Hindi Blogs, Best Indian Blog

भाईजी कहिन bhaijikahin

मन की बात सबके साथ man ki baat sabke saath

37 Posts

828 comments

bhaijikahin by ARVIND PAREEK


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

नव-प्रज्ञा – Valentine Contest

Posted On: 8 Feb, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

कविता में

32 Comments

डेंचिकुस्वामलेटा वायरल बुखार

Posted On: 9 Nov, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.92 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

26 Comments

आइये शोर मचायें

Posted On: 3 Nov, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (11 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा न्यूज़ बर्थ सोशल इश्यू में

24 Comments

यह खबर कैसे हो सकती है ?

Posted On: 12 Sep, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (14 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा न्यूज़ बर्थ में

17 Comments

दो घटनाएं – हल आप बताएं

Posted On: 24 Aug, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (20 votes, average: 4.80 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

48 Comments

क्या अछुत हो गया हूँ या भारतीय नहीं हूँ ?

Posted On: 9 Aug, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (16 votes, average: 4.88 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

17 Comments

क्या वास्तव में यही इसका समाधान है ?

Posted On: 3 Jun, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (13 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

8 Comments

जागरण जंक्शन ब्लॉग का पर्दाफॉश

Posted On: 3 May, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (22 votes, average: 4.68 out of 5)
Loading ... Loading ...

लोकल टिकेट में

27 Comments

वो रात भर नहीं आई…

Posted On: 16 Apr, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (16 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

13 Comments

आखिर इस मर्ज की दवा क्या है ….?

Posted On: 31 Mar, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (14 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

लोकल टिकेट में

6 Comments

‘आया है मुझे फिर याद वो…’

Posted On: 25 Mar, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (19 votes, average: 4.89 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

6 Comments

महँगा होता दूध और परिवार नियोजन

Posted On: 22 Mar, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (14 votes, average: 4.86 out of 5)
Loading ... Loading ...

जनरल डब्बा में

5 Comments

Page 1 of 212»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Arvind Pareek

आदरणीय निशा मित्तल जी, इस प्रविष्‍टी को पसंद करने के लिए धन्‍यवाद। मेरे विचार से तो आपके लेख जिस तरह के आप लिखती है उनमें में भी एक कविता होती है। इस कारण मुझे लगता है आप कविताएं लिखती तो जरूर है लेकिन मन में अविश्‍वास के कारण उसे प्रकट नहीं करना चाहतीं। दूसरी रचना पोस्‍ट कर चुका हूँ। बस समयाभाव के कारण न तो समय पर प्रत्‍युतर दे पा रहा हूँ और ना ही अधिक टिप्‍पणियां लिख पा रहा हूँ। कारण बिना पढ़ें टिप्‍पणियां देनें की आदत नहीं हैं और पढ़नें में समय लगानें पर टिप्‍पणी का समय नहीं मिल पाता है। आप प्रतिक्रियाओं के उत्‍तर भी समय पर देती हैं। उसके लिए आपका आभारी हूँ। शुभकामनाओं के लिए धन्‍यवाद। बस इसी तरह उत्‍साह बढ़ाते रहिए। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: omprakash pareek

सुश्री दिव्‍या जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार। यहां पर हम कों क्या मिल रहा है …झुनझुना …। आपकी बात से ऐसा लगता है कि आप कुछ मिलनें की उम्‍मीद में यहां आई हैं। क्‍या आपको नहीं लगता कि आपको अभिव्‍यक्ति के लिए इतना बड़ा मंच मिल गया है। भले ही …झुनझुना …मिलें। खैर इसे छोडि़यें बाकी बात आपनें सही लिखी है पैसा देखकर तो अच्‍छे अच्‍छे लोग नाच उठते हैं इन छूटभैये सेलिब्रिटियों की बात ही क्‍या है। लेकिन क्‍या आपको नहीं लगता कि अनपढ़ गंवार व डकैत सीमा परिहार जिसे सबसे ज्‍यादा पब्लिसिटी की जरूरत थी वहां क्‍यों नहीं बदली या कहें कि वह भी बदल गई हैं। नव वर्ष की शुभकामनाएं । आगामी वर्ष अपने आगमन् के साथ आपके जीवन में खुशियों की बहार लाएं और सम्‍पूर्ण वर्ष आप व आपके परिवार के लिए मंगलकारी हो। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

आदरणीय शाही जी, चलिए कोई तो मिला मेरे जैसा। सीरियल तो मैं भी नहीं देख पाता लेकिन मेरे आस-पड़ोस के भाईजी जब इस सीरियल और सीमा परिहार के बारे में बोलनें लगे तो लगा कि इस पर कुछ लिखना चाहिए। चर्चा के बाद ही यह लेख परोस पाया हूँ। इस लेख को तैयार भी आज से लगभग एक महीना पूर्व ही कर चुका था लेकिन कुछेक व्‍यस्‍तताओं के कारण ही इसे अब पोस्‍ट कर पाया। वैसे आपकी बात उचित ही लगती है। टीआरपी ही सब काम करवाती है। सैकड़ों की भीड़ में अपनी पहचान बनानें का यह खेल कुछ भी करवा सकता है। आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ। नव वर्ष की शुभकामनाएं । आगामी वर्ष अपने आगमन् के साथ आपके जीवन में खुशियों की बहार लाएं और सम्‍पूर्ण वर्ष आप व आपके परिवार के लिए मंगलकारी हो। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

प्रिय राशिद भाई, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ। यह सांस्कृतिक हमला तो है ही लेकिन यदि स्क्रिप्‍ट लिख कर रियल्‍टी प्रोग्राम बनाए जाते हैं तो फिर ये रियल्‍टी कहां से हुए। दूसरे स्‍वयं को सेलिब्रिटी समझने वाले लोगों का व्‍यवहार क्‍या वास्‍तविक जिंदगी में भी यही रहता है। तीसरी बात विदेशों से अनेक प्रोग्राम आयातित किए गए हैं लेकिन उनका भारतीयकरण भी हुआ है तो क्‍या इस कार्यक्रम का यही भारतीयकरण है। मुझे तो ऐसा लगता है कि यह सब पैसे का खेल है और कुछ नहीं जैसे कुछ अभिनेत्रियां पैसे के लिए कपड़े उतारनें को तैयार रहती है वैसे ही कुछ लोग पैसे के लिए नीच से नीच हरकत को तैयार हो जाते हैं। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

प्रिय अरंविद पारिक जी, मै तो अपना हौसळा खो दिया था। ळेकिन इन तीनो लेख को पढ.कऱ मेरा हौसला जाग उठा। अब मेरी हाथों मै नई जान सी आ गई है। मुझे एक नया कलम मिल गया है। पारिक सर, आपने जो काम किया है वह इस देश की राजभाषा को खुब आगे बढ़ाएगा और एक नई उचाईं देगा। आप हमारे देश की राजभाषा को बढ़ाने में दिल से प्रयास कर रहे है। इतना बड़ी समस्या थी की मैं पिछले एक वर्ष से इसको सीखना चाहता था। आप इसे कुछ भी कह दो लेकिन यह राजभाषा के विकास के लिए एक अदना सा प्रयास नहीं है परन्तु बहुत ही मेहनती प्रयास है। आप वाकई में बधाई के पात्र है, और ईश्वर से प्रार्थना करते है की वे आपके हौसले का और उचाँई दे ताकि सभी भारतवासी आप पर गर्व करें। इन चीजों से जो बात उभर कर आती है वह यह है कि आप सच्चे दिल से राजभाषा को आगे बढ़ाने के लिए अटूट परिश्रम करते है। मैं आपकी इस जानकारी के लिए बहुत आभारी हैं। बड़ा उपयोगी बात आपने बताई है। अब मुझे एक जानकारी चाहिए कि मैं जब मैं एम. एस. बोर्ड पर इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर टाइप करता हूँ उदाहरण के लिए (मुझे ६८५ कि. मी. चलना है।) इसमे ६८५ को मैं 685 (रोमन अंक) इस तरह से लिखना चाहता हूँ। और मैं रनिंग टाइप करते हुए इनस्कृप्ट की-बो़र्ड से 685 लिखना चाहता हूँ। जबकि मुझे बार-बार रोमन अंक लाने के लिए टाँस्क बार पर जाकर इगलिश का EN सलेक्ट करना पड़ता है। कृप्या मुझे इसके लिए कोई सार्ट-की कोई हो तो बताएं। एक बात मै इस संदर्भ में बताना चाहता हूँ की यही समस्या गुगल ट्रास-लिटेरेशन पर आँन लाईन आता है, तो वहाँ पर CTRL + G दबाने से रोमन अंक आना शुरू हो जाता है। जबकि एम. एस. वर्ड में ट्रास-लिटेरेशन की-बोर्ड सलेक्ट करने पर टाइप करते समय रोमन अंक तो अपने आप आना शुरू हो जाता है। परन्तु इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर अगर अंक टाइप करता हूँ तो वह हिन्दी में अंक आता है। जैसें कि ४४५२४, तो मुझे लगातार टाईप करते हुए 44524 चाहिए। कृप्या समस्या का सामाधान करें। आभारी राम प्रवेश, आणंद, गुजरात। चुकिं यह कमेंट आपके अंग्रेजी की बोर्ड से हिन्दी में टाईप करें – 3, कुछ सवाल कुछ समाधान के बाँक्स में नहीं ले रहा था, इस वजह से मैं अपना कमैंट इस बाक्स में छोड़ रहा हूँ। क्षमा करिएगा।

