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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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दो घटनाएं – हल आप बताएं

Posted On: 24 Aug, 2010 Others में

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भाईजी मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए चले आ रहे थे । पास आते ही मैंनें टोका – ‘कुछ गंभीर चिन्‍तन चल रहा हैं, क्‍या बात है ? क्‍या सोच रहे हैं ?’

 

‘अरे कुछ नहीं, बस दो ऐसी घटनाएं देखी कि मन कुछ विचलित हो गया ।’ भाईजी ने बड़े शांत भाव में जवाब दिया ।

 

मैंनें बात को जाननें की उत्‍सुकता को छिपाते हुए कहा – ‘तो फिर इस मन के बोझ को उतार फैंकिए, कुछ हमें भी तो बताइयें, शायद आपके मन को विचलित करने वाली समस्‍या का कुछ समाधान हो जाए ।’

 

‘अरे भाई, कल जब अस्‍पताल से स्‍टेशन आनें के लिए बस में चढ़ा तो देखा कि एक सीट को छोड़कर सारी सीटें भरी हुई है, और यह सीट भी महिलाएं शब्‍द के नीचे वाली हैं । इसलिए उस सीट को देखकर भी अनदेखा कर दिया । लेकिन मेरे साथ ही उस बस में चढ़ें एक कृशकाय प्रौढ़ सज्‍जन, जो देखनें से ही बीमार लग रहे थे, उस खाली सीट पर जा कर बैठ गए ।’

 

‘अच्‍छा, तो आपकों सीट ना मिलनें का गम सता रहा हैं, इसका समाधान है मेरे पास । खैर दूसरी घटना बताइयें ।’ मैंनें भाईजी को टोका ।

 

‘आपकी यही तो बुरी आदत हैं, बात को पूरा सुनते नहीं हैं, बस पहले ही निष्‍कर्ष निकला लेते हैं । जाइयें रहनें दीजिए होना भी क्‍या है बता कर ?’

 

‘माफ कीजिए भाईजी, अब बीच में नहीं बोलुँगा ।’ मैंनें भाईजी से क्षमा मांगते हुए कहा । लेकिन वे तो अब नाराज हो चुके थे । खैर उन्‍हें मनानें के लिए मैंनें पुन: क्षमायाचना के लिए अपने दोनों कानों को हाथ लगाया और कहा, ‘अरे भाईजी आप जब तक बोलनें के लिए नहीं कहेंगें, तब तक नहीं बोलुँगा, लेकिन बात तो बताइयें, जरूर कुछ गंभीर मसला है जो आप इस कदर परेशां हो गए हैं ।’

 

‘मसला तो गंभीर है ही, आप बीच में नहीं बोलेंगें तो सुनिए – उन सज्‍जन के महिला सीट पर बैठनें के बाद अगले बस-स्‍टॉप से एक लड़की गोद में बच्‍चा लिए बस में आ गई । सभी महिला सीटों पर महिलाएं ही बैठी थी, केवल उस एक सीट को छोड़कर, जिस पर वे बीमार कृशकाय प्रौढ़ सज्‍जन बैठे थे । उस लड़की को गोद में बच्‍चा लिए देखकर वे सज्‍जन अपनी सीट से खड़े होने का प्रयास करनें लगें लेकिन अशक्‍तता साफ झलक रही थी । वह लड़की समझ गई थी कि वे सज्‍जन उनके लिए सीट छोड़नें का प्रयास कर रहे हैं । इसलिए उसनें उन्‍हें विनम्रता से बैठे रहने के लिए कहा । उस लड़की का यह व्‍यवहार देखकर एक अन्‍य सज्‍जन जो सामान्‍य सीट पर बैठे थे, खड़े हो गए और अपनी सीट उसे बैठनें के लिए दे दी । ना-नुकुर करते-करते अंतत: वह लड़की अपने गोद में उठाए बच्‍चें के साथ उस सीट पर बैठ गई । अभी चार-पॉंच बस-स्‍टॉप ही निकले थे कि अब एक जींस-टॉप पहनें मंहगा फोन हाथ में उठाएं एक लड़की बस में आ गई । उसनें उन बीमार कृशकाय प्रौढ़ सज्‍जन को वहां बैठे देखा तो झट से उनकी सीट के पास आकर उन्‍हें महिला सीट होनें व खड़े होने का अनुरोध करने लगी । बेचारे बीमार सज्‍जन उस सीट से खड़े होने का प्रयास करनें लगें लेकिन अशक्‍तता के कारण खडे़ नहीं हो पा रहे थे । उनके साथ बैठी महिला ने उन्‍हें बैठे रहनें के लिए कहते हुए उस लड़की को उनकी असमर्थता व बीमारी का हवाला दिया और उसकी समर्थता का भान कराया । लेकिन वह लड़की उन आंटी को डॉंटकर उन बीमार सज्‍जन से उठनें के लिए कहनें लगी । वे सज्‍जन फिर खड़ें होनें का प्रयास करने लगे । इस पर मुझसे व अन्‍य कई यात्रियों से सहा नहीं गया । सब उस लड़की को समझानें लगें । उम्र का व बस में ज्‍यादा भीड़ न होने का हवाला भी दिया । लेकिन जैसे उस पर कोई असर नहीं होना था, न हुआ । वह कंडक्‍टर को शिकायत करने लगी । जब कंडक्‍टर उसे समझानें लगा तो उसकी भाषा अब किसी पढ़ी-लिखी समझदार भारतीय लड़की की जगह एक असभ्‍य, गँवार लड़की की हो गई थी । कुछ देर बाद ही मेरा स्‍टॉप आ गया । तो मैं बस से उतर कर सोचनें लगा कि क्‍या यही हमारी युवा पी‍ढ़ी की लड़कियां हैं ? लेकिन फिर उस लड़की के व्‍यवहार का ख्‍याल आया जो गोद में बच्‍चा लिए आई थी ले‍किन व्‍यवहार में कितनी विनम्रता व संस्‍कार झलक रहे थे हालांकि उम्र दोनों की एक जैसी लग रही थी ।’

