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भाईजीकहिन Bhaijikahin

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इस देश को ओवरहॉलिंग की जरूरत है?

Posted On: 14 Jun, 2010 Others,न्यूज़ बर्थ में

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‘हॉय अंकल, नमस्‍ते ।’ देखा सामनें से भाईजी का बड़ा बेटा बड़ी तेजी से आ रहा हैं । मैं उसकी नमस्‍ते का जबाव देने की बजाय सोचने लगा था कि चचा सैम का असर कितना हो गया है । पहले हम किसी भी बड़े को मिलते थे तो भाईसाहब, भाईजी, चचा, चाचा, चाचाजी, ताऊ, ताऊजी, दादा या दादाजी कह कर संबोधित करते थे व तदनुसार ही प्रणाम, चरण-स्‍पर्श, धोक आदि कहा करते थे और झुक कर पॉंव छू लिया करते थे और बड़े-बुजूर्ग बदले में आशीर्वाद का ढेर लगा दिया करते थे । लेकिन क्‍या हो गया है आज कि इस पीढ़ी को जो दूर से ही हॉय-हॉय करती है । जैसे सामनें वाले को देखते ही शरीर में तेज दर्द का झौंका उठा हो ।

 

‘हॉय अंकल, नमस्‍ते ! आपने शायद पहचाना नहीं ? मैं…. ।’

 

‘नमस्‍ते, बेटा मैं तो तुम्‍हें दूर से देखते ही पहचान गया था, भाईजी कहां है, कहीं घूमने फिरने गए हैं क्‍या ?’

 

‘नहीं अंकल, वो मेरा प्रापर्टी का काम है ना, आजकल वही देख रहे हैं । मेरे आफिस को संभालते हैं । आजकल काम कुछ ज्‍यादा हो गया है ।’

 

मैं सोचता हूँ, सारे बाजार में मंहगाई की आग लगी है । प्रापर्टी बाजार भी अछूता नहीं हैं । फिर इनका काम कैसे बढ़ रहा है । लेकिन प्रकट में कहता हूँ कि ‘अच्‍छा, चलो उनका मन लगा रहेगा । कहना कि मैं याद कर रहा था ।’

 

मेरा इतना कहना ही हुआ था कि भाई जी किसी देवदूत की तरह अचानक वहां प्रकट हो गए । मैं अचंभित-सा उन्‍हें देख रहा था । ‘कहिए क्‍यों याद कर रहे थे ? क्‍या आपके पास भी कोई जमीन का बड़ा टुकड़ा हैं या कोई फैक्‍ट्री शेड आदि है जिसे किराये पर उठाना है । तगड़ा किराया मिल जाएगा ।’

 

‘क्‍यों भाईजी कोई व्‍यापारी हैं जिसे फैक्‍ट्री-वैक्‍ट्री लगानी है ।’

 

‘अरे नहीं। पिछले कई दिनों से अनेक अमेरिकी, ब्रिटिश और युरोपियन व्‍यक्ति बेटे को फोन कर रहे हैं । उन्‍हें किसी भी कीमत पर भारत के किसी भी घनी आबादी वाले शहर में कैमिकल फैक्‍ट्री लगाने के लिए जगह चाहिए ।’

 

‘आपने पूछा नहीं भारत में ही क्‍यों या भारत के घनी आबादी वाले शहर में ही क्‍यों ?’