के द्वारा: R. P. Prasad

प्रिय श्री राम प्रवेश जी, सर्वप्रथम तो आपका धन्य्वाद की आपनें मुझे आणंद जाकर भी याद रखा और दूसरा धन्यकवाद इसलिए कि आपनें मेरी प्रशंसा करते हुए इतने शब्दा हिन्दी में लिखें । प्रशंसा के लिए भी आभारी हूँ । मुझे यह जानकर अत्य धिक प्रसन्नएता है कि आपनें अभी भी हिन्दी में लिखना नहीं छोड़ा है । इसके लिए आप भी बधाई के पात्र हैं । अब बात आपकी समस्याै की । जब आप हिन्दीै इन्सिक्रिप्ट की बोर्ड से टाईप कर रहे हों और अंतरराष्ट्री य अंको का प्रयोग करना चाहते हो तो इसके लिए आप को केवल लेफट अल्टि की के साथ शिफ्ट की (Left Alt के साथ shift) दबानी होगी । तब इससे भाषा परिवर्तित होकर आपकी डिफॉल्टव भाषा अंग्रेजी हो जाएगी । आप पुन: अंतरराष्ट्री य अंको को टंकित करने के बाद पिछली भाषा पर लौटने के लिए यही की फिर एक साथ दबाएं तथा हिन्दीी इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड से टाईप करना प्रारंभ कर दें । मेरे विचार से इससे आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा । कृपया अन्य लेख भी पढ़ें व टिप्पएणी देंगें तो मुझे हार्दिक प्रसन्न्ता होगी व यह भी चाहूँगा कि कृपया इस ब्लॉंग को नियमित रूप से पढ़तें रहे व अपने विचारों से अवगत कराते रहें । एक बार फिर धन्येवाद । अरविन्दर पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

मै तो अपना हौसळा खो दिया था। ळेकिन इन तीनो लेख को पढ.कऱ मेरा हौसला जाग उठा। अब मेरी हाथों मै नई जान सी आ गई है। मुझे एक नया कलम मिल गया है। पारिख सर, आपने जो काम किया है वह इस देश की राजभाषा को खुब आगे बढ़ाएगा और एक नई उचाईं देगा। आप हमारे देश की राजभाषा को बढ़ाने में दिल से प्रयास कर रहे है। इतना बड़ी समस्या थी की मैं पिछले एक वर्ष से इसको सीखना चाहता था। आप इसे कुछ भी कह दो लेकिन यह राजभाषा के विकास के लिए एक अदना सा प्रयास नहीं है परन्तु बहुत ही मेहनती प्रयास है। आप वाकई में बधाई के पात्र है, और ईश्वर से प्रार्थना करते है की वे आपके हौसले का और उचाँई दे ताकि सभी भारतवासी आप पर गर्व करें। इन चीजों से जो बात उभर कर आती है वह यह है कि आप सच्चे दिल से राजभाषा को आगे बढ़ाने के लिए अटूट परिश्रम करते है। मैं आपकी इस जानकारी के लिए बहुत आभारी हैं। बड़ा उपयोगी बात आपने बताई है। अब मुझे एक जानकारी चाहिए कि मैं जब मैं एम. एस. बोर्ड पर इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर टाइप करता हूँ उदाहरण के लिए (मुझे ६८५ कि. मी. चलना है।) इसमे ६८५ को मैं 685 (रोमन अंक) इस तरह से लिखना चाहता हूँ। और मैं रनिंग टाइप करते हुए इनस्कृप्ट की-बो़र्ड से 685 लिखना चाहता हूँ। जबकि मुझे बार-बार रोमन अंक लाने के लिए टाँस्क बार पर जाकर इगलिश का EN सलेक्ट करना पड़ता है। कृप्या मुझे इसके लिए कोई सार्ट-की कोई हो तो बताएं। एक बात मै इस संदर्भ में बताना चाहता हूँ की यही समस्या गुगल ट्रास-लिटेरेशन पर आँन लाईन आता है, तो वहाँ पर CTRL + G दबाने से रोमन अंक आना शुरू हो जाता है। जबकि एम. एस. वर्ड में ट्रास-लिटेरेशन की-बोर्ड सलेक्ट करने पर टाइप करते समय रोमन अंक तो अपने आप आना शुरू हो जाता है। परन्तु इनस्कृप्ट की-बो़र्ड पर अगर अंक टाइप करता हूँ तो वह हिन्दी में अंक आता है। जैसें कि ४४५२४, तो मुझे लगातार टाईप करते हुए 44524 चाहिए। कृप्या समस्या का सामाधान करें। आभारी राम प्रवेश, आणंद, गुजरात। चुकिं यह कमेंट आपके अंग्रेजी की बोर्ड से हिन्दी में टाईप करें – 3, कुछ सवाल कुछ समाधान के बाँक्स में नहीं ले रहा था, इस वजह से मैं अपना कमैंट इस बाक्स में छोड़ रहा हूँ। क्षमा करिएगा।

के द्वारा: R. P. Prasad, Inspector

स्नेही श्री पारीक जी, २८ वर्षों में पूरी एक पीढ़ी जवान से बुजुर्ग जो गई, दूसरी बचपन छोड़ जवानी के गीत गाने लगी लेकिन व्यवस्था की मशीन में किसी ने तेल ना डाला सो अपनी जगह पर ही जस की तस बनी रही| आपकी इन संवेदनाओं पर मरहम तो नहीं लगा लेकिन अब उनके नासूर बनने का दर्द जरूर साल रहा होगा| आप भी तो न बदल सके, २८ वर्ष पहले भी आप आम आदमी थे और आज भी आम आदमी ही हैं| बशर्ते आम पहले आपकी पहुँच में थे आज आपकी पहुँच के बाहर हो गए| ये हमारी स्वाधीनता के फल है पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं बस पैकिंग बदल रही है, इसका रस आज भी आम आदमी के लिए कसैला ही है| सभी लघु-कथाएँ अच्छी हैं और समीचीन भी| काश कि आने वाले दिनों में ये सिर्फ कहानियाँ ही रह जाएँ! आमीन!