 

मैंनें भाईजी की तरफ इस तरह देखा मानों पुछ रहा हूँ कि अब मैं बोलुँ ? भाईजी मेरे भावों को ताड़ गए थे । इसलिए मुस्‍कराएं और बोलें, ‘अभी नहीं पहले दूसरी घटना भी बता दूँ ।’ मैंनें अपनी सहमति सिर हिलाकर दी, क्‍योंकि न बोलनें का वचन जो दिया हुआ था ।

 

भाईजी बतानें लगे, ‘मैं अभी बाजार से आ रहा हूँ । एक दूकान पर मैं कुछ सामान खरीद रहा था । वह राखियां भी बेच रहा था । मैंनें देखा दो लड़कियां राखियां खरीद रही हैं । पहली, दूसरी को एक रेशमी धागा लेने के लिए कह रही थी लेकिन दूसरी वाली एक बड़ी सी चमकती हुई मंहगी-सी राखी खरीदना चाह रही थी । इसलिए उसनें पहली वाली लड़की को तर्क दिया कि मैं तो यही राखी खरीदूँगी, ताकि जब भैया को बॉंधूगी तो भैया से महंगा वाला स्‍मार्ट फोन मॉंग सकूँ । इस पर पहली वाली लड़की बोली और भैया ने महंगा वाला स्‍मार्ट फोन ना दिया तो । थोड़ी देर असमंजस में पड़ी वह लड़की बोली तो मैं भैया को राखी ही नहीं बाँधूगी । इस पर पहली वाली लड़की बोली इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्‍हें अपनें भाई से प्‍यार नहीं हैं । तू राखी केवल गिफ्ट लेनें के लिए बॉंधती हैं । इस पर वह तुनक कर बोली और किसलिए होता है यह त्‍यौहार, गिफ्ट लेने के लिए ही तो मैं राखी खरीद रही हूँ । नहीं तो घर में बहुत धागे पड़ें हैं । उनकी बात सुनकर मैं आगे चला आया । सोचनें लगा कि क्‍या आजकल की युवा पीढ़ी त्‍यौहार का अर्थ ही भूल गई हैं । ये भविष्‍य की माताएं अपनें बच्‍चों को क्‍या संस्‍कार देंगी ?’

