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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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दिल्ली का हाल सुने दिल वाला

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दिल्‍ली का हाल सुने दिल वाला,

सीधी-सी बात ना मिर्च-मसाला,

कह कर रहेगा कहने वाला,

दिल्‍ली का हाल सुने दिल वाला………

 

भाईजी आज किसी और रंग में थे । वे जिस गीत को गुनगुना रहे थे उसके बोल मेरे कानों में पड़ रहे थे । भारत की राजधानी में शिफ्ट क्‍या हुए कि उनके रंग-ढंग ही बदल गए थे । ‘माफ कीजिए भाईजी, लेकिन मुझे टोकना ही होगा, आखिर आप पर दिल्‍ली का रंग चढ़ गया है ?’

 

‘ना, मैं आपके सवाल का जवाब नहीं दूँगा । मैं जानता हूँ मेरी और आपकी बातचीत आप ब्‍लॉग के रूप में जागरण जंक्‍शन डॉट कॉम पर प्रस्‍तुत करते हैं । और अंत में एक सवाल टिप्‍पणी करने वालों के लिए छोड़ देते हैं । कुछ इस तरह की जैसे आप से ज्‍यादा अक्‍लमंद और कोई नहीं हैं ।’ 

 

मैं उनकी बात सुनकर मन ही मन सोचता हूँ कि क्‍या मेरी जिज्ञासा मुझे अक्‍लमंद साबित करती है अथवा दुनिया मुझे मुर्ख समझती हैं ? सवाल तो इसलिए करता हूँ कि बात का दूसरा पक्ष भी उजागर हो जाए । लेकिन प्रकट में कहता हूँ, ‘भाईजी इसके लिए मैं माफी ही मांग सकता हूँ, माफ कर दीजिए । इस बार कोई सवाल नहीं छोडूँगा । अच्‍छा, आप यह तो बताइयें कि दिल्‍ली शहर आपको कैसा लगा ? राष्‍ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए सज-संवर रहा हैं । दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री ने भी कहा हैं कि दिल्‍ली अब विश्‍वस्‍तरीय शहर बननें जा रहा है ।’

 

‘दिल्‍ली जिसके कई नाम है इन्‍द्रप्रस्‍थ, देहली, दिल्‍ली या एनसीआर दिल्‍ली आप जो भी कहें, इस समय जगह-जगह से खुदी पड़ी है । ऐसा लगता है जैसे जमीन के नीचे एक और दिल्‍ली बसानें की तैयारी चल रही है । मैट्रो हो या दिल्‍ली परिवहन की बस लगता है लोग ठूँस-ठूँस कर भर दिए गए हैं । सड़कों पर गाडि़यां इतनी है कि लगता है शहर जल्‍दी ही खाली होने जा रहा है या फिर कोई खैरात बँट रही है जिसे लेने सारा शहर उमड़ पड़ा हैं । इस जन सैलाब व भवनों के जंगल में इंसान कहीं खो गया है ? दुर्घटना में घायल सड़क पर इस तरह पड़े रहते हैं मानों उन्‍हें अस्‍पताल पहुँचा दिया गया तो कोई अपराध हो जाएगा । जबकि कहने को दिल्‍ली में एक ट्रॉमा सेंटर भी है । जहां हेलीकॉप्‍टर से दुर्घटनाग्रस्‍त या आपदाग्रस्‍त व्‍यक्ति को सीधे आपरेशन थियेटर में उतारने की व्‍यवस्‍था की गई है । लेकिन ये किसी वीआईपी के दुर्घटनाग्रस्‍त या आपदाग्रस्‍त होने का इंतजार कर रहा है । आखिर वीआईपी उदघाटन करेगा कैसे ? यह एक ऐसे संस्‍थान के अधीन है जहां इलाज के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती है । भले ही रोगी कितना बदहाल हो, कितने ही बेड खाली हों, उसे किसी अन्‍य अस्‍पताल में रेफर कर दिया जाता है ।

 

दिल्‍ली में राह चलता आदमी जब तक साथ है तब तक लगता है फुर्सत में हैं, लेकिन ठिकाना आते ही बिना बताएं ऐसे ओझल हो जाता है जैसे जानता ही नहीं है । हमारे इस छोटे-से शहर में नेता जी का पुछल्‍ला भी बड़े काम का नजर आता हैं लेकिन दिल्‍ली शहर में बड़ा नेता भी बौना हो जाता हैं । हॉं, देश की राजधानी में पूछ है तो बस लुटियन की दिल्‍ली में रहने वालों की । जब आप वहां जाएंगें तो लगेगा कि दिल्‍ली में कोई बहु-मंजिली इमारत ही नहीं है । बड़े-बड़े बंगलों से निकलती लाल बत्ती लगी गाडि़यां कब आपके निकट से फर्राटे से निकल जाएंगी आप जान भी नहीं पाएंगें । दिल्‍ली के दिल क्‍नाट-प्‍लेस के पास संसद मार्ग पर जन्‍तर-मन्‍तर के निकट देश की सारी समस्‍याओं से आपका साक्षात्‍कार हो सकता है । यदि हमारे सांसद और मंत्री प्रतिदिन यहां केवल आधा घंटा भी निकाल लें तो उन्‍हें न केवल संसद में उठानें के लिए सैंकड़ों प्रश्‍न मिल जाएंगें बल्कि अनेकों प्रश्‍नों के समाधान भी तुरत-फुरत मिल जाएंगें ।

