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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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सौहार्द के प्रतीक धार्मिक उत्‍सव

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आज भाईजी अचानक घर पर आ धमकें । मैं आश्‍चर्यचकित था जो भाईजी किसी के भी घर नहीं जाते वे अचानक मेरे घर । मैं कुछ पूछता उससे पहले ही भाईजी बोले, ‘अरे भाई पारीक जी, वो जो आपको तृतीय पुरस्‍कार का सोनी का डिजीटल कैमरा मिला है जागरण ब्‍लॉग लिखनें पर, जरा निकालिए तो सही उसे । क्‍या रखे-रखे जंग लगाएंगें ? और हॉं, तैयार हो जाइयें बस थोड़ा घूम कर आना है ।’

 

मैं भाईजी की अचानक इस मांग व आमंत्रण का कारण ढुँढनें लगा । क्‍या भाईजी ने इस कॉमनवैल्‍थ के भ्रष्‍टाचारी युग में कोई ईमानदार देख लिया हैं ? अथवा यातायात नियमों का उल्‍लंघन करने वालों की भीड़ अचानक यातायात नियमों का पालन करने व लेन में चलने लगी है ? अथवा किसी सरकारी कार्यालय में सारे कर्मचारी सही समय पर पहुँच कर अपना काम निपटानें लगें हैं या फिर …….

 

मैं कुछ और सोच पाता उससे पहले ही भाईजी ने टोका, ‘लगता है आपने ऐसे ही झूठ बोल दिया था कि जागरणजंक्‍शन की सीईओं सुश्री सुकीर्ति गुप्‍ता के करकमलों से आपकों सोनी का डिजीटल कैमरा पुरस्‍कार में मिला है । चलिए कोई बात नहीं, अब साथ तो चलिए । आपकों कुछ दिखाना है ।’ यह सीधे-सीधे मेरे आत्‍म-सम्‍मान पर चोट थी । इसलिए मैंनें जल्‍दी से कैमरा निकाला और भाईजी को पकड़ा दिया और बोला, ‘देख लीजिए, ये है वो कैमरा । जो पुरस्‍कार में मिला है ।’

 

‘ठीक है, ठीक है । मुझे पता है आप झूठ नहीं बोलते । लेकिन कैमरा निकलवानें के लिए मुझे ऐसे बोलना पड़ा । माफ कीजिएगा ।’ भाईजी की यही खासियत है कि वे अपनी गलती पर माफी मॉंगनें से कभी नहीं चूकते । इसी कारण सर्वप्रिय है ।

 

खैर कैमरा हाथ में उठाये हम दोनों सादिक नगर, नई दिल्‍ली पहुँच गए । देखा, एक मैदान है जिसके एक किनारें पर मस्जिद बनी है व दूसरे किनारें पर मंदिर । मस्जिद व मंदिर के बीच स्थित उस मैदान में भारी भीड़ है । भीड़ की वजह थी जन्‍माष्‍टमी महोत्‍सव का आयोजन ।

 

यहां ज्ञात हुआ कि 1986 में श्री बसन्‍त नाथ सैन द्वारा स्‍थापित ‘शिवमूर्ति कला संगम’  ने जन्‍माष्‍टमी महोत्‍सव का आयोजन किया है । 1986 से निरंतर आयोजित किया जाने वाला यह समारोह सदैव ही मस्जिद के सानिध्‍य में आयोजित किया गया है । भले ही वह बाबरी मस्जिद ढहनें का वर्ष हो या देश में कहीं सांप्रदायिक आग लगी हो । इसके आयोजन में कभी भी कोई परेशानी नहीं आई है । इसके आयोजन में केन्‍द्रीय लोक निर्माण विभाग, दिल्‍ली पुलिस व रेजिडेंट एशोसियेशन, सादिक नगर एवं सांवल नगर निवासियों का भी सहयोग सदैव मिलता रहा है ।

 

मैं भाईजी की बात समझ चुका था । सांप्रदायिक सदभाव का अनुठा नजारा था ये । लीजिए आपके लिए भी प्रस्‍तुत हैं इसकी कुछ झलकियां :-

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क्‍या आपकों नहीं लगता कि हमारे देश में आयोजित होने वाले ये धार्मिक उत्‍सव हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था के महत्‍वपूर्ण अंग है, जो समाज में स्‍नेह, प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द व सदभाव, सहनशीलता एवं एकता बढ़ाते हैं ?

