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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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क्या अछुत हो गया हूँ या भारतीय नहीं हूँ ?

Posted On: 9 Aug, 2010 Others में

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भाईजी को देखते ही मैं उनकी ओर तेजी से लपका । सोचा, आजादी के इस महीनें में भाईजी से कुछ नया सीखनें या जाननें को मिलेगा । आजादी के बारे में उनके क्‍या ख्‍यालात हैं ? आजादी का अर्थ वे क्‍या समझते हैं ? लेकिन मुझे कुछ जाननें, समझनें या पूछने का मौका ही नहीं मिला । मेरे पास आते ही भाईजी ने सवाल दाग दिया, ‘पारीक जी, ऐसा क्‍यों होता है कि लोग अचानक बिना किसी कारण के आपसे कटने लगते हैं ?’

 

मैं भाईजी के प्रश्‍न का मंतव्‍य जाननें की कोशिश करते हुए उनसे पूछ बैठा, ‘किससे कौन कटने लगा है ? मैंनें पतंग की डोर को तो कटते देखा है, कैंची से कागज या कपड़ें का काटा जाना भी देखा है, लेकिन लोगों का कटना ये तो सिर्फ दंगों में होता है जब आदमी हैवान बन जाता है और इंसानियत भूल कर बस कटने-मरने की बात करता है ।’

 

‘अरे आप भी बात को क्‍या मोड़ दे रहे हैं । मैं लोगों के कटने-मरनें की बात नहीं कर रहा हूँ । मैं केवल यह कह रहा हूँ कि यदि आप के साथ रहने वाले लोग यदि अचानक आपसे मुँह फेरने लगे, आपकों साथ महसुस न हो तो आपकों कैसा लगेगा ? आपको ऐसा नहीं लगेगा कि आपकों काट कर बाहर फेंक दिया गया है या आप अछूत हो गए हैं ? कोई कुछ कहता भी नहीं हैं लेकिन उनके हाव-भाव यह बोध करा देते हैं कि आप अब उन जैसे नहीं रहे । शायद यही आजादी हैं ।’ भाईजी ने कहा ।

 

‘जी हाँ भाईजी ! कहते तो आप ठीक हैं । लेकिन आपको काटा किसनें ? माफ कीजिए, दुत्‍कारा किसनें ? ओफ्….फों आज तो सही शब्‍द ही मुँह से नहीं निकल रहे हैं । मेरा कहना था कि आपकों यह बोध कौन करवा रहा हैं कि आप अछूत हो गए हैं ?’ मैंनें पूछा ।

 

‘दरअसल बात ये हैं कि मैं दिल्‍ली चला गया हूँ, आप तो जानते ही हैं । वहां विविधता तो बहुत है लेकिन आम इंसान अभी भी समूहो में बँटे हुए है । इसलिए मैं कहीं फिट नहीं हो पाया । अब जब यहां आया तो ऐसा लगा कि चुँकि मैं दिल्‍ली वासी हो गया हूँ इसलिए शहरी बन जाने के कारण मेरे यहां के साथी मुझसे दूर हो गए हैं । आपको तो पता ही हैं इससे पहले मैं जहां भी रहा हूँ वहां भी जब तक लोग मेरे मूल रिहायश के स्‍थान को नहीं जानते थे तब तक सभी मेरे साथ रहते थे । लेकिन जैसे ही पता चलता था कि मैं उनके क्षेत्र का नहीं हूँ वैसे ही वो मुझसे दूर हो जाते थे । क्‍या मैं एक इंसान हूँ, भारतवासी हूँ, यह कहना गुनाह है ? क्‍या जरूरी हैं कि मैं स्‍वयं को बिहारी, पहाड़ी, पंजाबी, गुजराती, राजस्‍थानी, मराठी, तमिल, मलयाली या असमी बता कर ही अपना परिचय दूँ ? क्‍यों जरूरी हैं कि मेरी पहचान मेरे प्रदेश से हो, देश से नहीं ? क्‍यों लोग सबसे पहले मेरी जाति, मेरा धर्म जानना चाहते हैं ? अरे मैं अगर अपने को अनुसूचित जाति या जनजाति का बताता हूँ तो अन्‍य जाति वालों से दूर हो जाता हूँ और यदि ब्राह्मण बताता हूँ तो भी अनेकों की घृणा का पात्र बन जाता हूँ । कुछ स्‍थानों पर बिहारी कहते ही पीट दिया जाता हूँ । सिख या सरदार कहते ही बेवकुफ समझ कर मजाक उड़ाया जाता है । मुसलमान कहते ही आतंकवादी या पाकिस्‍तानी समझ लिया जाता है, बँगाली कहते ही बॉंग्‍लादेशी बना दिया जाता है । क्‍यों आजादी के इतने वर्ष बाद भी हम भारतीय नहीं बन पाएं हैं ? बताइये क्‍यों हम आज भी विभिन्‍न जातियों व धर्मो में बँटे हुए हैं ?’