 

तभी भाईजी को किसी ने पुकार लिया । भाईजी, अभी आता हूँ कह कर तेजी से उस ओर निकल गए जिधर से आवाज आई थी । मैं सदैव की तरह सोचनें के लिए अकेला रह गया । 

 

अच्‍छा, आप ही बताइयें कि क्‍या इन दोनों घटनाओं में लड़कियों के व्‍यवहार में कहीं से संस्‍कारों की झलक मिलती हैं ? क्‍या ऐसा ही व्‍यवहार आजकल के कुछेक युवकों में भी नहीं झलकता है ? क्‍या महिला सीट या आरक्षित सीट का यह अर्थ हैं कि उस पर बैठे किसी बूढ़े, अशक्‍त, बीमार व्‍यक्ति या बच्‍चें कों उठा दिया जाए, भले ही उसे कितनी भी परेशानी हो ? क्‍या आपकों लगता है कि हमारी युवा पीढ़ी त्‍यौहारों के वास्‍तविक रूप-रंग को भूलती जा रही है और उसे आधुनिकता के नाम पर बिगाड़ रही है ?

 

प्रश्‍न तो अनेक हैं । लेकिन सोचना हमें ही हैं कि क्‍यों नहीं हम अपनें बच्‍चों को त्‍यौहार, परिवार व रिश्‍तों के वास्‍तविक महत्‍व को समझातें ? क्‍यों हम उन्‍हें मनचाहा करनें की छूट देते-देते संस्‍कारहीन बना रहे हैं ?

 

- अरविन्‍द पारीक



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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Arvind Pareek के द्वारा
18/11/2010

प्रिय श्री अमित कुमार गुप्‍ता जी, एक पुरानी पोस्‍ट पर अब प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । कृपया अन्‍य पोस्‍ट भी पढ़ें व अपनी राय से अवगत करायें । अरविन्‍द पारीक

Amit kr Gupta के द्वारा
18/11/2010

अरविन्द जी ,हम जैसा होंगे वैसे ही हमारा कल होगा. आपका यह लेख मुझे बहुत ही अच्छा लगा. आप मेरे लेख पढने के लिए इस add पर जा सकते हैं. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

abc के द्वारा
04/10/2010

हेलो भाईजी! सोरी टू से देट दीस़ टू इन्सिडेन्टस डस़ नोट सीम टू बी दी रीयल वन्स बट दी इमेजीनेटरी वन्स। फोर दी फस्ट इन्सीडेन्ट, आई वुड लाईक टू से देट, आई एग्री डेट सम गर्ल्स ऑफ ऑवर सोसाईटी आर गैटिंग मोर्डनाईज़, ईवन अ लिटल बिट अनसिविलाइस़ड, बट स्टिल दे हेव सच एक्सटेन्ट ऑफ सेन्सिबलिटि ऑर सिविलाईज़ेशन देट दे डोन्ट आस्क सीनीयर सिटिजन्स टू वेकेट दी लेडीस़ सीट। एन्ड देट टू ऑफ्टर अपोज़ीशन फ्रोम सो मैनी पीपल, रीयली, आई डोन्ट थिंक देट ऑवर गर्ल्स आर सो अनसिविलाइस़ड। इफ देअर इस़ वन आउट ऑफ थाउज़ेन्ड, वी शुड नोट वरी अबाउट इट, ऑफ्टरऑल एक्सेपशन्स आर आलवेज़ देअर। फोर दी सेकन्ड इन्सिडेन्ट, आई वुड लाईक टू से देट ऑवर मेच्योर जनरेशन अन्डरस्टैंड दी सिगनिफिकेंस ऑफ रक्शाबन्धन। दे ऑलवेज़ सेलीब्रट दिस फेस्टिवल विद इट्स एक्चुअल स्पिरिट। मे बी देट सम पीपल सेलीब्रेट इट जस्ट फोर फोरमेलिटि, इट डिपेन्डस अपोन दी डेप्थ ऑफ रिलेशनशिप, बट देअर इस़ नोट मच एक्सपेक्टेशन फोर मनी। हाओएवर इफ चिल्ड्रन एक्स्पेक्ट सम मनी ओर गिफ्ट, दैन इट इस़ नोट ऐ मेटर ऑफ सीरियस कन्सर्न। ऑफ्टरऑल चिल्ड्रन आर चिल्ड्रन एण्ड दे आर एक्सपेक्टिड टू बिहेव लाईक दी सेम।