 

आपके विचार/आपकी राय/आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी ।   

 

- अरविन्‍द पारीक



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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Basant Nath Sain के द्वारा
11/10/2010

पारीख जी, धन्यवाद्. आपके माध्यम से संगम की गतिविदियों उज्जागर हुई हैं. संगम के बारे में अपने ब्लॉग बहुत ही सुंदर तरीके से जानकारी देने के लिए मैं आपका आभारी हूँ. संगम में सदस्य भारत के करीब हर स्थान / राज्य से हैं. कश्मीर से लेकर केरल तक, गुजरात से बंगाल तक के निवासी संगम के साथ जुड़े हैं, संगम के सदस्य हैं. श्री स. म. अब्बास जो कि मुस्लिम समुदाय से हैं और श्री गुरचरण सिंह, श्रीमती कौर जो कि सिख समुदय के पुरुष तथा महिला हैं, वे भी संगम के सदस्य हैं और संगम के कार्यो में तन मन और धन से साथ देते हैं. संगम को आप मिनी भारत भी कह सकते हैं. संगम विधार्थियों को शिक्षा अर्जन हेतु कॉपी किताबें ड्रेस स्वेस्टर आदि भी वितरिक किये जाते हैं. चित्रकला तथा निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमे हर प्रतियोगी को पुरष्कार दिया जाता है, प्रथम दितीय तथा त्रितय स्थान प्राप्त करने वालो को अलग से पुरष्कार दिए जाते हैं. एक बार फिर से आप को धन्यवाद्.

    Arvind Pareek के द्वारा
    28/10/2010

    प्रिय श्री वसंत नाथ सैन जी, नमस्‍कार । शिव मुर्ति कला संगम के बारे में अज्ञात जानकारियों को सार्वजनिक करनें पर मैं आपका आभारी हूँ । आपनें ठीक लिखा है कि शिव मुर्ति कला संगम मिनी भारत है । सर्वधर्म समभाव की झलक देने वाली आपकी इस संस्‍था की स्‍थापना के लिए आप बधाई के पात्र हैं ।  मैं यही कामना करूँगा कि यह संस्‍था इसी तरह समाज कल्‍याण व संस्‍कृति की संरक्षा के कार्य निरंतर करती रहे । मेरा सुझाव है कि आप संस्‍था के कार्यो की झलक सभी तक पहुँचाने के लिए अपनी संस्‍था का एक ब्‍लॉग बना लें अथवा http://www.Indiaeleven.com जैसी वेबसाईट पर अपनी फ्री साईट या ब्‍लॉग बना सकते हैं । इसके माध्‍यम से आप अपनें सदस्‍यों को सूचना भी दे सकते हैं । अरविन्‍द पारीक

soham joshi के द्वारा
07/10/2010

े्े्गगग

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
24/09/2010

प्रिय श्री रितेश जी व विवेक अग्रवाल जी, मैंनें आपके अनुरोध को पुरा कर दिया है । मंदिर व मस्जिद की फोटो भी डाल दी है । दोनों स्‍थानों के बीच मुश्किल से 150 मीटर का फासला है । अरविन्‍द पारीक

    Ritesh के द्वारा
    28/09/2010

    भाईजी आपका धन्‍यवाद आपनें मेरें अनुरोध को मान कर मंदिर व मस्जिद के फोटों यहां डाल दिए हैं । अब पता चलता हैं कि मस्जिद के सानिध्‍य से आपका अभिप्राय क्‍या था । बिलकुल मस्जिद की दीवार से सटकर होने वाला यह आयोजन वास्‍तव में धार्मिक सौहार्द का प्रतीक है । इस अच्‍छी जानकारी को देने के लिए आपका आभार । रितेश