‘अरे भाई पूछा था उनका कहना था कि आपके देश में अच्‍छा है, विदेशियों को बड़ा सम्‍मान दिया जाता हैं । आपके कानून को जैसे चाहे वैसे मोड़ा जा सकता है । अमेरिकी, ब्रिटिश या युरोपियन नागरिकों को आप बहुत इज्‍जत देते हैं । वों चाहे एक-दो को मारे या दस-पंद्रह हजार को आप उसे ससम्‍मान हवाई जहाज का टिकट देकर उसके देश भेज देते हैं और अपने देश के नागरिकों को उसके बदले में छोटी-मोटी सजा दे देते हैं । हमने तो ये भी सुना है कि आपके देश के राज्‍य के मुख्‍यमंत्री हो या देश के प्रधानमंत्री सभी इसमें सहयोग करते हैं । इसलिए आपके देश में जहर का कारखाना लगाना घाटे का सौदा नहीं हैं । कम सुरक्षा उपकरण लगा कर पैसे की बचत भी हो जाएगी और हमारी कमाई भी अच्‍छी हो जाएगी । लादेन और दाऊद जैसे लोग हमारे इस धंधे में पैसा लगाने को तैयार है वह भी बिना ब्‍याज के, और एक देश की एक एजेंसी तो हमारा पैसा हमें ही देकर यह चाहती है कि ऐसे कई कारखानें भारत के राज्‍यों की सभी राजधानियों में लगवा दिए जाएं और फिर एक वर्ष के अंदर उनसे गैस का रिसाव करवा दिया जाए । इसके लिए आपको भी तगड़ा कमीशन दिया जाएगा ।’

 

मैंनें कहा, ‘भाईजी आपको पता हैं आप क्‍या कह रहे हैं ? आप देश को विदेशियों के हाथ गिरवी रख देना चाहते हैं । और देश की जनता को खतरे में डालना चाहते हैं ।’   

 

‘अरे नहीं, आप गलत समझ रहे हैं, ये देश मेरा होता तो तभी गिरवी रख सकता था ना, मैं तो इसकी कुछ जमीन किराये पर विदेशियों को दिलवा रहा हूँ, वह भी भारी-भरकम किराए पर । देखिए, इस देश में सिर्फ वोट मेरा हैं लेकिन वह डालना किसे है इस पर मर्जी मेरी जाति, मेरे गांव और पंचायत की चलती है । मैं नहीं भी डालता हूँ तब भी हर बार मेरा वोट डलता है । इस देश का कानुन सबके लिए समान है, ये सिर्फ किताबों में लिखा है । किसी भी धनाड्य या विदेशी का मामला आने पर इसकी व्‍याख्‍या बदल जाती है । तभी तो भोपाल के कातिल खुले घूमते है, आयुषी के कातिल मिलते नहीं है और कानुन को निठारी के कातिलों में से एक हर घटना के समय घटनास्‍थल से दूर मिलता है, क्‍योंकि उस समय उसका मोबाईल घटनास्‍थल पर नहीं था या फिर उसके पास रेल या हवाई जहाज का टिकट था ।’ भाई जी बोले ।

 

‘इसका अर्थ ये हुआ कि आप सोचते हैं कि देश को गैस चैंबर में बदलने दिया जाए ।’ मैंनें कहा ।

 

‘क्‍यों, क्‍या आपको नहीं लगता कि जहां कुछ भी हमारा अपना नहीं लगता हैं ऐसे देश को ओवरहॉलिंग की जरूरत है? जहां सब कुछ नए सिरे से होना चाहिए ।’ इतना कह भाईजी वहां से चल दिए ।

 

मैं सदैव की तरह सोचता ही रह गया कि क्‍या भाईजी का सोचना ठीक है ? आप कहिए आप क्‍या सोचते हैं ?

 

अरविन्‍द पारीक



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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

D.S. Rawat के द्वारा
02/07/2010

got a sms last night about your blog. Soon after reaching office, open the site and read your article which is fantastic, realistic and much more appreciable. My heartiest congratulation for being No.3 with a hope to become No.1 next time. D.S Rawat, NOIDA

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/07/2010

    Respected Rawatji, Its my pleasure to have your comments on my blog. Thank you very much for the comments & wishes. I need these blessings always.

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
30/06/2010

सर … बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने, यहाँ सरकार और प्रशासन का कोई ऐसा अंग नहीं जो अपने उत्तरदायित्व निभाए. ये लोग देश के सफ़ेद कपड़ों वाले, बिना नकाब के आतंकवादी और देशद्रोही है ……………………… अब जरूरत आ गयी है जब हम लोग आगे आयें और दशा सुधार करें ………….