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/10/2010

    प्रिय श्री एबीसी जी या कहूँ आजाद भारत के कर्णधार जी, खैर आप जो भी है । आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि ये सच्‍ची घटनाएं है । जिस तरह एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है बस उसी तरह एक घटना के कारण या एक व्‍यक्ति के कारण उस श्रेणी के सभी व्‍यक्ति वैसे ही समझ लिए जाते हैं । उदाहरणार्थ सारे सरकारी बाबू कुछेक भ्रष्‍टाचारियों की वजह से या उनके काम ना करने की वजह से आज भ्रष्‍टाचारी या आलसी कहलाते हैं । अंत में आपने मेरी बात का समर्थन किया उसके लिए आभारी हूँ । एक पुरानी पोस्‍ट पर अब प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । कृपया अन्‍य पोस्‍ट भी पढ़ें व अपनी राय से अवगत करायें । अंत में एक बात और यदि आप हिंग्‍लिश में या हिन्‍दी में टाईप कर सकते हैं तो फिर प्रतिक्रिया में विचार हिन्‍दी भाषा में लिखें तो मुझे अत्‍यधिक खुशी होगी । अरविन्‍द पारीक

Vivek Aggarwal के द्वारा
12/09/2010

आज बहुत दिनों बाद आपका ब्लॉग देखा. इन घटनाओ का हल हमारा व्यवहार ही है. जिसे सुधरने की जरूरत है. विवेक

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/09/2010

    प्रिय श्री विवेक अग्रवाल जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । निस्‍संदेह हमें व्‍यवहार ही सुधारना होगा । अरविन्‍द पारीक

Arvind Pareek के द्वारा
07/09/2010

प्रिय श्री मुनीश जी, मेरे कथ्‍य का समर्थन करने के लिए धन्‍यवाद व प्रतिक्रिया के लिए आभार । अरविन्‍द पारीक

N K T HAKUR के द्वारा
02/09/2010

सरकार ने खेत काट कर सड़क और कारखाने बनाई / कहा विकास हो रहा है / सड़को पर मोटर और कारखानों में मशीने चलने लगी / अब सड़को में लोग कुचल कर और कारखानों में लापरवाही से लोग मरने लगे / सरकार ने कहा दुर्घटना हो गई / विकास के साथ दुर्घटना का सम्बन्ध स्थापित हो गया /

    Arvind Pareek के द्वारा
    03/09/2010

    प्रिय श्री एन.के. ठाकुर जी, बात आपनें ठीक लिखी हैं । लेकिन प्रतिक्रिया किस लेख को दी है यह स्‍पष्‍ट नहीं हैं । क्‍या आप मेरे ही किसी लेख को प्रतिक्रिया दे रहे थे अथवा पढ़ा कोई लेख और त्रुटिवश मेरे इस लेख पर टिप्‍पणी दे बैठे । खैर प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    Ajay Tyagi के द्वारा
    05/09/2010

    अरविदं ज्ञी, आप का लॆख अति सुदंर है।

    munish के द्वारा
    06/09/2010

    सर्वप्रथम शिक्षा निति, और दूसरा प्रमुख कारण संयुक्त परिवारों की कमी या छोटे परिवार, बाकी जो अन्य कारण हैं वो गौड़ कारण हैं कहीं न कहीं हमारी शिक्षानीति से ही प्रभावित हैं, हमारे समाज में ये भ्रांती भी फैली हुई है की पाश्चत्य सभ्यता अधिक संस्कारित तथा आधुनिक है इसलिए सब तथाकथित आधुनिकता की अनैतिक दौड़, दौड़ रहे हैं, आपके प्रश्न बहुत सार्थक हैं.

    Arvind Pareek के द्वारा
    07/09/2010

    प्रिय श्री अजय त्‍यागी जी, प्रशंसा के लिए धन्‍यवाद । बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहें । अरविन्‍द पारीक

Vinita Mishra के द्वारा
01/09/2010

In baato ka niskarsh yahi nikalta hai ki kahi na kahi ham apni sabhayata aur sanskriti bhulte ja rahe hai par isme baccho ka kya dosh?Kya ham MAA-BAAP iske liye zimmewar nahi hain bilkul dosh to hamare parvarish ke taur-tariko me hai.Dukh to is baat ka hai paschim ki nakal karte karte ham apne emotion ko v bhulkar adhunikikaran ki daur me teji se bhagte ja rahe hain.Ham sab ko pahle khud ko badalna hoga tav nai peedhi ki soch ko badal payenge.