    Vivek Aggarwal के द्वारा
    30/09/2010

    धन्‍यवाद, पारीक जी । आपनें मेरे व रितेश जी के अनुरोध पर मंदिर व मस्जिद के फोटो यहां अपलोड किए । आज अयोध्‍या पर फैसला आने वाला है । मैं तो चाहूँगा उसे सभी को तहे दिल से स्‍वीकार करना चाहिए । और आपके द्वारा अपलोड किए गए इन चित्रों को देखें कि कैसे मस्जिद की दीवार के साथ धार्मिक उत्‍सव का आयोजन अनेकों वर्ष से किया जा रहा है । मुझे लगता है भारत में ऐसे सैंकड़ो उदाहरण होंगें । उन्‍हें भी सामनें लानें की जरूरत है । जागरण के ब्‍लॉगर ऐसा कर सकते हैं । विवेक

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/10/2010

    प्रिय श्री रितेश जी व श्री विवेक अग्रवाल जी, आपका धन्‍यवाद की आपनें पुन: इस ब्‍लॉग को देखा व अपनी टिप्‍पणियों से मेरा उत्‍साह बढ़ाया । धर्म क्‍या है, इस पर राय अलग-अलग हो सकती है लेकिन इस पर कोई दो राय नहीं हैं कि कोई भी धर्म लड़नें-झगड़नें की बात नहीं करता हैं । अरविन्‍द पारीक

Vivek Aggarwal के द्वारा
12/09/2010

मैं रितेश जी के कमेंट्स को दोहराना चाहूंगा. सादिक नगर में हुए समारोह की फोटो बहुत सुंदर है । लेकिन मस्जिद किधर व मंदिर किधर है ज्ञात नहीं होता । शायद आप वे फोटो भूल गए हैं । फिर भी आपने बहुत ठीक लिखा है. विवेक

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री विवेक जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । मंदिर व मस्जिद की फोटो भी शीघ्र अपलोड करूँगा । अरविन्‍द पारीक

saday के द्वारा
07/09/2010

आदरणीय अरविन्दजी आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है और जो फोटो आपने दिखाई है, वो मनमोहक हैं! सदय

    Arvind Pareek के द्वारा
    08/09/2010

    प्रिय सदय, यदि कोई शब्‍द प्रतिक्रिया से छुट जाए तो दूबारा प्रतिक्रिया देने की आवश्‍यकता नहीं होती । फोटो पसंद आई व ब्‍लॉग अच्‍छा लगा उसके लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

saday के द्वारा
07/09/2010

अरविन्दजी, आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है और जो फोटो आपने दिखाई है, वो मनमोहक हैं! सदय

    Arvind Pareek के द्वारा
    08/09/2010

    धन्‍यवाद सदय ।

Ritesh के द्वारा
07/09/2010

भाईजी आपनें बिलकुल ठीक लिखा है कि हमारे देश में आयोजित होने वाले ये धार्मिक उत्‍सव हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था के महत्‍वपूर्ण अंग है, जो समाज में स्‍नेह, प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द व सदभाव, सहनशीलता एवं एकता बढ़ाते हैं । तभी तो ईद पर ईदी की याद आती है और क्रिसमस पर केक की । अन्‍यथा क्‍या हम जान पाते कि ये त्‍यौहार कैसे मनाए जाते हैं । सादिक नगर में हुए समारोह की फोटो भी बहुत सुंदर है । लेकिन मस्जिद किधर व मंदिर किधर है ज्ञात नहीं होता । शायद आप वे फोटो डालना भूल गए हैं । रितेश