 

मैं भाईजी को टोकता हूँ, ‘भाईजी, आप व्‍यर्थ ही परेशान हो रहे हैं हमारे संविंधान की प्रस्‍तावना कहती है कि हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्‍पूर्ण प्रभुत्‍व-सम्‍पन्‍न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्‍मक गणराज्‍य बनाने के लिए, तथा उसके समस्‍त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्‍याय, विचार, अभिव्‍यक्ति, विश्‍वास, धर्म और उपासना की स्‍वतंत्रता, प्रतिष्‍ठा और अवसर की समता प्राप्‍त कराने के लिए तथा उन सब में व्‍यक्ति की गरिमा और राष्‍ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बन्‍धुता बढ़ाने के लिए इस संविधान को अपनाते हैं । लेकिन आगे हम विभिन्‍न अनुच्‍छेदों में यह व्‍यवस्‍था करते जाते हैं कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति, प्रत्‍येक नागरिक को हर स्‍तर पर समता का अधिकार न मिले । इस कारण मैं तो यही कहूँगा कि लोग आपकों कुछ भी समझें इससे क्‍या फर्क पड़ता है, कहलाएंगें तो भाईजी ही । आप भारतीय जनमानस के प्रतिनिधि, आम-आदमी हैं और आम-आदमी एक आवारा खुजली खाया कुत्ता ही होता है । वह सदैव ही दूत्‍कारा जाता हैं । आप तो खुशकिस्‍मत है कि आपसे लोग केवल दूर हो जाते हैं । आपको दूत्‍कारते या फटकारते नहीं हैं । ’

 

‘खैर आप कुछ भी कहें पारीक जी मैं जरूर आपकी लिखी कविता दोहराते हुए हर भारतीय से पूछना चाहता हूँ कि -

 

 

मुझको सिर्फ इतना बतला दो

ये भारत किसका प्‍यारा-प्‍यारा ।

 

तुम कहते महाराष्‍ट्र हमारा,

वे कहते गढ़वाल हमारा,

उनको लगता असम प्‍यारा,

क्‍या टुकड़े-टुकड़े जीवन है प्‍यारा ?

 

मुझको सिर्फ…….प्‍यारा-प्‍यारा ।

तुम इसे मातृ – भूमि कहते हो,

ह्रदय-प्राण से पुजा करते हो । 

फिर मॉं   के टुकड़े चाहते हो,

ये कैसा, व्‍यवहार तुम्‍हारा ?  

मुझको सिर्फ…….प्‍यारा-प्‍यारा ।

 

………………………………

………………………………

………………………………’

 

भाईजी कविता में कहीं खो गए । लेकिन मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि हम बिहारी, पहाड़ी, पंजाबी, गुजराती, राजस्‍थानी, मराठी, तमिल, मलयाली या असमी, हिन्‍दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या अमीर-गरीब आदि से हट कर भारतवासी कब बनेंगें ?

 

आपकी राय, आपके विचार, आपकी टिप्‍पणी बस नीचे Post your Comment के लाल बटन पर क्लिक कर दें । यह ना सोचे कि मैं किस प्रदेश से हूँ या किस जाति का हूँ मेरी पहचान तो बस इतनी है कि मैं भी आपकी तरह भारतवासी हूँ !