    Arvind Pareek के द्वारा
    03/09/2010

    सुश्री विनिता जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । जी हां पहले हम सब को बदलना होगा तभी नई पीढ़ी की सोच बदल पाएगी । अरविन्‍द पारीक

Aakash Tiwaari के द्वारा
31/08/2010

आपका लेख पढ़ा मन विचलित हो उठा क्योंकि मै भी इसी तरह की बातों को लेकर परेशान रहता हूँ और सोचता हूँ की हमारी युवा पीढ़ी को हो क्या गया है क्या आधुनिकता का मतलब संस्कारों का हनन है. क्या युवा पीढ़ी संस्कारों के साथ आधुनिकता का लुफ्त नहीं उठा सकते. आकाश तिवारी

    Arvind Pareek के द्वारा
    01/09/2010

    प्रिय आकाश तिवारी जी, प्रश्‍न आपका भी उचित हैं आधुनिकता का अर्थ संस्‍कारहीन होना नहीं है । युवा पीढ़ी में अनेक अभी भी आधुनिकता के लुफ्त के साथ संस्‍कारों को भी निभा रहे हैं । बस मानसिकता इसके पक्ष में होनी चाहिए । यदि संस्‍कारों को पिछड़ेपन की निशानी माना जाएगा तो यह मुमकिन नहीं है । अरविन्‍द पारीक

M. Ram के द्वारा
31/08/2010

किसी लड़की से इस तरह के व्‍यवहार की अपेक्षा नहीं होती । क्‍योंकि नारी, स्‍त्री को सदैव करूणा की प्रतिमूर्ति माना जाता हैं । उसमें प्‍यार का सागर हिलोरें ले रहा होता है । वह प्रत्‍येक रूप में साक्षात देवी ही होती है । इसलिए भाईजी को उनके व्‍यवहार से विचलित होना ही था । कारण आपनें सही लिखा है । परिवार से कटी हुई या माता-पिता के संरक्षण से वंचित अथवा नाम मात्र के संरक्षण में रहने वाले बच्‍चों में ऐसा ही व्‍यवहार नजर आता है ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    31/08/2010

    प्रशंसा के लिए धन्‍यवाद । आपने सही लिखा है । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    afraz के द्वारा
    03/09/2010

    bhai mere kiya ham nai peedi ko sanskaar de rahe hai. ek sher yaad aa raha hai, ham to gamzada hai, laaye kahan se khushi ke geet , denge wohee jo paayenge es zindage se ham. seedhi see baat hai, nai peedi wohi de rahi hai, jo uske paas hai.

S.R. Saeed के द्वारा
30/08/2010

आपनें बहुत ठीक लिखा हैं । यह केवल उन त्‍यौहारों पर ही लागू नहीं होता जो बहुसंख्‍यक मनाते हैं, भारत में अन्‍य धर्मो के त्‍यौहारों को मनानें में भी युवाओं का यही व्‍यवहार है वे इस रूपये व पैसे में तौलनें लगे है । युवक भी इन बीमारियों से अछुते नहीं हैं ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    31/08/2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद एस आर सईद साहब । अरविन्‍द पारीक

N. Mittal के द्वारा
27/08/2010

मुझे तो यह समझ नहीं आता कि महिलाओं के लिए सीट रिजर्व क्‍यों की जाती हैं । क्‍यों नहीं लोग स्‍वयं उठकर सीट बैठने के लिए देते हैं । मुझे तो लगता हैं जिस तरह आरक्षण ने एससी एसटी व सामान्‍य लोगों के बीच सरकारी नौकरी में दूरी बढ़ा दी है । उसी तरह बस में महिला सीट ने महिलाओं और पुरूषों के बीच दूरी बढ़ा दी है । रक्षाबंधन वाले मामलें में यदि बहन भाई से कुछ अपेक्षा रखे तो क्‍या बुरा है ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    28/08/2010

    प्रिय श्री एन. मित्तल जी, जैसा कि मैंनें अमनदीप जी व राकेश मैनी जी को दिए जवाब में लिखा है सोच सबकी अपनी अपनी होती है । आरक्षण भले ही सीट के लिए हो या नौकरी के लिए उसका कुछ ना कुछ औचित्‍य तो है ही । हां आप शिकायत रखना चाहते हैं तो उसके दूरूपयोग से रखिये । खैर आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    nishamittal के द्वारा
    04/09/2010

    अपेक्षा रखना गलत नहीं परन्तु पर्व को प्रेम का नहीं व्यवसायीकरण का प्रतीक बनाना गलत है.