 

और बताऊँ दिल्‍ली के बारे में । राह चलते आप पाएंगें फुटपाथ पर आज टाईल्‍स बिछाई गई हैं और कल कोई पाईप लाईन डालनें या तार बिछाने के लिए उन्‍हें उखाड़ा जाएगा वह भी इस तरह की उन्‍हें पुन: ना बिछाया जा सके । शायद सचिन टिचकुले जैसे ठेकेदार ही लोनिवि, केलोनिवि, डीडीए और एमसीडी के साथ काम कर रहे हैं । जो किसी काम को करने का बार-बार ठेका लेते हैं कागजों में पूरा करते हैं और इंजीनियर घर बैठे कार्य की पूर्णता का प्रमाणपत्र देते हैं । यदि वह काम दस दिन बाद ही पुन: करवाना पड़ता है तो बस कागजों में उसका नाम बदल दिया जाता है । ताकि आडिट में पकड़ में नहीं आए । सचिन टिचकुले जैसे ठेकेदारों और लोनिवि, केलोनिवि, डीडीए और एमसीडी के इंजीनियरों का घर-बार इसी तरह चल रहा हैं । अर्थात आप कह सकते हैं कि दिल्‍ली भ्रष्‍टाचार की पहली पाठशाला है ।

 

दिल्‍ली में दिल्‍ली कई तरह की हैं । नई दिल्‍ली नगर पालिका की नई दिल्‍ली – जिसमें वीआईपी बसते हैं । इस दिल्‍ली में सफाई आपकों नजर आ सकती है । लेकिन जहां-जहां यह दिल्‍ली डीडीए और एमसीडी की दिल्‍ली से हाथ मिला रही है वहां इस बात का कम्‍पीटिशन आप देख सकते हैं कि कौन ज्‍यादा गंदगी रख सकता हैं । डीडीए की दिल्‍ली कहीं चमकदार व स्‍वच्‍छ हैं तो कहीं दागदार व गंदी । कारण आप देखते ही पहचान लेंगें । एमसीडी की दिल्‍ली इन दोनों दिल्‍लीयों से थोड़ी ज्‍यादा गंदी हैं । यदि एमसीडी क्षेत्र का बोर्ड ना लगा हो तो भी आप इसे पहचान जाएंगें । एक दिल्‍ली और है ग्रामीण दिल्‍ली । यह दिल्‍ली तो नाम से ही स्‍पष्‍ट है कि दिल्‍ली होते हुए भी दिल्‍ली नहीं हैं अभी भी बस दिल्‍ली बननें की कोशिश कर रही है । यहां के घरों में दिल्‍ली के घरों का सारा सामान मिल सकता हैं । यहां लोग एक से एक फैशनेबल कपड़ों में नजर आ सकते हैं लेकिन फिर भी यहां का वातावरण व सोच अभी भी ग्रामीण है । इसलिए यहां इंसान नाम के जीव नजर आ जाते हैं ।’ 

 

अब मुझसे रहा नहीं जाता, मैं भाईजी को टोक ही देता हूँ, ‘भाईजी देश की राजधानी दिल्‍ली क्‍या वास्‍तव में इतनी बुरी है ? क्‍या दिल्‍ली अब विश्‍वस्‍तरीय शहर नहीं बन रही है ?’

 

‘मैं यही तो बतानें जा रहा था लेकिन आप बीच में टोकने का काम तो जरूर करेंगें । अरे मेरे भाई आप जानते हैं न्‍युयार्क शहर में हर आधे मिनट में एक अपराध हो जाता है और दिल्‍ली में हर एक मिनट में, लेकिन जल्‍दी ही पुरे विश्‍व में यह शहर हर तरह के अपराध के लिए नंबर वन हो जाएगा । पहले दिल्‍ली सस्‍ते शहरों की सूची में सातवें या आठवें नंबर पर था आज महँगें शहरों की सूची में तीसरे नंबर पर है । इस मामलें में भी दिल्‍ली का पहला नंबर जल्‍दी ही पक्‍का होने वाला है । पहले दिल्‍ली में हरियाली 70 प्रतिशत् से भी अधिक क्षेत्र में नजर आती थी । आज हरियाली के लिए रिज क्षेत्र में या लुटियन जोन में जाना पडे़गा । ये तो अदालत ने रोक लिया अन्‍यथा कुछ दिनों बाद दिल्‍ली में बच्‍चे पूछ रहे होते कि हरियाली क्‍या होती है ? इसलिए कहा जा सकता है कि दिल्‍ली विश्‍वस्‍तरीय बननें जा रही है ।’