के द्वारा: chaatak

श्रद्धेय पारीक जी, ये सभी सच हमेशा सच ही रहेंगे । जिन कपड़ों से ग़रीबी झांकती है, उसे सुलभ शौचालय से अधिक महत्व कभी भी प्राप्त नहीं हुआ, परन्तु फ़ारिग होने के लिये लोग लाइन तो लगाते ही हैं । हर एक हज़ार में एक विवाह दहेज़ के लिये विवादास्पद बनता है, फ़िर भी अगर किसी दिन कोई नवविवाहिता नहीं मरी, तो घोर आश्चर्य होना भी स्वाभाविक है । हम तो थानों में दर्ज़ मामलों के आधार पर तैयार आंकड़ों को ही देखने के अभ्यस्त हैं, जबकि असल मौतों का आंकड़ा उससे कई गुना अधिक है । रही राष्ट्रपिता को छुरा घोंपने की बात, तो उस नौजवान ने फ़िर भी नैतिकता दिखाते हुए सीने में खंज़र घोंप कर सच दिखाया, यहां तो रोज़ उन्हीं के अनुयायी नित्यप्रति उनका नाम जप-जप के पीठ में छुरा घोंपे जा रहे हैं । अच्छे प्रस्तुतिकरण के लिये बधाई ।

के द्वारा: आर. एन. शाही

क्‍या यही भ्रष्‍टाचार की असल जड़ नहीं हैं कि हम जान कर भी अनजान है... आदरणीय भाई जी ..सादर अभिनंदन.... अब मुझको तो यही समझ में नहीं आ रहा है की भाई जी आपके कारण हमारी श्री पारीक जी से मुलाकात होती है या फिर पारिक जी के कारण आपसे .... जहां तक भ्रष्टाचार की जड़ का सवाल है तो उसके बारे में मेरा तो यही कहना है की उसके लिए मेरा इस देश में ज़न्म लेना ही सबसे बड़ा कारण है ..क्योंकि यहाँ पर मैं खुद भी इस भर्ष्ट तंत्र के पहिये का एक अहम हिस्सा बन गया हूँ .....अगर लेता नहीं हूँ तो देने का पुण्य कार्य तो करना ही पड़ता है .... एक शानदार लेख के लिए बधाई , जिसमे की एक कमी भी खली जोकि खली पहलवान जैसी ही मालूम पड़ती है मुझको ...और वोह है ...."कफन घोटाला"

के द्वारा: rajkamal

श्रद्धेय पारीक जी, कहा गया है कि दर्द की दास्तान से ही व्यंग्य की उत्पत्ति होती है । आपका यह आलेख इस फ़लसफ़े का जीवन्त प्रतीक है । चलिये इसी बहाने इतने सारे घोटालों को एक साथ एक मंच पर लाकर आपने एक तरह का घोटालों का संस्मरण भी प्रस्तुत कर दिया । रोज़ नए घोटाले होते हैं, दो दिन की हाय तौबा मचती है, फ़िर नया घोटाला पिछले को विस्मृत कर कभी-कभी ही पढ़े जाने वाले इतिहास के पन्नों में धकेल देता है । इस बीच जांच समितियों के गठन की रस्म अदायगी कर घोटालों का श्राद्ध भी संपन्न कर दिया जाता है । ऐसी जांच, जिसकी कोई रिपोर्ट या कार्रवाई किसी को कभी देखने को नहीं मिलनी है । तो हम बन्दर करें भी तो क्या! 'किस-किस को याद कीजिये, किस-किस को रोइये, आलू-प्याज कहीं बड़ी चीज़ है, बटुए को टोइये' । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' आदरणीय पारिक जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

के द्वारा: sd vajpayee

हो सका तो बच्‍चों को घर बैठे ही स्‍कूली शिक्षा पा लेने के प्रमाणपत्र दे दिए जाएंगें । डाक्‍टरों को निर्देश दे दिए जाएंगें कि पुरूष भ्रुण होने पर उसे तत्‍काल खत्‍म कर दे । किसी प्रकार की अनुमति की आवश्‍यकता नहीं होगी । जब तक की स्‍त्री-पुरूष की संख्‍या बराबर न हो जाए । भले ही महिला आरक्षण ना कर पा रहे हों । बाल मृत्‍यु दर, मातृत्‍व मृत्‍यु दर को काबू मे लाने के लिए आंकड़ों की दोबारा जांच की जा रही है । हो सकता है उनमें त्रुटि हो । आप देखेंगें कि ये दर शीघ्र काबु में आ जाएंगी । सुन्दर पंक्तियों से सजे इस लेख के लिए हरिदिक बधाई......... दीपावली की आपको और आपके पुरे परिवार को हार्दिक बधाई............... ये दीपावली आपके जीवन को खुशियों से भर दे...........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

श्रद्धेय पारीक जी आपकी माता जी के साथ गुजरे कष्ट के क्षणों और उस दौरान आप तथा अन्य परिजनों की मनोदशा के बारे में सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं । मैं अपने एक मित्र की ऐसी ही स्थिति के समय होने वाले अनुभव से परिचित हूं । आपकी माता जी के पूर्व पुण्य कर्म एवं आपलोगों की अनवरत सेवा तथा उचित निर्णय लिये जाने के कारण आपकी खुशियां लौट आईं, यही सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाय । डाक्टर्स शायद भय खाते होंगे कि यदि पहले सकारात्मक बताया, और परिणाम नकारात्मक आया, तो प्रतिक्रिया उग्र हो सकती है । इसलिये निराश करो, ताकि सकारात्मक होने पर उत्साहजनक प्रतिक्रिया प्राप्त हो, और नकारात्मक पर कहा जा सके कि मैंने तो पहले ही बता दिया था । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय श्री वसंत नाथ सैन जी, नमस्‍कार । शिव मुर्ति कला संगम के बारे में अज्ञात जानकारियों को सार्वजनिक करनें पर मैं आपका आभारी हूँ । आपनें ठीक लिखा है कि शिव मुर्ति कला संगम मिनी भारत है । सर्वधर्म समभाव की झलक देने वाली आपकी इस संस्‍था की स्‍थापना के लिए आप बधाई के पात्र हैं ।  मैं यही कामना करूँगा कि यह संस्‍था इसी तरह समाज कल्‍याण व संस्‍कृति की संरक्षा के कार्य निरंतर करती रहे । मेरा सुझाव है कि आप संस्‍था के कार्यो की झलक सभी तक पहुँचाने के लिए अपनी संस्‍था का एक ब्‍लॉग बना लें अथवा www.Indiaeleven.com जैसी वेबसाईट पर अपनी फ्री साईट या ब्‍लॉग बना सकते हैं । इसके माध्‍यम से आप अपनें सदस्‍यों को सूचना भी दे सकते हैं । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

पारीख जी, धन्यवाद्. आपके माध्यम से संगम की गतिविदियों उज्जागर हुई हैं. संगम के बारे में अपने ब्लॉग बहुत ही सुंदर तरीके से जानकारी देने के लिए मैं आपका आभारी हूँ. संगम में सदस्य भारत के करीब हर स्थान / राज्य से हैं. कश्मीर से लेकर केरल तक, गुजरात से बंगाल तक के निवासी संगम के साथ जुड़े हैं, संगम के सदस्य हैं. श्री स. म. अब्बास जो कि मुस्लिम समुदाय से हैं और श्री गुरचरण सिंह, श्रीमती कौर जो कि सिख समुदय के पुरुष तथा महिला हैं, वे भी संगम के सदस्य हैं और संगम के कार्यो में तन मन और धन से साथ देते हैं. संगम को आप मिनी भारत भी कह सकते हैं. संगम विधार्थियों को शिक्षा अर्जन हेतु कॉपी किताबें ड्रेस स्वेस्टर आदि भी वितरिक किये जाते हैं. चित्रकला तथा निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमे हर प्रतियोगी को पुरष्कार दिया जाता है, प्रथम दितीय तथा त्रितय स्थान प्राप्त करने वालो को अलग से पुरष्कार दिए जाते हैं. एक बार फिर से आप को धन्यवाद्.

के द्वारा: Basant Nath Sain

के द्वारा: soham joshi

प्रिय श्री एबीसी जी या कहूँ आजाद भारत के कर्णधार जी, खैर आप जो भी है । आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि ये सच्‍ची घटनाएं है । जिस तरह एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है बस उसी तरह एक घटना के कारण या एक व्‍यक्ति के कारण उस श्रेणी के सभी व्‍यक्ति वैसे ही समझ लिए जाते हैं । उदाहरणार्थ सारे सरकारी बाबू कुछेक भ्रष्‍टाचारियों की वजह से या उनके काम ना करने की वजह से आज भ्रष्‍टाचारी या आलसी कहलाते हैं । अंत में आपने मेरी बात का समर्थन किया उसके लिए आभारी हूँ । एक पुरानी पोस्‍ट पर अब प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । कृपया अन्‍य पोस्‍ट भी पढ़ें व अपनी राय से अवगत करायें । अंत में एक बात और यदि आप हिंग्‍लिश में या हिन्‍दी में टाईप कर सकते हैं तो फिर प्रतिक्रिया में विचार हिन्‍दी भाषा में लिखें तो मुझे अत्‍यधिक खुशी होगी । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

