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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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कॉमनवैल्थ पीड़ितों की सहायता के लिये

Posted On: 4 Jul, 2010 Others,sports mail में

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भाईजी आज मिले तो एक अनोखे रूप मे ! गले में एक बड़ा-सा पोस्टर लटकाये हुए, जिस पर लिखा था ‘कॉमन वैल्थ पीड़ितों की सहायता के लिये दिल खोल कर दान दीजिए !’

मैंनें पुछा, ‘भाईजी ये कौन सी कॉमन सम्‍पति है जो पीड़ा दे रही है ?’ भाईजी तपाक से बोले, कमाल है पारीक भाई, आप विश्‍व कप फुटबॉल के बारे में जानते हैं, विश्‍व कप क्रिकेट जानते हैं, सायना नेहवाल ने तीन-तीन टूर्नामेंट जीते हैं, यह जानते हैं, लेकिन अंग्रेजों के कॉमन गुलामों को नहीं जानतें ? इन कॉमन गुलामों के बाशिंदों के बीच होने वाले खेलों के बारे में नहीं जानतें ?’

मैं भाईजी को बीच में ही टोक देता हूँ,‘मैं सब जानता हूँ भाईजी, भला दिल्‍ली में होने वाले इन खेलों के बारे में कैसे नहीं जानुँगा । इन खेलों के कारण ही तो दिल्‍ली को सजाया संवारा जा रहा है । लेकिन यदि आप इन खेलों से पीड़ा की बात कर रहे हैं, तो बात कुछ समझ नहीं आई ? खेलों के आयोजन में तो अभी बहुत समय है, यही कोई 90 दिन के आसपास यानि तीन महीने का समय है । क्‍या आपको लग रहा है कि हम एक भी स्‍वर्ण पदक नहीं ले पाएंगें ? या खेलों का आयोजन होगा भी या नहीं ?’

‘कमाल है, आप जैसा समझदार व्‍यक्ति इस बात को नहीं समझ सका ? अच्‍छा यह बताइयें कि जब भी हमारे देश में कहीं कोई आपदा आती है-बाढ़, सुनामी, गैस-लीकेज….. आदि तो हम क्‍या करते हैं ?’

‘क्‍या करते हैं ? अरे भाईजी पुरा देश एकजुट होकर यथासंभव सहायता करता है – कपड़े, दवा, खाने-पीने का सामान और रूपया-पैसा अर्थात जो भी संभव हो एकत्रित कर पीडि़तो तक पहूँचाया जाता है । क्‍या आपको पता नहीं अभी जब बिहार में बाढ़ आई थी तब किस तरह सम्‍पूर्ण देश ने सहायता की थी ?’

‘मुझे पता है हमारे देश में दयालुओं का वास है और दूसरों से पैसा इकठ्ठा कर मुसीबत के मारों की सहायता करने वाले भी बहुत हैं तभी तो मैं कॉमन वैल्थ पीड़ितों की सहायता के लिये दिल खोल कर दान देने की मांग कर रहा हूँ ।‘   

अब मुझसे रहा नहीं जाता मैं पुछ ही लेता हूँ, ‘लेकिन ये कॉमन वैल्थ पीड़ित है कौन और कैसे ?’

‘मैं और आप तथा इस देश के सारे मध्‍यमवर्गीय परिवार कॉमन वैल्थ के पीड़ित है । कैसे का जबाव है, इस देश के मंत्रियों और राज्‍य के मुख्‍यमंत्री के बयान और बढ़ती महंगाई । दिल्‍ली में कॉमन वैल्थ खेलों के सफल आयोजन के लिए करोड़ की जगह पर अरबों रूपया खर्च जा रहा है । क्‍योंकि दिल्‍ली को चमकाना है । ’भाईजी तपाक से बोले ।

 

मैंनें कहा, ’भाईजी आपकी नजरों में निम्‍नवर्गीय और उच्‍चवर्गीय परिवारों को इससे क्‍या कोई फर्क नहीं पड़ता? ’