    Arvind Pareek के द्वारा
    08/09/2010

    प्रिय श्री रीतेश जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । जहां तक मस्जिद व मंदिर के फोटो की बात है मुझे एक चक्‍कर उस मैंदान का दिन में और लगाना होगा तभी फोटो मे मस्जिद व मंदिर देख पाएंगें । क्‍योंकि बहुत प्रयास करने पर भी रात्रि के इन फोटो में मस्जिद व मंदिर के फोटो नहीं आ पाएं हैं । अरविन्‍द पारीक

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
05/09/2010

सर मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ कि धार्मिक उत्‍सव हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था के महत्‍वपूर्ण अंग है, जो समाज में स्‍नेह, प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द व सदभाव, सहनशीलता एवं एकता बढ़ाते हैं | इनके आयोजन से शान्ति भंग नहीं हो सकता, हाँ शांति भंग और सौहार्द बिगड़ने ने पीछे सबसे बड़ा कारण होता है, ओच्ची प्रवित्ति के लोगों, उनके द्वेषी सहभाव और निंदनीय आचरण के अपरोक्ष प्रहार से | बधाई .

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/09/2010

    प्रिय श्री शैलेश कुमार पांडेय जी, मेरे मंतव्‍य के साथ सहमति रखनें के लिए आभार व आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । आपनें शांति भंग होने का कारण सही लिखा है । ओछी प्रवृति के लोगों की मानसिकता ही इसे भंग करती है । अरविन्‍द पारीक

poonam के द्वारा
04/09/2010

आदरणीय पारीक जी,आज बहुत दिनों के बाद आपका ब्लॉग फिर से पढने का मौका मिला,हमेशा की तरह प्रभावित हुए बिना न रह सकी| पिछले ४ ब्लोग भी अभी पढ़े,केफे कभी -कभी ही आ पाती हूँ,अपनी मेल देखती हूँ व ब्लोग्स पढ़ती हूँ |यही मेरे शौक है| आपकी बात बिलकुल सही है,यह धार्मिक उत्सव सौहार्द के प्रतीकही तो है तभी तो जन जन इससे जुड़ा है फिर चाहे वो किसी धर्म का हो |पर अफ़सोस चंद स्वार्थी लोग अपना मतलब साधने के लिए इसका गलत फायदा उठा लेते है |पर समझ नहीं पाती की इतना कुछ हमारे इर्द गिर्द रोज घटित होता है,पर लोग उनकी बातो में क्यों आ जाते है ?क्यों नहीं समझ पाते उनकी चाल?धारावाहिक में तो टी.आर.पी.के लिए हीरो बुद्धू होता है,असल जिन्दगी के हीरो (आम आदमी )को क्या हो जाता है? क्यों बिक जाता है इन चालबाजों के हाथ?धार्मिक उत्सव शायद उसे सही राह दिखाने का भी काम करते है,इनके आयोजनों में हर धर्म की रोज़ीरोटी जुडी होती है |आपके इस ब्लॉग के जरिये हमें भी अपने दिल की बात सभी से कहने का मौका मिल जाता है तहेदिल से आभारी हूँ | सादर वन्दे पूनम

    bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
    06/09/2010

    प्रिय पूनम, प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । आम् आदमी पढ़-लिख कर भी बहती हवा के साथ बहने की ‘काबिलियत’ रखता है । इसलिए वह भी धारावाहिकों के हीरों की तरह हैं । और अनपढ़ के लिए तो उससे अधिक जाननें वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति हीरों होता है । इसलिए वो उनकी बातों में जल्‍दी फँस जाता हैं । अपनी बात को व्‍यक्‍त करनें का से ही ब्‍लॉग बनता है । इसलिए ब्‍लॉग बनाओं और लिखनें लग जाओं । अरविन्‍द पारीक

Tufail A. Siddequi के द्वारा
04/09/2010

निष्कर्ष ये निकलता है की इस देश में होने वाले सभी प्रकार के अधिकांश सांप्रदायिक, भाषाई, जातीय, एवं शेत्रीय दंगे आदि पूर्व नियोजित और प्रायोजित होते है.