    Arvind Pareek के द्वारा
    04/07/2010

    धन्यवाद शैलेश कुमार पाण्डेय जी, आपने बहुत सही लिखा है. सभी के सहयोग के बिना यहाँ कुछ भी संभव नहीं है. अरविन्द पारीक

R.G.Pareek के द्वारा
18/06/2010

congratulations arvindbhai for the blog. your sensitivities for the society,country and mankind as a whole are really commendable. although I am not compu-savvy person yet I am giving my view. Dont stop thinking about fellow-countrymen suffering at the hands of corrupt politicians. Well done !!

    Arvind Pareek के द्वारा
    19/06/2010

    आदरणीय भाईसाहब, आपकी प्रतिक्रिया पाकर मैं धन्‍य हुआ । आपनें इसके लिए वक्‍त निकाला मेरे लिए यही बहूत है । आप इसे आगे भी पढ़तें रहे व मेरा उत्‍साह बढ़ाते रहे यही मेरी कामना है । निस्‍संदेह आपके प्रोत्‍साहन से यह लेखन की प्रतिक्रिया जारी रहेगी । अरविन्‍द पारीक

Ninad Chaskar के द्वारा
18/06/2010

आज अनायास ही भोपाल कांड के बारे में सर्च करने पर गुगल ने आपके पेज पर पहूँचा दिया । पढ़ा तो लगा कि भारतीय संस्कृति की सोचने वाले भाईसाहब के दोस्त भाईजी अप्रत्यक्ष ढंग से अपनी बात रख देते हैं और आपको सोचने पर मजबूर कर देते है । प्रस्तुति का यह तरीका बहूत बढि़या लगा । देश चाहे कैसा भी रहे, चलता रहेगा । अब विदेशियों की हिम्मत नहीं हैं कि वे इसे गैस चैंबर बना सके । भले ही प्रधानमंत्री इसकी सेल लगा लें । जनता अब जागरूक हो चुकी है । निनाद चास्कर

    Arvind Pareek के द्वारा
    19/06/2010

    प्रिय श्री निनाद जी, आपको पसंद आया, धन्‍यवाद । आपने सही लिखा है कि जनता अब जागरूक हो चुकी है । अरविन्‍द पारीक

kaushalvijai के द्वारा
16/06/2010

पारिक जी, बहुत ही बढ़िया.

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री कुशल विजय जी, व्‍यंग्‍य लेख पसंद आया । धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

बी. एन. शुक्ल के द्वारा
16/06/2010

पारिक साहब, आपने कमाल की टिप्पणी की है। मगर अफसोस यह बातें अपने देश के लुच्चे नेताओं की समझ में नही आती। धर्म और जातियों में बुरी तरह बँटे देश की जनता शायद यह सोच भी नही पायेगी कि ये लुच्चे    नेता हमारी माँ को गिरवी रख रहें है।

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री शुक्‍ल जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अपनी मॉं को मॉं कहते भी अब कुछ अंग्रेजी दा लोग शर्माने लगे हैं । इस पर लगती चोट उन्‍हें खुश ही करती है परेशान नहीं । आपका कहना बिलकुल सही है । अरविन्‍द पारीक

रामेश्‍वर के द्वारा
15/06/2010

पारीक जी बहुत करारी चोट की है, भारत की व्यवस्था पर।  

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री रामेश्‍वर जी, नियमित रूप से ब्‍लॉग पढ़नें का शुक्रिया व आपकी टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Rahul Saini के द्वारा
15/06/2010

काश इस व्‍यंग्‍य लेख को हमारे देश के कर्णधार पढ़ लें । यदि प्रधानमंत्री का ईमेल पता ज्ञात होता तो मैं इस लेख को उनके पते पर अवश्‍य फारवर्ड कर देता । राहुल

    Shanu के द्वारा
    15/06/2010

    bilkul sahi kaha aapne! Par kya is लेख ko padhkar प्रधानमंत्री जी aam janta और desh ke bare me sochne lagenge, Kash ye neta log kuchh desh ki bhalai ke bare me सोचते और aam admi ke bare me sochte. lekin अरविन्द दी aapne sachai लिखी है और me umeed karta hun ki hum jaise am admi ही desh ko nahi raha dikhayenge और jarurat is baat ki है ki shuruat hum अपने ghar और aas pas se करें.