Sanjeev के द्वारा
27/08/2010

लेकिन सोचना हमें ही हैं कि क्‍यों नहीं हम अपनें बच्‍चों को त्‍यौहार, परिवार व रिश्‍तों के वास्‍तविक महत्‍व को समझातें ? क्‍यों हम उन्‍हें मनचाहा करनें की छूट देते-देते संस्‍कारहीन बना रहे हैं ? मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ । यही कारण हैं कि उन लड़कियों का व्‍यवहार ठीक नहीं था ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    28/08/2010

    प्रिय श्री संजीव जी, सहमति दर्शानें व बात का समर्थन करने के लिए आपका धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Aman Deep के द्वारा
26/08/2010

It is very easy to target the Youth for any misconduct. But a few of them can’t represent the whole lot of youths. May be you bhaiji has seen these incidences but what about those where young lad without any fear to his/her life saved someone or helped someone. I am not criticising your writing but i am of the opinion that Indian youth has everything in them and they never forget to respect elders, help the needy one, love the children and respect his/her relationship. aman deep

    Rakesh Maini के द्वारा
    28/08/2010

    What i understand from this post is that this blog post has not been written to target the Youth. This post is about the behaviour of family towards their children and what they learn from them. Every children gets his behaviour from the people & environment around him. Thus Mr. Aman Deep your blame is not right. Please read this post again.

    Arvind Pareek के द्वारा
    28/08/2010

    प्रिय अमनदीप व राकेश मैनी जी, प्रतिक्रियाओं के लिए आप दोनों का शुक्रिया । राकेश जी सबके अपने अपने विचार होते हैं । इसलिए यदि अमन दीप जी को इस ब्‍लॉग पोस्‍ट में कुछ सही नहीं लगता तो गलत नहीं हैं । क्‍योंकि वे इसे केवल एक युवा की नजर से देख रहे हैं । मैं भी एक युवा हूँ और यहां टिप्‍पणी देने वाले अधिकांशत: शतप्रतिशत् व्‍यक्ति युवा है । इसलिए इसे अन्‍यथा नहीं लेना चाहिए । पुन: आप दोनों का धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Anuj के द्वारा
26/08/2010

आप जब दोनों घटनाओं को देखेंगें तो पाएंगें मामला 50-50 का है । दोनों ही मामलों में एक लड़की का व्‍यवहार अच्‍छा है व दूसरी का आलोचनायोग्‍य । इसलिए अभी किसी समाधान की जरूरत नहीं हैं तथापि जिनकी आलोचना हो सकती है वे लड़कियां यदि इसे पढ़े तो अवश्‍य अपनें में कुछ परिवर्तन ला सकती हैं । एक अच्‍छी पोस्‍ट ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    28/08/2010

    प्रिय श्री अनुज जी, बात आपकी भी ठीक है । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

rkpandey के द्वारा
25/08/2010

अरविंद जी, संस्कारों की कमीं से तमाम समस्याएं जनम लेती हैं. भोगप्रधान युवापीढ़ी में चंद उदाहरण ही मिलेंगे जो जानते हैं कि उनके क्या कर्तव्य हैं बाकी तो केवल अपने भोगलिप्सा को पूर्ण करने में लगे हैं. जब तक इन्हें खुद दर्द नहीं होता तब तक ये बिलकुल बेपरवाह रहते हैं दूसरों के दर्द से.

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री आर.के. पाण्‍डेय जी, आपनें बहुत ठीक कहा है कि जब इन्हें खुद दर्द होगा तब ये दूसरों के दर्द से वाकिफ होंगें । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक .

आर.एन. शाही के द्वारा
25/08/2010

भाई जी ये दोनों उदाहरण सोच में डालते हैं कि इस आरम्भ का अन्त कहाँ जाकर होना है । यही वो आयातित संस्कृति है, जो हमारी सारी पहचान को लील लेने के लिये आतुरता के साथ आगे बढ़ती जा रही है । जिसको ये इम्पोर्टेड माल नसीब नहीं है, जैसे बच्चे वाली लड़की, वे उस पुरानी सांस्कृतिक पहचान से जबर्दस्ती चिपके हुए हैं, और पिछड़े विचारों के संवाहक माने जाते हैं । लेकिन इसका कोई उपाय भी नहीं है । हमें उस दिन का इंतज़ार करना होगा, जब आधुनिक शैली इतनी परिपक्व हो जाय, कि उसके विचारों में भी परिपक्वता आ जाय । ऐसा नहीं है कि पश्चिमी समाज जहाँ से ये संस्कृति आई है, इतना असभ्य है ।