 

आप अपने मन की बात English,  हिन्‍दी या हिंग्‍लिश में दे सकते हैं ।

 

- अरविन्‍द पारीक



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

M. Ram के द्वारा
31/08/2010

कृपया अपनी पुरी कविता यहां प्रस्‍तुत करते तो बहुत अच्‍छा लगता । क्‍या पंक्तियां हैं:- तुम इसे मातृ – भूमि कहते हो, ह्रदय-प्राण से पुजा करते हो । फिर मॉं के टुकड़े चाहते हो, ये कैसा, व्‍यवहार तुम्‍हारा ? मुझको सिर्फ…….प्‍यारा-प्‍यारा । बहुत ही गहरी सोच है । बहुत बढि़या है ।

अशोक कुमार राणा के द्वारा
13/08/2010

मुझे तो ऐसा लग रहा है कि आप अछुत हो गए हैं । क्‍योंकि पुरस्‍कार मिल जाने के बाद से आपकी पोस्‍ट पर कमेंट देने वाले चंद गिने-चुने लोग ही रह गए हैं । वैसे आम जिंदगी का फलसफा यही है कि यदि आपकों कुछ मिलना नहीं हैं या आपसे कोई किसी तरह जुड़ा नहीं हैं तो उसे अपनी जिंदगी का हिस्‍सा कभी नहीं बनाया जाता । हम भारतवासी केवल अपनों के बीच विदेश में ही होते हैं । अन्‍य किसी स्‍थान पर नहीं ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    13/08/2010

    प्रिय श्री अशोक कुमार राणा जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । ऐसा नहीं हैं, देखिए आपनें भी तो प्रतिक्रिया दी हैं । हां, इतना अवश्‍य हुआ है कि कुछ पाठक नियमित हैं व नियमित प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि कुछ केवल पढ़ कर ही संतोष कर लेते हैं । आपका कहना सही है कि हम केवल विदेश में ही भारतीय हैं । लेकिन वह भी तब जब स्‍वयं पर विदेशी दिखनें का भूत सवार न हो । अन्‍यथा समीर सैम और बनवारी बेन बन जाता है । अरविन्‍द पारीक

K M Mishra के द्वारा
10/08/2010

आम-आदमी एक आवारा खुजली खाया कुत्ता ही होता है । वह सदैव ही दूत्‍कारा जाता हैं । एक दम गर्दन से पकड़ा है आपने वास्तविकता को । कभी मजा लेने के लिये सिर्फ कुर्ता पैजामा में (मंहगे वाले में नहीं) बाजार घूम आईये । दुकानदार तक हड़का कर बोलता है । रेट बता कर ऐसे हिकारत से देखेगा मानो कह रहा हो लेना हो तो लो, फालतू चख चख करके टाईम मत खराब करो । इसी तरह पुलिस वाले, सरकारी आफिस का बाबू, या अधिकारी, हर कोई आम आदमी को फालतू की चीज ही समझता है । आम आदमी को इज्जत मिलती है तो चुनाव के वक्त । वो भी वोटर लिस्ट में नाम हो तब । कहां रह गये हम भारतीय । सब अपने अपने द्वीपों मे मस्त हैं । भारतीय बनने में फायदा कम नुकसान ज्यादा है ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    12/08/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । आपने बिलकुल ठीक लिखा है कि पुलिस वाले, सरकारी आफिस का बाबू, या अधिकारी, हर कोई आम आदमी को फालतू की चीज ही समझता है । आम आदमी को इज्जत मिलती है तो चुनाव के वक्त । वो भी वोटर लिस्ट में नाम हो तब ।  लेकिन ये सभी स्‍वयं जब अपनी कुर्सी पर नहीं होते तब आम आदमी ही होते हैं शायद ये भूल जाते हैं । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
09/08/2010

स्नेही पारीक जी, लेख की भावना इतनी उभर कर सामने आई है कि आपकी पोस्ट में छिपी भाई जी की व्यथा मैंने छंदबढ़ कर दी, गौर फरमाइएगा- ज़िदगी हो सफर या सफर जिंदगी, हमको हर हाल में बस भटकना ही है; कोशिशें कितनी चाहे करें हम मगर, जिस तरफ भी बहें हमको बहना ही है; क्या पता कौन खेले दिखाई ना दे, जो दिखाई पड़े वो भी मोहरा ही है; हम जिसे माँ बैठे हैं- ईश्वर, खुदा, वो भी बेजान पत्थर का टुकड़ा ही है; वो फलक नेक था, वो जमीं नेक थी, जब नहीं था खुदा तो खुदी नेक थी; जबसे आमद खुदा की हुई धरती पर, तबसे इंसान बिखरा तो बिखरा ही है; बंट गए लोग, खुशियाँ-ओ-गम बंट गए, उसने बांटा हमें और हम बंट गए; ‘कृष्ण’ सोचे, कहे, और समझे यही, उसने भटकाया, हमको भटकना ही है | अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    12/08/2010