हेलो भाईजी! सोरी टू से देट दीस़ टू इन्सिडेन्टस डस़ नोट सीम टू बी दी रीयल वन्स बट दी इमेजीनेटरी वन्स। फोर दी फस्ट इन्सीडेन्ट, आई वुड लाईक टू से देट, आई एग्री डेट सम गर्ल्स ऑफ ऑवर सोसाईटी आर गैटिंग मोर्डनाईज़, ईवन अ लिटल बिट अनसिविलाइस़ड, बट स्टिल दे हेव सच एक्सटेन्ट ऑफ सेन्सिबलिटि ऑर सिविलाईज़ेशन देट दे डोन्ट आस्क सीनीयर सिटिजन्स टू वेकेट दी लेडीस़ सीट। एन्ड देट टू ऑफ्टर अपोज़ीशन फ्रोम सो मैनी पीपल, रीयली, आई डोन्ट थिंक देट ऑवर गर्ल्स आर सो अनसिविलाइस़ड। इफ देअर इस़ वन आउट ऑफ थाउज़ेन्ड, वी शुड नोट वरी अबाउट इट, ऑफ्टरऑल एक्सेपशन्स आर आलवेज़ देअर। फोर दी सेकन्ड इन्सिडेन्ट, आई वुड लाईक टू से देट ऑवर मेच्योर जनरेशन अन्डरस्टैंड दी सिगनिफिकेंस ऑफ रक्शाबन्धन। दे ऑलवेज़ सेलीब्रट दिस फेस्टिवल विद इट्स एक्चुअल स्पिरिट। मे बी देट सम पीपल सेलीब्रेट इट जस्ट फोर फोरमेलिटि, इट डिपेन्डस अपोन दी डेप्थ ऑफ रिलेशनशिप, बट देअर इस़ नोट मच एक्सपेक्टेशन फोर मनी। हाओएवर इफ चिल्ड्रन एक्स्पेक्ट सम मनी ओर गिफ्ट, दैन इट इस़ नोट ऐ मेटर ऑफ सीरियस कन्सर्न। ऑफ्टरऑल चिल्ड्रन आर चिल्ड्रन एण्ड दे आर एक्सपेक्टिड टू बिहेव लाईक दी सेम।

के द्वारा: abc

भाईजी, इस पड़ोसी की चिंता करने से क्‍या लाभ । हॉं हमारा घर ही कहीं इसके लपेटे में ना आ जाए । यह डर वास्‍तव में ज्‍यादा बड़ा है । आपनें ठीक लिखा है कि क्‍या हम अपनें पड़ोस में धारावी जैसी एक अबुझ झुग्‍गी बस्‍ती को झेल पाएंगें, जिसकी अंधेरी गलियों में पनप रही अलगाववाद व आतंकवाद की आग हमें ही लीलनें को आगें न बढ़ जाएं ? निस्‍:संदेह पाकिस्‍तान सरकार शिक्षा पर खर्च को बढ़ा कर ही पाकिस्‍तान को पाक-साफ बना सकती हैं व भारत के सानिध्‍य का लाभ उठाकर लोकतंत्र की जड़ें मजबूत कर सकती है । बस इसके लिए सोच को बदलना होगा । लेकिन पाकिस्‍तानी हुक्‍मरानों को ये बातें बताऐगा कौन । वैसे हमारे देश में भी मुस्लिम बस्तियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे शिक्षा के प्रति उनकी सोच भी यही है । बहुत कम मुस्लिम परिवार उच्‍च शिक्षा की बात सोचते हैं । रितेश

के द्वारा: Ritesh

श्रद्धेय पारीक जी, प्रणाम! पाकिस्तान के संदर्भ में दोनों ही बातें सत्य के क़रीब हैं । यह सोच कि शिक्षा से आने वाली जागरूकता कहीं वर्तमान शासकीय ट्रेंड चाहे फ़ौजी हो या गैर फ़ौजी, उसकी धारा को मोड़कर कठमुल्लों और इस्लामिक आतंकवाद की आत्मा जहालत को चुनौती देकर इनके अस्तित्व को ही नेस्तनाबूद न कर दे, और दूसरा यह भी, कि इस प्रकार की पीढ़ी को लम्बे समय तक भारत का डर दिखाकर उसके विरोध के नाम पर सत्ता में नहीं रहा जा सकता । लेकिन इस्लामिक आतंकवाद का बनाया हुआ गढ़ पाकिस्तान अब उसके भस्मासुर बन जाने के बाद वैसे भी लम्बे समय तक अपना अस्तित्व बरक़रार रख पाएगा, इसमें भी संदेह ही है । अच्छी पोस्ट के लिये बधाई ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आपकी कलम ऐसे मुद्दे उठाती है जो हमेशा सही लगते है लेकिन भाईजी की समस्या से हम सभी रूबरू होते है क्योकि व्यावहारिकता और सोच में यही फर्क है ,,संजय दत्त पर ताली बजा सकते है पर खुद संजय दत्त सा व्यवहार नहीं कर सकते... और दूसरी तरफ सम्मान आपके सामर्थ्य का ही होता है ,, पद हो या आप दबंग चुलबुल पण्डे हो ... नहीं तो साहब लोग तो कुर्सी से हटने के बाद राष्ट्रपति को भी नहीं कुछ समझते...शायद आपको याद होगा कलम साहब राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब अपने नए घर में गए... तो उन्हें भी पता चल गया पद की महिमा... क्योकि पूर्व सुचना के बाद भी उनके घर में लाइट और साफ़ सफाई की भी व्यवस्था ठीक से नहीं करी गई थी... जब मिडिया में हल्ला हुआ तब जाके व्यवस्था की गई... क्या करे ऐसा ही है... भाई जी तो सब जानते ही है

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

हिंदी को भले ही राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जा सका है पर दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा विश्वविद्यालयों में आज हिन्दी पढ़ाई जा रही है । आज दुनिया के बहुत से देशों में जहां जहां भारतवंशी रह रहे हैं हैं वहां हिंदी फल फूल रही है । इंटरनेट पर तेजी से फैलने वाली भाषा भी आज हिंदी ही है और दुनिया का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार भी हिंदी में प्रकाशित होने वाला अखबार दैनिक जागरण है । संविधान के अनु0 343 से 351 को देख कर यही लगता है कि हिंदी को टूटी हुयी बैसाखियां ही दी गयी हैं लेकिन हिंदी आज किसी बैसाखी की मोहताज नहीं है । हिंदी का संवैधानिक पक्ष हम सब के सामने रखने के लिये अरविंद जी आपका बहुत बहुत आभार ।

के द्वारा: K M Mishra

प्रिय श्री पारीक जी, कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे हिंदी भाषा न बनकर सिर्फ एक मुद्दा है जिसे जब-तब मौका पाकर उठाया जाता रहा है | हिंदी को राष्ट्र-भाषा बनाने के लिए अक्सर जिरह बहस देखी जा सकती है | फिर भी एक प्रश्न तो उठता है कि जिस देश में सबसे ज्यादा बोली-समझी जाने वाली भाषा अंग्रेजी हो वहां राजकीय कार्यों में हिंदी का प्रयोग किया भी कैसे जाय | दूसरा प्रश्न यह है कि हिनुस्तान में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा तमिल है न कि हिंदी, ऐसे में हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देना कहाँ तक तर्कसंगत है | हमें क्षेत्रवाद से थोडा ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है | हिंदी का उत्थान संसद (केंद्र) से नहीं, अपितु उत्तरप्रदेश और कुछ हद तक उत्तराखंड, बिहार और मध्यप्रदेश राज्यों से है यहाँ भी हिंदी प्रमुख भाषा तो जरूर है लेकिन अधिकतम लोगों के लिए प्रथम भाषा हिंदी न होकर कोई बोली है (अवधि, ब्रज, भोजपुरी, गढ़वाली, कुमायूनी, मैथिलि, आदि)| हमारे देश के लिए जिसके लिए बुजुर्ग कहते हैं - 'कोस-कोस पर पानी बदलै, तीन कोस पर बानी' भाषा और बोली जैसी बातें बहस और श्रेष्ठता का नहीं अपितु गर्व का मुद्दा होना चाहिए| किसी भी भाषा से दुराव या किसी भी भाषा से द्वेष उचित नहीं, अंग्रेजी से भी नहीं क्योंकि दुनिया जानती है कि अंग्रेजी में आज भी हिन्दुस्तानियों से बेहतर कोई नहीं | सरकारी दफ्तर तो नियमो की अवहेलना के लिए ही बनाये जाते हैं सो वे अपना काम बेहतर रूप में अंजाम दे रहे हैं| अच्छी पोस्ट और सुव्यवस्थित पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak

प्रिय श्री अफरोज जी, बहुत ही अच्छी बात लिखी है आपनें । निस्संदेह आपके जैसे सुलझे हुए विचारों की ही इस देश को जरूरत है । इसी तरह उत्साह बढ़ाते रहिए । और हां, जागरण जंक्शान के किसी भी ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पोस्ट या लेख के अंत में व सभी कमेन्टस से ऊपर लाल रंग में दिखाई देने वाले Post your comments पर क्लिक करके अपनी प्रतिक्रिया दिया करें । Reply बटन पर तभी क्लिक करना चाहिए जब आप किसी की दी गई प्रतिक्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं । इससे ब्लॉग लेखक को आपकी प्रतिक्रिया देखनें व पढ़नें व आभार व्‍यक्त करने में आसानी होगी । आशा है आप इस जानकारी को अन्य‍था न लेंगें । अरविन्द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: Arvind Pareek

आदरणीय पारीक जी,आज बहुत दिनों के बाद आपका ब्लॉग फिर से पढने का मौका मिला,हमेशा की तरह प्रभावित हुए बिना न रह सकी| पिछले ४ ब्लोग भी अभी पढ़े,केफे कभी -कभी ही आ पाती हूँ,अपनी मेल देखती हूँ व ब्लोग्स पढ़ती हूँ |यही मेरे शौक है| आपकी बात बिलकुल सही है,यह धार्मिक उत्सव सौहार्द के प्रतीकही तो है तभी तो जन जन इससे जुड़ा है फिर चाहे वो किसी धर्म का हो |पर अफ़सोस चंद स्वार्थी लोग अपना मतलब साधने के लिए इसका गलत फायदा उठा लेते है |पर समझ नहीं पाती की इतना कुछ हमारे इर्द गिर्द रोज घटित होता है,पर लोग उनकी बातो में क्यों आ जाते है ?क्यों नहीं समझ पाते उनकी चाल?धारावाहिक में तो टी.आर.पी.के लिए हीरो बुद्धू होता है,असल जिन्दगी के हीरो (आम आदमी )को क्या हो जाता है? क्यों बिक जाता है इन चालबाजों के हाथ?धार्मिक उत्सव शायद उसे सही राह दिखाने का भी काम करते है,इनके आयोजनों में हर धर्म की रोज़ीरोटी जुडी होती है |आपके इस ब्लॉग के जरिये हमें भी अपने दिल की बात सभी से कहने का मौका मिल जाता है तहेदिल से आभारी हूँ | सादर वन्दे पूनम

के द्वारा: poonam

अरविंद जी आप ठीक कह रहे है आज के दिनों में केवल यही कुछ त्यौहार ही रह गए है जैसे शिवरात्रि, जन्मादष्टवमी, नवरात्रा, ईद, एवं दशहरा जिस में हम लोगों का श्रद्धा से एक जुट होकर समाज में स्नेह, प्रेम, एवं सांप्रदायिक सोहार्द के दर्शन कर पाते है। हमारे समाज में भेद भाव है नही पर कुछ असमाजिक तत्व इस प्रेम को देख कर जलते है और किसी न किसी बात पर उसे भड़का कर झगड़े का रूप दे देते है जिस से हमारे बीच दीवार खिच जाती है। मैं आप को बताना चाहुँगा कि आपकी इस पोस्टन को पढ़कर मुझे भी ब्लॉकग लिखने की प्रेरणा मिली है । इसलिए मैंनें जागरण जंक्शकन व इंडिया इलेवन पर अपने ब्लॉॉग बनाएं हैं । कृपया उन्हें देखें व अपनी राय से अवगत कराएं । http://www.deepakjoshi63.jagranjunction.com http://www.indiaeleven.com

के द्वारा: Deepak Joshi

प्रिय श्री अरविन्द पारीक जी, भाई जी के साथ आपके समक्ष आई इन घटनाओं से सिर्फ एक तथ्य झलकता है- ये है 'गिरती हुई नैतिकता' जिसे और गिराने पर सरकार से लेकर न्यायाधीश तक अमादा हैं | कारण साफ़ है जब नैतिकता ही नहीं बचेगी तो सबकुछ भौतिकता पर आश्रित होगा और बन जायेगा भारत भी यूरोप | आजादी के समय ही डाक्टर राधाकृष्णन ने कहा था 'स्त्रियों में कम होती दया और उनके अन्दर आ रही अनैतिकता स्त्रीत्व में आई कमी का कारण बन रही है' ये चिंताजनक है| इसे रोकना भी आसान नहीं क्योंकि यौन और शारीरिक शिक्षा के नाम पर बालमन को ही दूषित करने की रणनीति अपने पूरे शबाब पर है | जिस उम्र में बालमन का ध्यान नैतिक कथाओं पर होना चाहिए उस उम्र में उन्हें सुरक्षित सेक्स और कर्त्तव्य के ज्ञान के स्थान पर लिव इन रिलेशनशिप का ज्ञान वितरित किया जा रहा है | भाई जी लगे रहो 'हिन्दुस्तान भेडिया धसान' अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak

आम-आदमी एक आवारा खुजली खाया कुत्ता ही होता है । वह सदैव ही दूत्‍कारा जाता हैं । एक दम गर्दन से पकड़ा है आपने वास्तविकता को । कभी मजा लेने के लिये सिर्फ कुर्ता पैजामा में (मंहगे वाले में नहीं) बाजार घूम आईये । दुकानदार तक हड़का कर बोलता है । रेट बता कर ऐसे हिकारत से देखेगा मानो कह रहा हो लेना हो तो लो, फालतू चख चख करके टाईम मत खराब करो । इसी तरह पुलिस वाले, सरकारी आफिस का बाबू, या अधिकारी, हर कोई आम आदमी को फालतू की चीज ही समझता है । आम आदमी को इज्जत मिलती है तो चुनाव के वक्त । वो भी वोटर लिस्ट में नाम हो तब । कहां रह गये हम भारतीय । सब अपने अपने द्वीपों मे मस्त हैं । भारतीय बनने में फायदा कम नुकसान ज्यादा है ।

के द्वारा: K M Mishra

स्नेही पारीक जी, लेख की भावना इतनी उभर कर सामने आई है कि आपकी पोस्ट में छिपी भाई जी की व्यथा मैंने छंदबढ़ कर दी, गौर फरमाइएगा- ज़िदगी हो सफर या सफर जिंदगी, हमको हर हाल में बस भटकना ही है; कोशिशें कितनी चाहे करें हम मगर, जिस तरफ भी बहें हमको बहना ही है; क्या पता कौन खेले दिखाई ना दे, जो दिखाई पड़े वो भी मोहरा ही है; हम जिसे माँ बैठे हैं- ईश्वर, खुदा, वो भी बेजान पत्थर का टुकड़ा ही है; वो फलक नेक था, वो जमीं नेक थी, जब नहीं था खुदा तो खुदी नेक थी; जबसे आमद खुदा की हुई धरती पर, तबसे इंसान बिखरा तो बिखरा ही है; बंट गए लोग, खुशियाँ-ओ-गम बंट गए, उसने बांटा हमें और हम बंट गए; ‘कृष्ण’ सोचे, कहे, और समझे यही, उसने भटकाया, हमको भटकना ही है | अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Arvind Pareek