‘जी नहीं, फर्क तो पड़ता है लेकिन गरीब व निम्‍नवर्गीय के तन पर पहले भी कपड़ा नहीं था अब भी नहीं होगा, वो पहले भी सूखी रोटी या बचा-खुचा खाता था अब भी वही खाएगा, वो पहले भी जमीन पर सोता था बिना छत के अब भी वैसे ही सोएगा और उच्‍चवर्गीय की सेहत पर इसका फर्क केवल इतना होगा कि उसके पास और ज्‍यादा धन हो जाएगा और वह ज्‍यादा खर्च कर पाएगा । बस दिखानें व ईर्ष्‍या से जलानें व जलनें की आदत से मजबूर घायल व पीडि़त होगा तो सिर्फ मध्‍यमवर्गीय । क्‍योंकि न तो वह सुखा खा सकता है और ना ही घी चुपड़ा, न तो वह नंगा रह सकता है और ना ही फटे-पूरानें कपड़े पहन सकता है, उसे छत भी चाहिए और बिस्‍तर भी । और सब कुछ क्‍वालिटी व स्‍टेन्‍डर्ड के साथ । अब आप ही बताइये जब देश के मंत्री से लेकर राज्‍य के मुख्‍यमंत्री तक का कहना है कि हमें अपने उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए आज बढ़ती कीमतों का सामना करना ही होगा तो सोच लीजिए कल हमारा भविष्‍य कैसा होगा ? मैं दूर की सोचता हूँ और कॉमन वैल्थ की इस पीड़ा से पीड़ित होने के पहले ही कुआं खोद रहा हूँ । कल जाने क्‍या हों ?’

 

मैं समझ जाता हूँ भाईजी दूर की कौड़ी लाए हैं । अब मानेंगें नहीं । इसलिए पूछ लेता हूँ, ‘चलिए माना कि भविष्‍य में हमें कष्‍ट भोगनें है, यह पीड़ा झेलनी है । लेकिन यह तो बताइये लोग दिल खोलकर दान कहाँ दें ? क्‍या कोई बैंक खाता वगैरा खोल रखा है ? एकत्रित पैसे को बॉंटेगा कौन ? (यही तो सबसे बड़ी मध्‍यमवर्गीय चिंता है कि दूसरा कमा और खा कैसे रहा है ? और मुझे इसमें से क्‍या मिलेगा ?)’

 

भाईजी इसके लिए भी तैयार थे, ‘देखिए उसका भी इंतजाम हो जाएगा । आप जैसे दो चार भाईयों को लेकर एक समिति बना दूँगा ।‘

 

मैं उनकी पूरी बात भी नहीं सुनता व मन ही मन समिति का गठन भी करने लग जाता हूँ, कदली के पात वाले खुराना जी अध्‍यक्ष नहीं नहीं उपाध्‍यक्ष ही ठीक है, भाईजी को ही अध्‍यक्ष बना देंगें और मैं सचिव ना ना कैशियर ठीक है सचिव के लिए सत्‍यमेव और सुदर्शन वाले केकेमिश्रा ठीक है, संयुक्‍त सचिव आलराउंडर वाले सचिन देव ठीक‍ रहेंगें । लेकिन अजय झा, आर के पाण्‍डे जी, निखिल, सुमित यादव, या फिर मुकेश जौनपुर वाले ब्‍लॉग-चोर वो बेचारा तो खाली बैठा होगा, या टॉप-20 की लिस्‍ट से कुछ नाम लुँ या टॉप-10 से ना-ना जो इन लिस्‍टों में नहीं है उनमें से लेना चाहिए, महिला भी तो होनी चाहिए अदिति कैलाश जी ना ना खुराना जी उन्‍हें मास्‍टरनी कहते है, क्‍या पता ज्‍यादा कड़क हो, भोली-भाली रजिया जी, लेकिन पता नहीं वे समिति में आना भी चाहेंगी या नहीं सोनी गर्ग, सीमा जी, उफ्फ कितने लोग है किस-किस को शामिल करूँ ? मेरा माथा चकराने लगता है । तभी भाईजी की आवाज सुनाई देती है, ‘अरे मेरे भाई कहां खो गए । आपने कुछ जबाव नहीं दिया ?’

’क्‍या ? किसका ? क्‍या पूछ रहे थे आप भाईजी ?’मैं सवालों की झड़ी लगा देता हूँ ताकि मेरे मन की बात भाईजी ना जान सके ।

 

‘अरे मेरे भाई, मैं सोच रहा था कि जब तक यह समिति नहीं बनती तब तक क्‍यों ना यह अपील की जाए कि आप सभी प्रतिदिन अपने खाते में 50/- या 100/- रूपये कॉमन वैल्‍थ पीडि़तो के नाम से जमा करते रहें जब हमारा खाता खुल जाएगा हम आपकों बता देंगें । आप एकत्रित राशि हमारे खाते में ट्रांसफर करवा दें । कॉमन वैल्‍थ खेल समाप्‍त होने के एक माह पश्‍चात एकत्रित राशि को सभी मध्‍यमवर्गीय परिवारों में बँटवा दिया जाएगा । ताकि कुछ तो राहत मिलें । कहिए कैसा रहेगा यह आइडिया ?’