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/09/2010

    प्रिय श्री सिद्दकी साहेब, आपनें बहुत सही निष्‍कर्ष निकाला हैं । दंगें अधिकांशत: पूर्व नियोजित और प्रायोजित ही होते हैं । क्‍योंकि इनकी आड़ में कुछेक तत्‍वों को अपने स्‍वार्थो की पूर्ति करनी होती है । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

आर.एन. शाही के द्वारा
04/09/2010

आपने बहुत सही कहा पारीक जी, त्योहार कभी भी समाज को जोड़ने और भाईचारे का संदेश देने के लिये ही आते हैं, चाहे किसी भी धर्म या मजहब से जुड़े हों ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/09/2010

    प्रिय श्री आर.एन. शाही जी, मेरी बात का समर्थन करनें व प्रतिक्रिया देकर उत्‍साह बढ़ानें के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Deepak Joshi के द्वारा
04/09/2010

अरविंद जी आप ठीक कह रहे है आज के दिनों में केवल यही कुछ त्यौहार ही रह गए है जैसे शिवरात्रि, जन्मादष्टवमी, नवरात्रा, ईद, एवं दशहरा जिस में हम लोगों का श्रद्धा से एक जुट होकर समाज में स्नेह, प्रेम, एवं सांप्रदायिक सोहार्द के दर्शन कर पाते है। हमारे समाज में भेद भाव है नही पर कुछ असमाजिक तत्व इस प्रेम को देख कर जलते है और किसी न किसी बात पर उसे भड़का कर झगड़े का रूप दे देते है जिस से हमारे बीच दीवार खिच जाती है। मैं आप को बताना चाहुँगा कि आपकी इस पोस्टन को पढ़कर मुझे भी ब्लॉकग लिखने की प्रेरणा मिली है । इसलिए मैंनें जागरण जंक्शकन व इंडिया इलेवन पर अपने ब्लॉॉग बनाएं हैं । कृपया उन्हें देखें व अपनी राय से अवगत कराएं । http://www.deepakjoshi63.jagranjunction.com http://www.indiaeleven.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/09/2010

    प्रिय श्री दीपक जोशी जी, आपनें इस पोस्‍ट को पढ़नें के लिए समय निकाला व अपने ब्‍लॉग भी लिखें तो लगा कि मेरी मेहनत का फल भी मुझे मिल गया है । उस पर आपकी टिप्‍पणी वाकई सोने पे सुहागा हो गया है । आपनें बहुत ही सटीक विचार व्‍यक्‍त किए हैं । मैं आपके बलॉग अवश्‍य पढुँगा । आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

rajkamal के द्वारा
03/09/2010

bhai ji … इन स्वार्थी और मतलबी नेताओ ने जनता को बेवकूफ बना कर इस समाज में इतनी विसंगतिया पैदा कर दी है की …. अब हम सबको….. जनता को जोड़ने वाले इन सांझे उत्सवों की गरिमा को को न केवल कायम रखना है बल्कि और भी ऊँची उच्चाई पर ले जाना है … उम्मीद करता हू की आपके इस इनाम के और भी कमाल हम सबको भविष्य में जल्द ही देखने को मिलेंगे ….

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    प्रिय श्री राजकमल जी, बहुत दिनों बाद अपने उत्‍कृष्‍ट विचारों से अवगत करानें व उत्‍साह बढ़ानें के लिए आपका धन्‍यवाद । तथापि रोशनी जी को लिखे जवाब को यहां दोहरा रहा हूँ कि क्‍या आपको नहीं लगता कि हम भेड़-बकरियां हैं जिन्‍हें ये नेता जब चाहे जिधर चाहें हॉंक दें । नहीं ना, फिर इसके लिए तो दोषी हम ही हुए जो जरा सी बात से भड़क जाते हैं । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Piyush Pant के द्वारा
03/09/2010