अरविन्द, दिल्ली के बारे में आपने जो लिखा सो ठीक है, परन्तु तथाकथित विश्वस्तरीय शहर banane के चक्कर में इस शहर का जो बेडा गर्क हो रहा है उस पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. विकास के इस अन्ध्धुन्द प्रकल्पों के चलते दिल्ली के शहरी चरित्र का नास किया जा रहा है. मसलन यह एक ऐताहिसिक शहर है जो सात बार बसा और उतनी ही बार उजड़ा. इसकी अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत है. जिसकी अनदेखी की जा रही है. जयपुर को लीजिये सहर के विस्तार के बावजूद उसके करेक्टर को बरक़रार रखा गया है. मैं ने पेरिस, लन्दन व मोस्को भी देख रखे हैं पर उनके विकास प्रकल्पों में इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है की शहर का मूल ऐतिहासिक स्वरुप न बिगड़े. अगर पुराणी दिल्ली के शाजेहना बाद की बात करें तो वहां भी पुराणी हवेलियाँ ख़त्म कर भोंडे मकान बन गए हैं. अतएव सिर्फ सर्कार ही नहीं दिल्लीवासी भी इस विरासत समाप्त करने के लिए जिम्मेदार हैं. जरा सोचिये ३६० ऐतिहासिक अवासेशों की जगह अब कुल मिला कर कोई ६० बच पाए हैं. इन किले, मकबरों, गुम्बदों, सरायों, शिकारगाहों और अन्य ऐतिहासिक इमारतों का पुनरुद्धार करने का ख्याल भी अब ६२ साल बाद कामनवेल्थ खेल की वजह से आया है. जिस तरह इन पुराने स्थापत्य अवाशेसों का काम ठेकेद्दारों द्वारा किया जा रहा है, उसका पता तो दो साल बाद चलेगा जब इन भ्रष्ट लोगों की करतूतें सामने आयेगी. मैंने स्वयं समरकंद व बुखारा में में जा कर देखा है कि ऐतिहासिक निर्माणों के restoration का कार्य कितना बारीकी का है और इसे पूरा करने में कायदे से सालों-साल लगते हैं. और हमारी दिल्ली के ये नौकरशाह इन्हें आनन्-फानन में अंजाम देना चाहते हैं परिणाम सामने आ जायेगा. अब येह कोई और दिल्ली होगी जिसकी आत्मा नदारद होगी. O P Pareek

के द्वारा: omprakash pareek

आदरणीय अरविंद पारीक जी नमस्कार , तथ्यों को रोचक ढंग से प्रस्तुत कर विषय की गंभीरता से सबको परिचित कराने की कला निश्चित रूप से अभिनन्दनीय है. कॉमनवेल्थ गेम्स जैसी प्रतियोगिता का आयोजन केवल व्यापारियों, नौकरशाहों और राजनेताओं को फायदा पहुंचाने के लिए है ना कि आमजन को. जिस देश में आम आदमी की दशा इतनी चिंतनीय है कि उसे यह भी नहीं पता होता आगे कैसे उसे रोटी मिलेगी, रोजगार की कमी और गरीबी की भयावहता देखकर रूह कांप जाती है वहॉ पर कॉमनवेल्थ! यह हास्यास्पद होने के साथ ही देश की जनता का मजाक उड़ाने जैसा है. दिल्ली को पेरिस बनाने की बात कहने वाले केवल अपनी पीढ़ि यों के आराम का इंतजाम कर रहे हैं. देश के साथ विश्वासघात की कहानी कहता है ये आयोजन. व्यवस्था के सभी संचालक एक कुचक्र में फंसा चुके हैं देश को.

के द्वारा: rkpandey

अरविन्द जी, आप जागरण के चार स्तंभों मैं से एक हैं, और इस बात को आपने पुनः साबित कर दिया. आपके लेख आसानी से उन समस्याओं को कुरेद जाते हैं जिन्हें समझा पाना शायद बड़े-बड़ों के बस मैं नहीं. आपके इस लेख मैं कॉमन वेल्थ के बारे मैं पढ़ा. अपने अनुभव को यहाँ बयां करना चाहूँगा, मैं एक अमेचर शिक्षक हूँ, जब कॉमन वेल्थ के बारे मैं अपने विद्यार्थियों से पूछा तो हैरान रह गया की उन्हें सिवाय इसके की ये एक खेल आयोजन है और कुछ नहीं पता. और अब तक मैंने कई लोगों से भारत को मिली आजादी के दुसरे पक्ष मेरा मतलब ट्रांसफर ऑफ़ पावर के बारे मैं पूछा, जवाब नकारात्मक मिला. १० मैं से ९ लोगों को कॉमन वेल्थ का मतलब भी नहीं पता है इस देश मैं. हमें आदत है, अपने मैं मगन रहेने की. JAKM

के द्वारा: Nikhil

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: saday

दो सप्ताह पहले जब आपने मुझे हिन्दीं के साफ्टवेयर के बारे में बताया था व आपके इस ब्लॉग का पता दिया था तभी मैंनें सोच लिया था कि आपका ब्लॉग पढ़कर में जरूर यह प्रोग्राम अपने साइबर कैफे के कम्यूटरों में डालुँगा । पिछले सप्ताह सभी कम्यूटरों में इसका इंस्टालेशन कर दिया है । तीनो लेख उपयोगी है । अब आपको हमारे किसी भी कम्यू्टर में हिन्दी डब्बों के रूप में नहीं दिखेगी । हमारे सभी युजर्स इसे पसंद कर रहे हैं । आपकी यह खोज बहुत ही अच्छी है और प्रयोग में आसान भी है । ऐसी उपयोगी जानकारी देने के लिए धन्यवाद । यह पता चला है कि आप टॉप 10 ब्लॉ‍गर में आ गए हैं । इसके लिए हमारी बधाई । यही दुआ है कि पहला पुरस्कार आपको मिले । कृष्ण बोरा

के द्वारा: कृष्ण बोरा

के द्वारा: Shanu

आपका यह ब्‍लॉग पोस्‍ट पढ़ी तो लगा कि भाईजी सही कह रहे हैं कि - 'मुझे तो यह जानना था कि जागरण वालों ने आपकी कैसी मिट्टी पलीत की है ? आपकों और आपके साथ उन्‍नीस और साथियों को कितनी आसानी से आम और खास में विभक्‍त कर दिया है । आपको तो पता ही है कि यह हमारे समाज की रीति रही है कि जो खास होता है उसे आम लोग हिकारत की नजर से देखते हैं और जो आम होता है उसे खास लोग हिकारत की नजर से देखते हैं । अब आप क्‍या सोचते हैं, आपकी किसी पोस्‍ट पर कोई टिप्‍पणी मिलेगी ? आप जागरणब्‍लॉग का पर्दाफाश पहले ही कर चुके हैं और अब अछूतों की श्रेणी में और आ जाएंगें ।’ इसलिए मैं देख रहा हूँ कि टॉप-20 की लिस्‍ट में आए सभी ब्‍लॉगरर्स की पोस्‍ट पर ये टॉप-20 ब्‍लागरर्स ही आपस में टिप्‍पणियां कर रहे हैं । इनमें से जो टिप्‍पणी नहीं करते उनके ब्‍लॉग को भी कोई टिप्‍पणी नहीं दे रहा हैं । वास्‍तव में आम और खास का विभाजन हो गया है । पुरस्‍कारों के बारे में भाईजी का सुझाव अच्‍छा है । पाठकों की पसंद के अनुसार ही ब्‍लॉग पुरस्‍कृत किए जाएं । भले ही इसके लिए पाठक दैनिक जागरण व जागरण टीवी पर इसका प्रचार कर जुटाये जाएं । आपकी सभी पोस्‍ट अच्‍छी लगी । मेरी रेटिंग तो 1-1 होगी । राहुल

के द्वारा: Rahul Saini

अरविन्द जी, आपका धन्यवाद्.....टॉप-20 में आने की आपको भी बधाई.........वैसे ये एक औपचारिकता भर है.......आपने इतने बड़े व्यक्ति का उदाहरण यहाँ मेरे लिए दिया, मैं तो उस बड़े चमकते सूरज के सामने एक छोटा सी चिंगारी भी नहीं हूँ......वैसे हम आपके भी शुक्रगुजार हैं........हम पहले सिर्फ कवितायेँ ही लिखते थे......आपके लेख में आई प्रतिक्रियाओं ने ही हमें लेख लिखने प्रेरित किया...... मेरी प्रोफाइल फोटो देखकर तो आपको अंदाज़ा हो गया होगा मैं कितनी बड़ी हूँ.......मैं हमेशा उतना बड़ा ही रहना चाहती हूँ....... बिलकुल मासूम, चुलबुली, बिना किसी चिंता के........ समय के बारे में तो मै बस यहीं कहूँगी की दिन में २-३ बार जब भी थोड़ी देर नेट पर बैठती हूँ तो जो भी पढ़ती हूँ, अच्छा लगता है तो उसी समय प्रतिक्रिया दे देती हूँ......... और अपने ब्लॉग पर भी आये प्रतिक्रियाओं का जवाब दे देती हूँ.........अब सामने वाले ने मेहनत की है तो उसे कुछ तो प्रशंसा मिलनी ही चाहिए...... परिवार का प्यार तो हमेशा साथ है और रहेगा, पर परिवार में किसी को भी नहीं पता है कि मै ब्लॉग और कवितायेँ लिखती हूँ और न ही मेरे मित्रों को....... बस मैं और मेरा लैपटॉप.......अक्सर ये बातें लिखते हैं.......