    प्रिय श्री चातक जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! भाईजी की व्यथा पर छंदबद्ध आपकी कविता बहुत अच्छी बन पड़ी है ! मेरे लेख से भी बेहतर है ! अरविन्द पारीक

Ramesh bajpai के द्वारा
09/08/2010

क्‍यों लोग सबसे पहले मेरी जाति, मेरा धर्म जानना चाहते हैं ? अरे मैं अगर अपने को अनुसूचित जाति या जनजाति का बताता हूँ तो अन्‍य जाति वालों से दूर हो जाता हूँ और यदि ब्राह्मण बताता हूँ तो भी अनेकों की घृणा का पात्र बन जाता हूँ । कुछ स्‍थानों पर बिहारी कहते ही पीट दिया जाता हूँ । सिख या सरदार कहते ही बेवकुफ समझ कर मजाक उड़ाया जाता है । मुसलमान कहते ही आतंकवादी या … बस पारीख साहब बहुत खूब ..वह दिन अब दूर नहीं

    Arvind Pareek के द्वारा
    11/08/2010

    प्रिय श्री रमेश वाजपेयी जी, प्रशंसा के लिए आभार व धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

anita paul के द्वारा
09/08/2010

पारीख जी ,मैं जब से जागरण से जुड़ी हू,तब से ही आप के लेख पढ़ती आई हू.आप के विचार बहुत उम्दा हैं ,ये सदा नई पीढ़ीं को मार्ग दिखाते रहेगे .जागरण के इस मंच पर प्रेरणा स्त्रोत है आप …………… मुझे आप की रचनओं का सदेव इन्तजार रहता हैं.http://anitasingh.jagranjunction.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    11/08/2010

    सुश्री अनिता जी, प्रशंसा के लिए धन्‍यवाद । इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए व अपने विचारों से अवगत कराते रहिए । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
09/08/2010

प्रिय पारीक जी, आपके लेख में जो दर्द है वो आज हर भारतवासी भोग रहा है ! सब लोग राजनीति के परांठे सेक रहे है ! इसमें नुक्सान आम आदमी का ही हो रहा है ! अंधेर नगरी ………..! एक अच्छे लेख के लिए साधुवाद ! राम कृष्ण खुराना

    Arvind Pareek के द्वारा
    11/08/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, प्रशंसा के लिए आभार व प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । आपने सही कहा कि आम आदमी का नुकसान हो रहा है । अरविन्‍द पारीक

Rashid के द्वारा
09/08/2010

अरविन्द भाई,, आपका लेख एक वास्तविकता है,, हम सभी कुछ (हिन्दू / मुस्लमान / मराठी / गुजरती आदि ) है मगर भारतीय नहीं है !! सब एक कश्ती पर बैठे है और उस कश्ती में दुसरे को डुबोने के लिए छेद कर रहे है बिना सोचे की कश्ती एक है, अगर डूबे गी या डगमगाएगी तो सभी काम से जाएगे,, राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Arvind Pareek के द्वारा
    11/08/2010

    प्रिय श्री राशिद जी, भारत में लोग वास्‍तविकता से परिचित नहीं होना चाहतें, इसलिए अलग-अलग रंगों में रंगे हुए हैं । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

allrounder के द्वारा
09/08/2010

बहुत सही लिखा आपने अरविन्द जी, आज हम धर्म – जाति और क्षेत्रवाद मैं ऐसे जकड गए हैं की अपने भारतीय होने का एहसास कहीं न कहीं पिछड़ता जा रहा है ! हम सबसे पहले एक भारतीय हैं, ये हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए !

    Arvind Pareek के द्वारा
    11/08/2010

    प्रिय श्री सचिन देव आलराउंडर जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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