परिक साहब ……….. वास्तव में लेख अच्छा है…….. और चित्रों के संयोजन से इसे और सुन्दर बना दिया है………. आपके इस लेख के सन्दर्भ में केवल यही कहना चाहता हूँ की …… वास्तव में त्यौहार का अर्थ ही आपसी मतभेद भुला कर त्यौहार को साथ मानना है……….. पर अब हम त्योहारों को केवल अपनी हैसियत दिखने और अपने तक समेटने तक सिमित रह गएँ है……….. होली में आपसी बैर भाव भुला कर दोस्ती करने की जगह उसी दिन शराब पी कर झगडा कर वर्षों पुराने सम्बन्ध समाप्त कर ले रहे है…………… इस त्योहारों का अर्थ समझते समाज को आइना दिखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं ……. धन्यवाद…………………..

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    प्रिय श्री पीयुष पंत जी, आपके विचार काफी सुलझे हुए हैं । मेरे कथ्‍य को और स्‍पष्‍ट करने व प्रतिक्रिया तथा बधाई के लिए आपका धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Ramesh bajpai के द्वारा
03/09/2010

धार्मिक उत्‍सव हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था के महत्‍वपूर्ण अंग है, जो समाज में स्‍नेह, प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द व सदभाव, सहनशीलता एवं एकता बढ़ाते हैं ?.. आत्मीय श्री पारीक जी पुरस्कार में प्राप्त कैमरे का इतना सुन्दर और सामयिक प्रयोग अति प्रसंसनीय है सामाजिक प्रेम को दर्शाती आपकी पोस्ट की जितनी तारीफ की जाय कम है बहुत बहुत बधाई

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    प्रिय श्री वाजपेयी जी, जिस स्‍नेह व प्रेम से आप प्रतिक्रियाएं देते हैं व प्रशंसा करते है वह वंदनीय है । मैं आपका आभारी हूँ । प्रशंसा व बधाई के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
03/09/2010

प्रिय अरविन्द जी, बिलकुल ठीक कहा आपने ! यह उत्सव भाईचारा भी बढ़ाते है और एकरसता को समाप्त करके फिर से हमें काम करने के लिए उत्साहित करते है ! जैसे धूप में चलते चलते मनुष्य दो पल पेड़ की ठंडी छाव में आराम करके फिर से कड़ी धूप में चलने के लिए नई उर्जा पा लेता है ! राम कृष्ण खुराना

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, आपकी प्रतिक्रिया सदैव कुछ नया सीखा जाती है । नई ऊर्जा नया उत्‍साह प्रदान करने के लिए आपका धन्‍यवाद । सदा की तरह पोस्‍ट पब्लिश होने ही प्रतिक्रिया देने के लिए भी धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
03/09/2010

स्नेही श्री पारीक जी, भाई जी की बात कभी गलत नहीं होती | हमारे त्यौहार कभी भी सौहार्द बिगाड़ते नहीं हैं बल्कि आपसी विश्वास और सहयोग को और ज्यादा मजबूत करते हैं | आपने इस धार्मिक आयोजन की तस्वीरें यहाँ मंच पर पोस्ट करके धार्मिक सहयोग और अंतर्संबंधों का बेहतर प्रमाण प्रस्तुत किया है| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    आत्‍मीय चातक जी, सदैव की तरह उत्‍साह बढ़ाती व कुछ नया करने को प्रेरित करती प्रतिक्रिया के लिए आभार । जब आप किसी पोस्‍ट को देख कर भी प्रतिक्रिया नहीं देते तो लगता है अभी प्रतिक्रियाएं अधुरी है । आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

roshni के द्वारा
03/09/2010

अरविन्‍द पारीक जी ये धार्मिक उत्‍सव हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था के महत्‍वपूर्ण अंग है, जो समाज में स्‍नेह, प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द व सदभाव, सहनशीलता एवं एकता बढ़ाते हैं, इस बात से मै पूरी तरह सहमत हूँ.. यु भी देखा जाये तो देश में सब धर्मो के लोग आपस में प्यार से ही रहते है … बस ये नेता ही है जो सांप्रदायिक आग लगाते है… धन्यवाद सहित