के द्वारा: aditi kailash

के द्वारा: Devendra nagar

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: Arvind Pareek

मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि एक साड़ी पहननें के सवाल ने इतना हल्ला मचा दिया हैं कि तलाक की मांग की जाने लगी । मुझे डाक्टर साहिबा और उनके वकील पर तरस आता है कि वे एक घरेलु विवाद को अदालत तक ले गए । ना जाने कितनी ऐसी लड़कियां होगी जो किसी न किसी प्रकार के पहनावें के बारे में ससुराल वालों से कुछ न कुछ तो अवश्य सुनती होंगी । लेकिन इन बातों पर तलाक की मांग करना निहायत ही मुर्खता पूर्ण बात थी । यह भी सही है कि अदालत की टिप्पणी से इस समस्या का कोई समाधान नही निकला । केवल मामला और उलझ गया है । यह एक अच्छी प्रस्तु्ति हैं । बहन अदिति ने व्यर्थ ही एक अलग ब्लॉग लिखा । खैर इस बहाने टिप्पणियां तो मिली । अनिता वत्स

के द्वारा: Anita Vats

प्रिय श्री कृष्णद निगम जी, आपने संभवत: मेरे आलेख को ध्यान से नहीं पढ़ा । मैंनें आलेख में यह कहीं नहीं कहा हैं कि महिलाओं को साड़ी ही पहननी चाहिए या साड़ी नहीं पहननी चाहिए । मेरा तो सिर्फ इतना कहना है कि जो प्रश्ना तलाक का था क्या अदालत के निर्णय से उसका उत्तर मिला ? क्योंकि साड़ी पहनना कहना क्रुरता है यह भी गलत है तो परिवार के रिवाजों व परंपराओं को न मानना भी तो परिवार के प्रति क्रुरता ही कहलाएगा। अदालत ने तलाक नही मंजूर किया लेकिन क्या इससे उस लेडी डाक्टर का ह्रदय परिवर्तन हुआ या ससुराल का ह्रदय परिवर्तित हुआ ? क्योंकि इस निर्णय के बाद भी स्थिति जस की तस बनी रही । तथापि मेरा मानना है कि जैसा देश वैसा परिधान या आप आज के जमानें में इसे यों भी कह सकते हैं कि जैसा परिवार वैसा परिधान । चूंकि आजकल विवाह से पूर्व ही लड़के-लड़की को एक दूसरे के परिवार के बारे में पता होता है तो मेरा तो यही मानना है कि चूंकि लड़की, लड़के के परिवार को अपनाती है तो उसे उस परिवार की परंपराओं व वेशभूषा को भी अपनाना चाहिए । यदि वहां बुरके का रिवाज है तो बुरका व साड़ी का रिवाज है तो साड़ी पहननी चाहिए । तभी परिवार में कलह नहीं होती। अन्यथा लेडी डाक्टर वाली स्थिति हो जाती है । इसीलिए कहा जाता है कि समायोजन से लड़की परिवार में अपना स्थान बना लेती है व समय बीतने पर अपना कहा मनवा भी लेती है । अन्यथा नए परिवार में कदम रखते ही कलह की स्थिति पैदा कर लेती है । इससे मेरा अभिप्राय यह नही है कि कलह सिर्फ लड़की ही करती है बल्कि जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को दूश्मन समझते है तो कलह तो होगी ही । अरविन्द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

आप सभी की प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यंवाद । लेकिन मैंनें जो प्रश्नों के उत्तर चाहे थे वह सामने नहीं आ रहे हैं । मैंनें पुछा था कि न्या यालय ने तलाक की प्रार्थना ठुकरा कर सही किया या गलत? क्योंमकि जो लड़की ससुराल से छुटकारा चाहती थी और उसके पास तलाक का कोई आधार नहीं था, तो वह साड़ी को तलाक का बहाना बनाती है । ऐसे में साफ है कि उसे तलाक दे देना चाहिए था । क्याड पता अब साड़ी पहनने से वह बहुत लज्जित अनुभव कर रही हों ? अपनी बात को और स्प ष्टब करने के लिए मैं अपनी इस पोस्टत को अपडेट कर रहा हूँ तथा दिनांक 12 मई 2010 के हिन्दी व अंग्रेजी के अखबारों में छपी खबर की कतरन चस्पांह कर रहा हूँ । ताकि आप सभी वास्त विक खबर से रूबरू हो जाएं व अपने-अपने सार्थक विचार दे सकें । जहां तक ब्लॉनग के विषय से इतर विषय पर स्व।स्थ वाद-विवाद के अनुरोध पर मैं तो यहीं कहूँगा कि परिधान व्य क्ति की मानसिकता, आस-पास का माहौल व मौसम से जुड़े होते हैं । किसी को टाई के साथ शर्ट पहनना बेहतर लगता है तो किसी को केवल धोती-कुर्ता या पायजामा पहनना अच्छा लगता है । तो कोई इस गर्मी में भी कोट-पेंट पहने घुमता है । डा. गोविंद की बात से मैं सहमत हूँ और यही कहूँगा कि यदि अनिवार्य कर दिया जाए तो इस मौसम में पुरूष कार्यालयों में धोती-कुर्ता या पायजामा पहनना भी पसंद करेंगें । संसद में पहले कोई भी नेता पेंट शर्ट में नजर नहीं आता था, आज लगभग 25 से 30 प्रतिशत सांसद पेंट शर्ट में नजर आते हैं । लेकिन कोई महिला सांसद अभी तक जींस टॉप में नजर नहीं आई हैं, क्यों ? अरविन्द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

सुश्री आशा रानी शर्मा जी, आपको मेरा ब्‍लॉग पसंद आया व आपने उसका प्रयोग अपने कार्यालय में किया उसके लिए धन्‍यवाद । राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय प्रत्‍येक कार्यालय को इस ब्‍लॉग का संदर्भ दे या न दे यदि हम आपस मे एक दूसरे को यह जानकारी बॉंट लें अर्थात अपने परिचितों को बताएं व वे परिचित आगे अपने परिचितों को बताएं तो अपने आप ही यह जानकारी सभी तक पहूँच जाएगी । हिन्‍दी के फोन्‍ट को हिन्‍दी के ही अन्‍य फोन्‍ट में परिवर्तित करने वाला फोन्‍ट परिवर्तक उपलब्‍ध हैं । इसकी जानकारी व स्‍थापना व प्रयोग के बारे में शीघ्र ही एक ब्‍लॉग प्रस्‍तुत करूँगा । आपसे अनुरोध है कि जागरण के अन्‍य रीडर्स के ब्‍लॉग भी पढ़ें व प्रतिक्रिया दें । आपका पुन: धन्‍यवाद । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: ARVIND PAREEK

प्रिय श्री निखिल सिंह जी, मेरा यहां एकता कपूर का संदर्भ देने का अर्थ यह था कि यह विषय भी अब टेलीविजन पर आ रहे धारावाहिकों में शामिल करने योग्‍य हो गया है । क्‍योंकि एकता कपूर के धारावाहिकों में आम् जिंदगी में घट रही घटनाओं को ही लिया जाता है लेकिन उनका हल केवल टेलीविजन संस्‍कृति वाला सुझाया जाता है । लेकिन आपनें यह बहुत ठीक लिखा है कि साड़ी कोई उलझन भरा परिधान नहीं बल्कि मान-सम्‍मान का परिधान हैं । निस्‍:सन्‍देह मुम्‍बई की वह डॉक्‍टर यदि परिवार के विशेष अवसरों व समारोहों में साड़ी पहन लेती तो संभवत: परिवार भी उसके दैनिक जीवन में अन्‍य परिधान पहननें पर कोई आपत्ति नहीं करता । खैर हाईकोर्ट की टिप्‍पणी क्‍या पता उनके जीवन में खुशहाली ले आए । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: ARVIND PAREEK