 

मैं भाईजी की बात सुनकर सोचने लगा था कि क्‍या वास्‍तव में महाभारत के इन्‍द्रप्रस्‍थ से आज भारत की राजधानी कहलानें वाला महानगर दिल्‍ली विश्‍व परिदृश्‍य में बहुत कुछ खो चुका महानगर बननें जा रहा है ? माना कि दिल्‍ली बदल रहा है लेकिन विकास की कीमत तो सभी को चुकानी होती है । शहर जब बढ़ता है तो उसके साथ सभी कुछ बढ़ जाता हैं । चाहें संसाधनों की मांग हो या शहर की दैनिक आवश्‍यकताएं । आबादी बढ़ती है तो मांग बढ़ती है और बुराईयां भी बढ़ती है । इसलिए हमारा यह सोचना गलत ही होगा कि दिल्‍ली शहर नहीं बदलेगा । जिस तरह दिल्‍ली शहर बदल रहा है उसी तरह हमें अपनी सोच को बदलना होगा । लेकिन अपने संस्‍कारों और संस्‍कृति को बनाए रखते हुए । तभी हम दिल्‍ली को विश्‍वस्‍तरीय शहर के रूप में देख पाएंगें ।

 

अरविन्‍द पारीक



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anonymous के द्वारा
06/08/2010

Very nice article. Why do we have to wait for an event like CWG to develop our cities?

    Arvind Pareek के द्वारा
    09/08/2010

    Thanks for the comment.

omprakash pareek के द्वारा
06/08/2010

अरविन्द, दिल्ली के बारे में आपने जो लिखा सो ठीक है, परन्तु तथाकथित विश्वस्तरीय शहर banane के चक्कर में इस शहर का जो बेडा गर्क हो रहा है उस पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. विकास के इस अन्ध्धुन्द प्रकल्पों के चलते दिल्ली के शहरी चरित्र का नास किया जा रहा है. मसलन यह एक ऐताहिसिक शहर है जो सात बार बसा और उतनी ही बार उजड़ा. इसकी अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत है. जिसकी अनदेखी की जा रही है. जयपुर को लीजिये सहर के विस्तार के बावजूद उसके करेक्टर को बरक़रार रखा गया है. मैं ने पेरिस, लन्दन व मोस्को भी देख रखे हैं पर उनके विकास प्रकल्पों में इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है की शहर का मूल ऐतिहासिक स्वरुप न बिगड़े. अगर पुराणी दिल्ली के शाजेहना बाद की बात करें तो वहां भी पुराणी हवेलियाँ ख़त्म कर भोंडे मकान बन गए हैं. अतएव सिर्फ सर्कार ही नहीं दिल्लीवासी भी इस विरासत समाप्त करने के लिए जिम्मेदार हैं. जरा सोचिये ३६० ऐतिहासिक अवासेशों की जगह अब कुल मिला कर कोई ६० बच पाए हैं. इन किले, मकबरों, गुम्बदों, सरायों, शिकारगाहों और अन्य ऐतिहासिक इमारतों का पुनरुद्धार करने का ख्याल भी अब ६२ साल बाद कामनवेल्थ खेल की वजह से आया है. जिस तरह इन पुराने स्थापत्य अवाशेसों का काम ठेकेद्दारों द्वारा किया जा रहा है, उसका पता तो दो साल बाद चलेगा जब इन भ्रष्ट लोगों की करतूतें सामने आयेगी. मैंने स्वयं समरकंद व बुखारा में में जा कर देखा है कि ऐतिहासिक निर्माणों के restoration का कार्य कितना बारीकी का है और इसे पूरा करने में कायदे से सालों-साल लगते हैं. और हमारी दिल्ली के ये नौकरशाह इन्हें आनन्-फानन में अंजाम देना चाहते हैं परिणाम सामने आ जायेगा. अब येह कोई और दिल्ली होगी जिसकी आत्मा नदारद होगी. O P Pareek