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    सुश्री रोशनी जी, मैं आपकी बात को दूसरा रूप देना चाहूँगा । क्‍या आपको नहीं लगता कि हम भेड़-बकरियां हैं जिन्‍हें ये नेता जब चाहे जिधर चाहें हॉंक दें । नहीं ना, फिर इसके लिए तो दोषी हम ही हुए जो जरा सी बात से भड़क जाते हैं । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Aakash Tiwaari के द्वारा
03/09/2010

अरविन्द जी मै आपके विचारों से बिलकुल सहमत हूँ, अगर हमारे देश में ये व्रत, त्यौहार,धार्मिक उत्‍सव न होते तो शायद हमारे देश में लोगों के बीच अन्य देशों की तुलना में इतना प्यार न होता.हमारे युवा जन को चाहिए की वो इस संस्कृति को और आगे ले जाएँ भारतवर्ष की संस्कृति को पूरे विश्व में जन-जन में फैला दें ताकि ये हजारो,लाखों वर्ष पुराना धर्म युग युगांतर तक चलता रहे. मै किसी और का तो नहीं जनता लेकिन इतना जरूर कहूँगा की मै अपने धर्म, संस्कृति,देश का तहे दिल से बहुत सम्मान करता हूँ. आपने इस सम्बन्ध में लिखा बहुत-बहुत शुक्रिया. आकाश तिवारी

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    प्रिय श्री आकाश तिवारी जी, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ, इस देश को अपने धर्म अपनी संस्‍कृति व इन सबसे बढ़कर देश को चाहनें वालों की ही जरूरत है । आपकी उत्‍साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    और हॉं आकाश तिवारी जी नई सोच न जाने कबसे एक पोस्‍ट की प्रतीक्षा कर रही है । उसे इस तरह निराश ना करें ।

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    04/09/2010

    आपको मेरी भावना अच्छी लगी सुक्रिया. अरविन्द जी मैंने “नयी सोच” का नाम बदल कर “बेवफाई” कर दिया है और प्रतिदिन कुछ न कुछ जरूर पोस्ट करता हूँ. आकाश तिवारी.

    afraz के द्वारा
    07/09/2010

    tulsi meethe bachan se sukh upje chahun aur , vashikaran ye mantra hai,par nahi bachan kathor. bhai mere me to sirf etnea he jaanta hu. vastivikta yahi hai,ki es desh ko yadi kisi ne barbaad kiya hai to sirf or sirf in netao ne.

    Arvind Pareek के द्वारा
    10/09/2010

    प्रिय श्री अफरोज जी, बहुत ही अच्छी बात लिखी है आपनें । निस्संदेह आपके जैसे सुलझे हुए विचारों की ही इस देश को जरूरत है । इसी तरह उत्साह बढ़ाते रहिए । और हां, जागरण जंक्शान के किसी भी ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पोस्ट या लेख के अंत में व सभी कमेन्टस से ऊपर लाल रंग में दिखाई देने वाले Post your comments पर क्लिक करके अपनी प्रतिक्रिया दिया करें । Reply बटन पर तभी क्लिक करना चाहिए जब आप किसी की दी गई प्रतिक्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं । इससे ब्लॉग लेखक को आपकी प्रतिक्रिया देखनें व पढ़नें व आभार व्‍यक्त करने में आसानी होगी । आशा है आप इस जानकारी को अन्य‍था न लेंगें । अरविन्द पारीक

Anita Paul के द्वारा
03/09/2010

 पारिक जी ,हर  पोस्ट कि तरह ये भी लाजवाब पोस्ट ,उत्कृष्ट पोस्टों  के लिये आप को बधाई ………………

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/09/2010

    सुश्री अनिता पॉल जी, आपकी प्रतिक्रिया व प्रशंसा के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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