍दी दिवस फिर आ गया है लेकिन राजभाषा नियमों की अवहेलना हो रही है व राजभाषा के रूप में हिन्‍दी आज भी सक्षम क्‍यों नहीं बन पा रही है ? कारण केवल इतना है कि राजभाषा अधिनियम व नियमों की अवहेलना के लिए दंड का प्रावधान ही नहीं है. इसलिए हिन्‍दी पर खबर कैसे हो सकती है ?

- अरविन्‍द पारीक



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

K M Mishra के द्वारा
13/09/2010

हिंदी को भले ही राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जा सका है पर दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा विश्वविद्यालयों में आज हिन्दी पढ़ाई जा रही है । आज दुनिया के बहुत से देशों में जहां जहां भारतवंशी रह रहे हैं हैं वहां हिंदी फल फूल रही है । इंटरनेट पर तेजी से फैलने वाली भाषा भी आज हिंदी ही है और दुनिया का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार भी हिंदी में प्रकाशित होने वाला अखबार दैनिक जागरण है । संविधान के अनु0 343 से 351 को देख कर यही लगता है कि हिंदी को टूटी हुयी बैसाखियां ही दी गयी हैं लेकिन हिंदी आज किसी बैसाखी की मोहताज नहीं है । हिंदी का संवैधानिक पक्ष हम सब के सामने रखने के लिये अरविंद जी आपका बहुत बहुत आभार ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, मैं आपकी बात से सहमत हूँ हिन्‍दी दिन-प्रतिदिन फल-फूल रही है । मैं वैसे कानुन का ज्ञाता नहीं हूँ तथापि अपनी एमए की पढ़ाई के दौरान संविधान के बारे में कुछ पढ़ा था तभी से कुछेक सवाल मन मस्तिष्‍क में छाए हुए थे । उन्‍हें गाहे-बगाहें लेखनी में उतार देता हूँ । आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ । अरविन्‍द पारीक

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
12/09/2010

प्रिय अरविंद जी, मै आप की बात से सहमत हूं की यह खबर कैसे हो सकती है, आज अंग्रेजी का वर्चस्‍व इतना गहरा गया है कि उस को उखाड़ फेकने में अभी बहुत समय लगेगा। यह एक बहुत लम्‍बी लड़ाई है। – दीपक जोशी

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय दीपक जोशी जी, मेरे कथ्‍य से सहमत होने के लिए आभार । आपकी टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
12/09/2010

प्रिय अरविन्द जी, यह अवसोस का विषय है की हम आज़ाद होने के इतने वर्षों बाद भी हिंदी को उसका स्थान नहीं दे पाए है ! जबकि क्षेत्रीय भाषाएँ अपने अपने क्षेत्र में लागु हो चुकी है पर राष्ट्रभाषा लागु नहीं हो पाई ! ठीक है हमें किसी भी भाषा का अपमान नहीं करना चाहिए परन्तु अपनी भाषा भी न लागु कर सके यह कहाँ तक ठीक है ! लेखक तो केवल लिख कर भी चिल-पों मचा सकते है करने वालों पर जूं नहीं रेंगती ! खुराना

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, मेरे कथ्‍य का समर्थन करनें के लिए मैं आपका आभारी हूँ । लेकिन कभी-कभी लेखक के लिखे को पढ़ कर भी अनेक निर्णय ले लिए जाते हैं । भले ही उसका श्रेय लेखक को ना मिलें । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

आर.एन. शाही के द्वारा
12/09/2010

चातक जी के तर्क़ अकाट्य व विचारणीय हैं । विभिन्नताओं में एकता वाले इतने विशाल देश में यदि संख्या के आधार पर पूर्ण बहुमत किसी व्यवस्था को न मिल पाए, तो उसे ज़बरन थोपने पर हमेशा कैंसर जैसे विवाद ही पैदा हुए हैं । लेकिन यह भी विडम्बना ही है कि समीकरण संतुलित न हो पाने के कारण हम अपनी किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्ज़ा शायद कभी भी न दिला पाएं । अंग्रेज़ी को ढोकर अनंतकाल तक चलते रहना हमारी बाध्यता दिखती है, जबकि बिना अपनी भाषा अपनाए पूर्ण और सर्वांगीण विकास भी हमेशा टेढ़ी खीर ही साबित होता रहेगा । अच्छी पोस्ट के लिये बधाई ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री शाही जी, निस्‍संदेह ये कैंसर जैसा विवाद ही है । जिसका यदि समय पर इलाज हो जाता तो बेहतर था । अब तो इलाज की उम्‍मीद करना भी बेकार है । आपकी टिप्‍पणी के लिए आभारी हूँ, धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Piyush Pant के द्वारा
12/09/2010

पारीक जी………. संविधान के बिन्दुओं के साथ आपने अपनी तथ्यों को प्रस्तुत किया……… जिस कारण लेख और सुन्दर बन सका………. पर हिंदी की उपेक्षा में हम खुद कितने दोषी हैं…. हमारे बच्चे हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढने की जगह अंग्रेजी माध्यम में पढ़ते हैं………… हम अब छोटे छोटे बच्चों को सेब का नाम apple ही बताते हैं और फिर हम हिंदी भाषा के लिए नारे लगते हैं…………….