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री शाही जी, यह आयातित संस्‍कृति का दोष कैसे हो सकता है जब आप स्‍वयं ये कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पश्चिमी समाज जहाँ से ये संस्कृति आई है, इतना असभ्य है । मेरे विचार से तो बच्‍चें कों चुंकि आजकल टोका ही नहीं जाता या परिवार में कोई टोकने वाला नहीं होता तो हालात तो बिगड़ेंगें ही । अरविन्‍द पारीक

s.p.singh के द्वारा
25/08/2010

पहली घटना में आधुनिक लिबास वाली लड़की संस्कार हीन आचरण वाली थी तथा बच्चे गोद में लिए संस्कारी लड़की है इसी प्रकार से दूसरी घटना में भी संस्कार हीन व्यक्तित्व की झलक साफ़ तौर पर देखी जा सकती है यह सब आधुनिक पीढ़ी का दोष नहीं है या हम लोंगों का ही दोष है क्योंकि जैसे संस्कार बच्चे को मिलेगें वैसे ही व्यहार हमें उन वच्चो से वापस मिलेगा

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री एस.पी. सिंह, आपनें सही लिखा है कि बच्‍चे को जैसे संस्‍कार मिलेंगें वैसा ही वह व्‍यवहार करेगा । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

roshni के द्वारा
24/08/2010

अरविन्द जी आज के युग में बेशक कुछ युवा जहाँ अपने संस्कारों को भूल जाये या रिश्तों त्योहारों की महत्ता और उनके अर्थ को न समहज पाए, मगर बहुत से ऐसे युवा भी है जो अपनी मूल जड़ों से अभी भी जुड़े हुए है .. और ये युवा ही हमारी देश की उम्मीद है.. इसलिए अभी भी चिंता की कोई बात नहीं… आभार सहित

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    सुश्री रोश्‍ानी जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । निस्‍संदेह अभी ये चिंता की बात नहीं है । लेकिन यदि रोग के प्रारंभ में ही इलाज ना किया जाए तो कभी-कभी रोग लाइलाज हो जाता है । अरविन्‍द पारीक

K M Mishra के द्वारा
24/08/2010

आज की इस परिस्थिति के लिये मीडिया जिम्मेदार है । उदारीकरण के बाद भारत में विदेशी मीडिया ने सेंध लगायाी । विदेशी मीडिया के साथ विदेशी संस्कृति भी आई । पहले मीडिया का उद्देश्य जनसरोकार था आज उसका एकमात्र उद्देश्य बाजार और मुनाफा है । इस मुनाफे के लिये वह विदेशी संस्कृति और विदेशी बाजार को प्राथमिकता देती है । यह लोग यह तर्क देते हैं कि पब्लिक को यही सब पंसद है । मगर आम आदमी न दार्शनिक होता है ओर न ही बुद्धजीवी । यह मीडिया का दायित्व है कि वह कैसा समाज तैयार करती है । आज का समाज उदारीकरण लागू होने के 20 साल बाद का समाज है । यह उसी का नतीजा है ।

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, मुझे ऐसा लगता है कि हम दोषारोपण किसी पर भी कर सकते हैं लेकिन कहीं ना कहीं परिवार का छोटा होना व मॉं-बाप का नौकरी पर ज्‍यादा व परिवार पर कम ध्‍यान देना ही अधिक जिम्‍मेदार है आज की पीढ़ी के संस्‍कारों में हीनता के लिए । मीडिया मेरी राय में बाद में आएगा । तथापि आप की प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
24/08/2010

प्रिय अरविन्द जी, आजकल के बच्चों के ऐसे व्यवहार के कारण ही वृद्ध आश्रमों का जन्म हुआ ! वरना इनकी क्या जरूरत थी ! आज ही जागरण में “भय बिनु होय न प्रीति” शीर्षक से समाचार आया है की पंजाब में इसके लिए एक सेल बना दिया है तथा पुलिस स्वयं जाकर उन लडको को डांड-डपट कर उनके माता पिता को वापिस घर भेज रही है ! यह एक अच्छा व अनुकरणीय प्रयास है ! अच्छे लेख के लिए साधुवाद राम कृष्ण खुराना