    Arvind Pareek के द्वारा
    09/08/2010

    माननीय, मैं आपकी बात से सहमत हूँ । यह दिल्‍ली में रहनें वालों की जिम्‍मेदारी तो है ही कि वे इसे बिगड़नें ना दें । लेकिन यह भी सच है कि सब के मन में बस एक ही भावना रहती है कि लूट सके तो लूट । इस कारण कोई भी किसी तरह के मौके को छोड़ना नहीं चाहता । भले ही वह हमारी धरोहर को नष्‍ट करने का हो । जहां दो पैसे का व्‍यक्तिगत लाभ नजर आता है वहां ईमानदारी स्‍वाहा हो जाती है । आपने ठीक लिखा है जो बरसों में बिगड़ा हैं उसे पल में क्‍या सुधारेंगें । आपकी प्रतिक्रिया इसी तरह देकर मेरा उत्‍साह बढ़ाते रहें । आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Kailash के द्वारा
04/08/2010

दिल्‍ली के अनेको रूप दिखानें का शुक्रिया भाईजी । जब बरसात में दिल्‍ली में जगह जगह पानी भर गया था तो शीला दीक्षित जी ने कहा था मैं आज जिस रास्‍ते से कार्यालय आई हूँ मुझे तो कहीं पानी भरा हुआ नहीं दिखा । उनसे कहना होगा कि भ्रष्‍टाचार ने सारे गढ्ढे छुपा दिए होगें । बहुत ही बढि़या आलेख है । कैलाश

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/08/2010

    प्रिय श्री कैलाश जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । नेता केवल वही देखते हैं जो वे देखना चाहते हैं और चाहते हैं कि जनता भी वही देखे जो वे दिखाएं । अरविन्‍द पारीक

Tarun Kumar के द्वारा
28/07/2010

लगता है मणिशंकर अय्यर जी ने आपका ब्‍लॉग पढ़ लिया है । तभी ऐसा बयान दे बैठे । दिल्‍ली के हाल के साथ ठेकेदारों की कलाई खोलनें का शुक्रिया । तरूण कुमार

    Arvind Pareek के द्वारा
    06/08/2010

    प्रिय श्री तरूण कुमार जी, आपका धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Nikhil के द्वारा
26/07/2010

प्रिय पारीक जी, मैं दिल्ली में ७ साल रहा, और काफी हद तक दिल्ली मेरे मानस पटल पर अविस्मरनीय छाप ki tarah है. आपने उस छाप को hara-bhara kar diya.

    Arvind Pareek के द्वारा
    27/07/2010

    प्रिय श्री निखिल जी, धन्‍यवादए आपको दिल्‍ली याद आ गई और मानस पटल की छाप हरी-भरी हुई, चलिए कुछ तो सार्थक हुआ । साथ ही बहुत – बहुत बधाई ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने के लिए । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
26/07/2010

अरविन्द जी, जिस तरह भाईजी को आपने कामन मैन का प्रतीक बनाया है वह प्रशंशनीय है क्योंकि भाईजी विशुध्तम भारतीय आम आदमी हैं जिनकी बात लाख टके की लेकिन सुनवाई कुछ भी नहीं| सच जो जोरदार आवाज़ भाईजी की है लगता है जैसे हर भारतीय स्वयं बोल रहा है| इसे कहते हैं सीधी बात नो बकवास!

    Arvind Pareek के द्वारा
    27/07/2010

    प्रिय श्री चातक जी, आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद । बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए । अरविन्‍द पारीक

kmmishra के द्वारा
26/07/2010

दिल्ली भारत का दिल है । आजकल दिल्ली दिल की बीमारी से ग्रसित है । दिल्ली की दिल की धमनियों में कामनवेल्थ नामका एक बड़ा सा ब्लाकेज घर कर गया है । दिल्ली की सांसें फूल रही हैं । रगों में बहते खून का दबाव कम हो चला है । कभी भी हार्ट अटैक हो सकता है ।

    Arvind Pareek के द्वारा
    27/07/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, समाचार मिलते ही मैंनें तत्‍काल दिल के डॉक्‍टर से संपर्क किया । डॉक्‍टर का कहना है कि बीमरी लाइलाज तो नहीं हैं लेकिन दवा निरंतर करनी होगी व समय समय पर सलाह भी लेते रहें । बस चुक यह हो गई की सलाह किससे लेनी है डॉक्‍टर साहब बताना भूल गए । किसी वकील से या डॉक्‍टर से । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
26/07/2010

प्रिय अरविन्द जी, लगता है आप हाल में ही दिल्ली की सैर करके आए हैं ! बहुत सटीक चित्रण किया है दिल्ली का ! सरल भाषा मैं अपनी बात भी कह दे और व्यंग भी कर दिया ! साधुवाद राम कृष्ण खुराना

    Bhaijikahin by Arvind Pareek के द्वारा
    26/07/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, मैं तो दिल्‍ली में ही रहता हूँ । लेकिन भाईजी से मिलने कभी-कभी बाहर चला जाता हूँ । अब भाईजी भी दिल्‍ली आ गए हैं । देखते हैं क्‍या रंग लाते हैं । प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक


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