 

‘लेकिन भाईजी जो पहले से ही पीडि़त हैं वे यह राशि कहां से लाएंगें ? गरीब और निम्‍नवर्गीय दे नहीं सकते बचे सिर्फ 20 प्रतिशत उच्‍चवर्गीय, वो तो सिर्फ बड़ी-बड़ी व अपनी बनाई संस्‍थाओं को ही दान देते हैं । ऐसे में पैसा कैसे एकत्रित होगा ? ’मैंनें भाईजी से पूछा ।

 

‘अरे आप भी कमाल करते हैं, मध्‍यमवर्गीय की यही तो खासियत है की वह दूसरों को दिखानें के लिए अपनी गुदड़ी से भी ज्‍यादा पांव पसार सकता है ।’और इतना कह निश्चिंत भाव से भाईजी आगे बढ़ गए ।

 

मैं सदैव की तरह सोचनें लगा कि क्‍या वास्‍तव में कॉमन वैल्‍थ खेल हमारी जेब पर डाका डालेगें ? आप क्‍या सोचते हैं ? बताईयेगा जरूर । पोस्‍ट योर कमेंट पर क्लिक करके ।

 

अरविन्‍द पारीक



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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

http://jarjspjava.jagranjunction.com के द्वारा
20/07/2010

..अब में तो आपकी समिति में कोई सहायता क्र नही सकता सिवाय कुछ राय देने के….. वैसे एक राय में देना चाहता हू की आप भी मेरी तरह स्कूटर / motorcycle / कार को नमस्ते कह कर साईकिल की सवारी करना शुरू क्र दें इस प्रकार आप पेट्रोल का प्रयेश्चित भी क्र लेंगे और वातावरण को भी बचा लेंगे और सेहत भी दुरस्त हो जाएगी… :) आशा करता हू आप मेरी सलाह को भाई जी से अवश्य ही अवगत करवायेगे :) -धन्यवाद एवं आभार, निखिल singh

    Arvind Pareek के द्वारा
    21/07/2010

    प्रिय श्री निखिल सिंह जी, भाईजी को आपकी सलाह से अवगत करानें की आवश्‍यकता ही नहीं पड़ी वे पहले ही आपका कमेंट पढ़ चुके थे । साईकिल की सवारी के लिए भी तो साईकिल खरीदनी पड़ेंगी । अब तो उसके लिए भी चंदा एकत्रित करना होगा । धन्‍यवाद एवं आभार । अरविन्‍द पारीक

aditi kailash के द्वारा
06/07/2010

अरविन्द जी, सबसे पहले आपको जागरण मंच पर एक खास मुकाम पाने के लिए हमारी ओर से ढेरों बधाइयाँ और सुनहरे भविष्य की शुभकामनायें…. बहुत ही अच्छा व्यंग्य लिखा है आपने, हमेशा की तरह रोचक और धारदार…. आपने तो हमें टीचर दीदी से मास्टरनी की उपाधि दे दी… कड़क तो हम हैं, पर गलती करने वालों के लिए….

    Arvind Pareek के द्वारा
    15/07/2010

    सुश्री अदिति जी, आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद । शुक्रिया । अरविन्‍द पारीक

rkpandey के द्वारा
06/07/2010

आदरणीय अरविंद पारीक जी नमस्कार , तथ्यों को रोचक ढंग से प्रस्तुत कर विषय की गंभीरता से सबको परिचित कराने की कला निश्चित रूप से अभिनन्दनीय है. कॉमनवेल्थ गेम्स जैसी प्रतियोगिता का आयोजन केवल व्यापारियों, नौकरशाहों और राजनेताओं को फायदा पहुंचाने के लिए है ना कि आमजन को. जिस देश में आम आदमी की दशा इतनी चिंतनीय है कि उसे यह भी नहीं पता होता आगे कैसे उसे रोटी मिलेगी, रोजगार की कमी और गरीबी की भयावहता देखकर रूह कांप जाती है वहॉ पर कॉमनवेल्थ! यह हास्यास्पद होने के साथ ही देश की जनता का मजाक उड़ाने जैसा है. दिल्ली को पेरिस बनाने की बात कहने वाले केवल अपनी पीढ़ि यों के आराम का इंतजाम कर रहे हैं. देश के साथ विश्वासघात की कहानी कहता है ये आयोजन. व्यवस्था के सभी संचालक एक कुचक्र में फंसा चुके हैं देश को.