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, क्‍या आपकों लगता है पुलिस के इस प्रयास से बच्‍चे सुधर जाएंगें । जब पुलिस अपराधियों को नहीं सुधार पाई तो क्‍या इन बच्‍चों को सुधार पाएगी । लेख की प्रशंसा के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Ramesh bajpai के द्वारा
24/08/2010

आत्मीय श्री पारिक जी…….आपकी बात को कटा नहीं जा सकता “….. कि हमारी युवा पीढ़ी त्‍यौहारों के वास्‍तविक रूप-रंग को भूलती जा रही है और उसे आधुनिकता के नाम पर बिगाड़ रही है ?” आधुनिकता के नाम पर फ़ैल रही ये उदंडता किसी भी मायने में लोगो का भला नहीं करेगी .और ये युवा पतन के रस्ते को ही अपना भविष्य मानने की जिद कर रहे है . बहुत ही अच्छा लेख

Piyush Pant के द्वारा
24/08/2010

अरविन्द पारीक जी, वास्तविकता में ये सवाल लड़के या लड़की होने का नहीं है… हर तरफ…. नयी पीढ़ी अपने फायदे के लिए ही सोचती है. जब तक लाभ है तो वो आपको माता पिता कह देंगे जिस दिन वो आपपर से अपनी निर्भरता छोड़ देंगे ….. उसी दिन आपको भी… वास्तव में ये हमारे कारन ही है. क्योकि हम उनको हर चीज़ के फायदे और नुक्सान बताने लगे हैं…….. एक और आधुनिक विचारों वाली ये लड़कियां कंधे से कन्धा मिला कर चलने की बात कर रही है… वही ये दूसरी और महिला सीट और महिला आरक्षण जैसे सहारों की मांग करती हैं…….. सुन्दर लेख के लिए बधाई…….. http//piyushpantg.jagranjunction.com

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री पीयुष पंत जी, धन्‍यवाद, युवा पीढ़ी की सोच को आपनें बखुबी बयान किया है । लेकिन व्‍यवहार में परिवर्तन का कारण क्‍या हो सकता हैं । एक लड़की विनम्र स्‍वभाव की है और दूसरी अक्‍खड़ व गंवारू, ऐसा क्‍यों । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
24/08/2010

प्रिय श्री अरविन्द पारीक जी, भाई जी के साथ आपके समक्ष आई इन घटनाओं से सिर्फ एक तथ्य झलकता है- ये है ‘गिरती हुई नैतिकता’ जिसे और गिराने पर सरकार से लेकर न्यायाधीश तक अमादा हैं | कारण साफ़ है जब नैतिकता ही नहीं बचेगी तो सबकुछ भौतिकता पर आश्रित होगा और बन जायेगा भारत भी यूरोप | आजादी के समय ही डाक्टर राधाकृष्णन ने कहा था ‘स्त्रियों में कम होती दया और उनके अन्दर आ रही अनैतिकता स्त्रीत्व में आई कमी का कारण बन रही है’ ये चिंताजनक है| इसे रोकना भी आसान नहीं क्योंकि यौन और शारीरिक शिक्षा के नाम पर बालमन को ही दूषित करने की रणनीति अपने पूरे शबाब पर है | जिस उम्र में बालमन का ध्यान नैतिक कथाओं पर होना चाहिए उस उम्र में उन्हें सुरक्षित सेक्स और कर्त्तव्य के ज्ञान के स्थान पर लिव इन रिलेशनशिप का ज्ञान वितरित किया जा रहा है | भाई जी लगे रहो ‘हिन्दुस्तान भेडिया धसान’ अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    25/08/2010

    प्रिय श्री चातक जी, आपनें डाक्टर राधाकृष्णन के कथ्‍य को सही उद्धृत किया हैं – ‘स्त्रियों में कम होती दया और उनके अन्दर आ रही अनैतिकता स्त्रीत्व में आई कमी का कारण बन रही है’ । वास्‍तव में ये स्थिति चिंताजनक है । लेकिन इसका कारण कहीं ना कहीं एकल परिवार हो जानें में छिपा हैं । आपका आकलन ‘गिरती हुई नैतिकता’ भी बिलकुल सही लगता है । आपकों पोस्‍ट पसंद आई धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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