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री पीयुष पंत जी, प्रशंसा के लिए आभारी हूँ । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
12/09/2010

प्रिय श्री पारीक जी, कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे हिंदी भाषा न बनकर सिर्फ एक मुद्दा है जिसे जब-तब मौका पाकर उठाया जाता रहा है | हिंदी को राष्ट्र-भाषा बनाने के लिए अक्सर जिरह बहस देखी जा सकती है | फिर भी एक प्रश्न तो उठता है कि जिस देश में सबसे ज्यादा बोली-समझी जाने वाली भाषा अंग्रेजी हो वहां राजकीय कार्यों में हिंदी का प्रयोग किया भी कैसे जाय | दूसरा प्रश्न यह है कि हिनुस्तान में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा तमिल है न कि हिंदी, ऐसे में हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देना कहाँ तक तर्कसंगत है | हमें क्षेत्रवाद से थोडा ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है | हिंदी का उत्थान संसद (केंद्र) से नहीं, अपितु उत्तरप्रदेश और कुछ हद तक उत्तराखंड, बिहार और मध्यप्रदेश राज्यों से है यहाँ भी हिंदी प्रमुख भाषा तो जरूर है लेकिन अधिकतम लोगों के लिए प्रथम भाषा हिंदी न होकर कोई बोली है (अवधि, ब्रज, भोजपुरी, गढ़वाली, कुमायूनी, मैथिलि, आदि)| हमारे देश के लिए जिसके लिए बुजुर्ग कहते हैं – ‘कोस-कोस पर पानी बदलै, तीन कोस पर बानी’ भाषा और बोली जैसी बातें बहस और श्रेष्ठता का नहीं अपितु गर्व का मुद्दा होना चाहिए| किसी भी भाषा से दुराव या किसी भी भाषा से द्वेष उचित नहीं, अंग्रेजी से भी नहीं क्योंकि दुनिया जानती है कि अंग्रेजी में आज भी हिन्दुस्तानियों से बेहतर कोई नहीं | सरकारी दफ्तर तो नियमो की अवहेलना के लिए ही बनाये जाते हैं सो वे अपना काम बेहतर रूप में अंजाम दे रहे हैं| अच्छी पोस्ट और सुव्यवस्थित पोस्ट पर बधाई!

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री चातक जी, आपकी विस्‍तृत व ज्ञानवर्धन करती टिप्‍पणी के लिए मैं आभारी हूँ । तथापि मेरे लिखनें का आशय केवल यह था कि संविधान में राजभाषा के रूप में हिन्‍दी को स्‍वीकारते समय ही 15 वर्ष की अवधि का खंड न डालकर यदि सीधे ही राजभाषा स्‍वीकार लिया जाता तो सरकारी कार्यालयों में हिन्‍दी की अवहेलना नहीं होती । और सरकारी कार्यालय हिन्‍दी दिवस के नाम पर सप्‍ताह व पखवाड़े का आयोजन नहीं करते, न जाने कितने सरकारी खर्च की बचत हो जाती । अरविन्‍द पारीक

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    चातक जी मेरा भी किसी भी भाषा से दुराव या किसी भी भाषा से द्वेष नहीं है, अंग्रेजी से भी नहीं लेकिन जब मीडिया हिन्‍दी के साथ हो रहे व्‍यवहार को खबर नहीं समझता तो टीस तो होती ही है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Ramesh bajpai के द्वारा
12/09/2010

यहां संविधान का उल्‍लेख करने का कारण है हमारी मानसिकता के बारे में बताना. हम कितने विद्वान थें कि संविधान के निर्माण के समय ही भविष्‍य के दर्शन कर लिए थे. हमें पता था कि भविष्‍य केवल अंग्रेजी का है, हिन्‍दी का नही आदरणीय पारीक जी ” अच्छी ”खबर ” की असलियत को उजागर कर आपने वास्तव में उसकी खबर ली है बहुत बहुत बधाई

    Vivek Aggarwal के द्वारा
    12/09/2010

    पारीकजी, हिंदी दिवस पर आपका ये लेख सामयिक है. वास्तव में हम हिंदी को अपनी तो क्या सरकारी भाषा भी नहीं बना पाए है. ये तो केवल ग्रामीणों की भाषा ही बन कर रह गयी है. vivek

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    आदरणीय वाजपेयी जी, प्रशंसा के लिए आभारी हूँ बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री विवेक अग्रवाल जी, आपनें सटीक टिप्‍पणी दी है । हिन्‍दी को वास्‍तव में ग्रामीणों की भाषा ही समझा जा रहा है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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