    Arvind Pareek के द्वारा
    15/07/2010

    प्रिय श्री पांडेय जी, आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद । मैं आपकी बात से सहमत हूँ । नियमित प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । जागरण पर आपका नया ब्‍लॉग नहीं देखा क्‍या कारण है । मैं कभी कभार ही नेट के लिए वक्‍त निकालता हूँ । प्रत्‍युतर देते देते या ब्‍लॉग पब्लिश करते हुए ही समय व्‍यतीत हो जाता है । इसलिए प्रतिक्रिया नहीं दे पाता हूँ । आपका पुन: धन्‍यवाद ।

razia mirza के द्वारा
06/07/2010

आप सही मायने में नंबर 1 के हक़दार ही थे। आपका हर लेख दाद माँग लेता है भाई।

    Arvind Pareek के द्वारा
    15/07/2010

    सुश्री रजिया जी, आपका बहुत बहुत आभार व धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

kmmishra के द्वारा
05/07/2010

अरविंद जी पीड़ितों के लिये चंदा करने की क्या जरूरत है । चंदा तो दे दिया , प्रट्रोल और डीजल के मूल्यों में हुयी वृद्धि की रकम कोई छोटी मोटी तो है नहीं । कांग्रेस को चुनने का पाप किया है बहुमत ने । उसका प्रायश्ति तो करना ही पड़ेगा । आपका लेख पढ़ कर मनोहर श्याम जोशी कृत ‘कक्का जी कहिन’ की याद आ जाती है ।

    kmmishra के द्वारा
    05/07/2010

    प्रायश्ति X पट्रोल X प्रायश्चित प्रेट्रोल

    Arvind Pareek के द्वारा
    05/07/2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, माननीय मनोहर श्‍याम जोशी जी जैसी महान हस्‍ती से मुझ अकिंचन की तुलना मैं बहुत गर्वित महसुस कर रहा हूँ । लग रहा है जैसे प्रथम पुरस्‍कार मिल गया । बस लैपटॉप नहीं मिलेगा यही गम है । प्रायश्चित पेट्रोल की व्‍याख्‍या की आवश्‍यकता महसुस हो रही है । कुछ सहायता करें । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
04/07/2010

प्रिय अरविन्द जी, मैं पोस्ट योर कमेन्ट पर क्लिक करके कह रहा हूँ की यह बहुत सुंदर व्यंग है ! अपने एक नया विषय चुना है ! बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    Arvind Pareek के द्वारा
    05/07/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, धन्‍यवाद । कहीं किसी पृष्‍ठ पर मुझे व आपको बुजूर्गो की श्रेणी में ले आया गया है । आपकी खुशी का मैं अंदाज लगा सकता हूँ कि इस जवां बुजूर्ग की श्रेणी में आकर आप कितने प्रसन्‍न होंगें । लेंकिन मैं ……… अरविन्‍द पारीक

Nikhil के द्वारा
04/07/2010

अरविन्द जी, आप जागरण के चार स्तंभों मैं से एक हैं, और इस बात को आपने पुनः साबित कर दिया. आपके लेख आसानी से उन समस्याओं को कुरेद जाते हैं जिन्हें समझा पाना शायद बड़े-बड़ों के बस मैं नहीं. आपके इस लेख मैं कॉमन वेल्थ के बारे मैं पढ़ा. अपने अनुभव को यहाँ बयां करना चाहूँगा, मैं एक अमेचर शिक्षक हूँ, जब कॉमन वेल्थ के बारे मैं अपने विद्यार्थियों से पूछा तो हैरान रह गया की उन्हें सिवाय इसके की ये एक खेल आयोजन है और कुछ नहीं पता. और अब तक मैंने कई लोगों से भारत को मिली आजादी के दुसरे पक्ष मेरा मतलब ट्रांसफर ऑफ़ पावर के बारे मैं पूछा, जवाब नकारात्मक मिला. १० मैं से ९ लोगों को कॉमन वेल्थ का मतलब भी नहीं पता है इस देश मैं. हमें आदत है, अपने मैं मगन रहेने की. JAKM

    Arvind Pareek के द्वारा
    05/07/2010

    प्रिय श्री निखिल जी, धन्‍यवाद । जागरण के चार स्‍तंभ विशेषण वह भी एक शिक्षक के हाथों (कलम कह नहीं सकता क्‍योंकि की बोर्ड पर आपके हाथों ने इसे टाईप किया है) । मैं धन्‍य हुआ । लेकिन जागरण को एक थर्ड क्‍लास विजेता पसंद आएगा इसमें संशय है । खैर यह तो हुई मजाक की बात । लेकिन यह सही है कि अनेक लोगों को कॉमन वैल्‍थ का मतलब वास्‍तव में नहीं पता । आपका आकलन सही है कि हमें आदत है अपने में मगन रहनें की । लेकिन फिर भी दूसरे की थाली का घी नजर आ ही जाता है । बस जब दूसरे को दर्द होता है तो मन मुस्‍काता है । अरविन्‍द पारीक


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