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय राहूल जी, पढ़कर जो भूल जाए उसे नेता कहते हैं । इसलिए यह अपेक्षा रखना कि इससे कुछ असर होगा व्‍यर्थ है। आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री शानु जी, धन्‍यवाद । आपकी उम्‍मीद अवश्‍य पूरी हो यही मेरी कामना है । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा
15/06/2010

बहुत ही स्टीक व्यंग्य किया है आपने आजकी भारतीय व्यवस्था प्रणाली पर ।

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    ए अनाम साथी आपकी टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

sumityadav के द्वारा
14/06/2010

अरविंद जी, बढ़िया कटा्क्ष मारा भारत की व्यवस्था पर। बहुत उम्दा रचना। भाईजी ने बिलकुल सही कहा इस देश को ओवरहालिंग की जरूरत है। देश का पूरा तंत्र भ्रष्ट है।  कर्मचारी-अधिकारी सब भ्रष्ट हैं। पूरे तंत्र की सफाई जरूरी हो गई है। 

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री सुमित यादव जी, तंत्र की सफाई हमारे आपके हाथ में हैं । लेकिन भाईजी की बात से साफ है कि यह वोटरूपी झाड़ू भी स्‍वयं प्रयोग करने पर भी कभी-कभी परिणाम मनचाहे नहीं मिल पाते । क्‍योंकि पौंछा गीला ना था । आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

Chaatak के द्वारा
14/06/2010

हमारे देश की न्याय व्यवस्था की छीछालेदर हिन्दुस्तान के गली मोहल्लों से लेकर ब्रिटेन के अखबारों तक में हो रही है| ऐसे में आपका व्यंग बेगैरत व्यवस्था के ऊपर से गुजरने वाला एक सर्द हवा का झोंका सा है | काश इसी से उनमे कुछ गैरत जाग जाती. अच्छी पोस्ट के लिए मुबारकबाद.

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री चातक जी, मुबारकबाद व टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद । इसी तरह चोट लगती रहेगी तो कभी ना कभी तो असर होगा ही । अरविन्‍द पारीक

R K Khurana के द्वारा
14/06/2010

प्रिय अरविन्द जी, भोपाल त्रासदी पर बहुत अच्छी चोट की है ! वास्तव में हमारे देश में यही सब हो रहा है ! एक कहानी में प्रेम चंद ने कहा था की अगर सरकार बनियों से कहे की उन्हें फांसी देने के लिए रस्सी चाहिए तो सबसे पहले बनिए ही इसके लिए टेंडर देंगे ! बहुत अच्छा व्यंग ! राम कृष्ण खुराना

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    प्रिय श्री खुराना जी, आपको यह व्‍यंग्‍य पसंद आया । धन्‍यवाद । लेकिन महान कहानीकार प्रेमचंद जी की कहानी का उदाहरण इस व्‍यंग्‍य के संबंध में मैं समझ नहीं पाया हूँ । संभवत: आप किसी गहरी बात की ओर इशारा कर रहे हैं । प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

aditi kailash के द्वारा
14/06/2010

बहुत ही सटीक कटाक्ष मारा है…….इस देश को ओवरहॉलिंग की नहीं, पूरी की पूरी इंजन बदलने की जरुरत है….

    अरविन्‍द पारीक के द्वारा
    16/06/2010

    सुश्री अदिति जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । ओवरहॉलिंग ना सही इंजन ही सही लेकिन बदलाव की जरूरत है । यह तो निश्चित है ना । अरविन्‍द पारीक


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