नमस्कार अर्विन्द जी! मैने पुरा लेख पडा है लेकिन अंत मे मुझे एक चीज न्ही समझ आयि कि आप सिर्फ एक्ता कपूर की खातिर मेम साह्ब को तलाक दिल्वाने प्एर अडॆ हुए हैं। खैर मे तोह विआहीत हुउ न्ही तो मै शाय्द उन् मेम साह्ब कि बात नहि सम्झ सक्ता हुउ लेकिन भाइसाह्ब की बात एक्दुम सटीक है जो लड्की आज साडी पह्अन्ने मे दिक्क्त मेह्सुस क्र रहि है वो कल को किसी ओर बात पे बत्गन्ड बना सक्त्ती है.. ओर राज श्री फिल्म वालऊ के अंनुसार शादी कोइ गुडे गुडेया का खेल न्ही है। जैसा कि आप्ने शाहीद कपूर अभिनीत 'विवाह' फिल्म मे देखा था। मेरे अनुस्सार तो अदालत ने बहुत सही काम किया है। इस्से सभी मेम साहब जैसी लड्कियोन को सीख्ने को मिलेगा की साडी कोइ उल्झन की चीज या मामुल्ली परिधान नहि है बल्कि एक मान सम्मान का परिधान है। घऩय़वाद| निखिल सिंह, http://jarjspjava.jagranjunction.com/2010/05/18/oss-initiative/

के द्वारा: nikhilbs09

आपकी इस लेख-श्रृंखला ने भारत सरकार के कार्यालयों के बहुत पैसे बचा दिए हैं । क्‍योंकि राजभाषा विभाग ने युनिकोड आधारित फोन्‍ट का प्रयोग अनिवार्य बना दिया है । हिन्‍दी में अलग-अलग कीबोर्ड होने से सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों को भी बहुत कठिनाई होती थी । लेकिन आपकी इस लेख श्रृंखला को पढ़कर मैंनें अपने कार्यालय में इसे स्‍थापित किया हैं व पिछले 15 दिन से इसके प्रयोग के प्रति मैं अपने सभी साथियों को लालायित देख रही हूँ । इस कारण हिन्‍दी में पत्राचार में भी वृद्धि हो रही है । उम्‍मीद करती हूँ कि इसका उपयोग हमारे कार्यालय के लिए अवश्‍य ही लाभदायक बना रहेगा । राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय को प्रत्‍येक कार्यालय को आपके इस ब्‍लॉग का संदर्भ देते हुए एक परिपत्र जारी करना चाहिए । ताकि सभी लाभान्वित हो सके । बिना किसी लागत के इस साफ्टवेयर का लाभ उठा सके । सभी अनुवादकों व हिन्‍दी अधिकारियों एवं राजभाषा से जुड़े सहायक निदेशकों व निदेशकों आदि को भी इसे पढ़ना चाहिए । इतने बढि़या साफ्टवेयर से परिचय करवाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद । क्‍या कोई हिन्‍दी के फॉन्‍ट को बदलने वाला साफ्टवेयर भी है । यदि उसकी जानकारी दे सकें तो मैं आपकी आभारी रहूँगी । आशा रानी शर्मा

के द्वारा: आशा रानी शर्मा

के द्वारा: Arvind Pareek

सुश्री सोनी जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद । मैंनें जिस उद्देश्‍य से ब्‍लॉग लिखा था वह था जागरण के वेतनभोगी लिक्‍खाड़ों को रीडर्स के ब्‍लॉग पढ़ने के लिए उत्‍सुक करना तथा रीडर्स के ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी करना । लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है । जहां तक किसी ब्‍लॉग रचना की बात है । कहीं क्‍यों क्लिक हो जाती है और कहीं क्‍यों नहीं तो इसका कारण जागरण ब्‍लॉग पर जागरण के वेतनभोगी लिक्‍खाड़ तथा रीडर्स जो ब्‍लॉग लिख रहे हैं वे ही अधिक विजिट करते हैं । या फिर ब्‍लॉग लेखक के परिचित ही अपने परिचित के ब्‍लॉग पर विजिट कर रहे हैं । यदा कदा आने वाले विजिटर्स व अपरिचित विजिटर्स न के बराबर है । इसलिए ब्‍लॉग का क्लिक होना या न होना भी इस पर निर्भर करता है । इसी तरह जागरण भी केवल परिचित लेखकों को ही पहले प्रश्रय देता है । यह तो पत्रकारिता जगत का दस्‍तुर ही है । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: saday pareek

प्रिय श्री मनोज जी, कम शब्दों में लिखी टिप्पणी की समस्या यह है कि कहा कुछ जाए और समझा कुछ जाए । मैंनें आप पर कोई आरोप या आपके ब्लॉग पर कोई टिप्प‍णी नहीं की थी । केवल इतना ही कहा था कि ‘’आपसे यदि जागरण के सहयोगी परिचित है तभी आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करते हैं अन्यथा मुझे तो कोई टिप्पणी नजर नहीं आई ।‘’ यहां मेरा आपसे से अभिप्राय यह था कि किसी रीडर्स के ब्लॉग पर अपवाद स्वपरूप यदि जागरण के लिक्खाड़ टिप्पणी करते हैं तो वे अवश्य उनके परिचित होंगें । क्योंकि मैं केवल सर्फ करने पर यह समझ पाया हूँ कि मैंनें किसी जागरण वाले की टिप्प‍णी रीडर्स ब्लॉंग में नहीं देखी । जहां तक कोई भी लेखक टिप्पणियों के लिए नहीं लिखता की बात है तो मेरे भाई यदि आत्मसंतुष्टि के लिए ही लिखते हैं तो फिर बेव पर समय क्यों बर्बाद करते हैं । मेरा तो मानना है कि यदि हम कुछ सार्वजनिक कर रहे हैं तो केवल इस अपेक्षा के साथ कि सभी देखे व टिप्पणी दें । अरविन्द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: rajatraj

अरविन्द जी आपने एकदम सही बात उठाई है .. मुझे लगता है की जागरण ब्लोग्स को इसलिए रखा गया है ताकि जागरण के लोग को इससे अलग रखा जाये........... वैसे ये गलत ही है ...मै आपसे सहमत हु ....और मैंने कई बार देखा है की जागरण ब्लोग्स में जिन कुछ ऐसे स्तरहीन ब्लोग्स आ जाते है जिन्हें नहीं होना चाहिए उस जहग पे...ये एक सुझाव भी है .जागरण को इसपे सोचना चाहिए..... ये जागरण के लिए बेहतर होगा........ सभी को सामान मौका.... ये विभाजन कुछ उचित नहीं लगता ....... या हो सकता है जागरण की टीम के लोगो का मन रखने के लिए उन्हें अलग कर दिया गया हो ताकि वे भी अपनी फोटो फीचर्ड करसके क्योकि जागरण टीम के कुछ ब्लोग्स को हटा दे तो उनसे बहुत ज्यादा बेहतर ब्लोग्स रीडर्स द्वारा पोस्ट किये जाते है ... अगर दोनों बराबर हो गए तो जागरण के लिक्खाडो का क्या होगा .....................

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: Dr. Ramesh Govind

नेताओं और वीआईपी से भरे देश में कोई कॉलेज किसी अनजान किंतु संघर्ष कर बुलंदियों पर पहूँचे यूवा को मुख्य अतिथ्रि बनाएगा । इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था । क्योंकि हमारे देश का चलन तो यह हैं कि राजा का बेटा राजा होता है जैसे नेहरू/गांधी परिवार के बच्चे । जिनमें कोई विशेष योग्यंता नहीं हैं फिर भी वे किसी भी समारोह में वीवीवीवीवीआईपी होते है । यदि जैड प्लस सुरक्षा ही वीआईपी होने का पैमाना है व योग्यता की कोई कीमत नहीं है तो इस देश का भगवान ही मालिक है । क्रिस्तु जंयती कॉलेज, बंगलौर के प्राचार्य महोदय को मेरी बहुत-बहुत बधाई । आपको भी एक अच्छे विषय पर सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई ।

के द्वारा: Krishan Nigam

इसे कहते है ब्लॉलग । जो पढ़े बस मुस्क।राएं । इसलिए आपसे आज्ञा लिए बिना मैंनें आपका ब्लॉेग ब्लाएगवाणी में प्रस्तुेत कर दिया है । जिसका लिंक है - आप जब भी नया ब्लॉ ग लिखे इस पर क्लिक कर दें । इससे मुझे वह ब्लॉ>ग वाणी में दिख जाएगा । आशा है अपने प्रशंसक के लिए इतना अवश्यख करेंगें ।

के द्वारा: Sday

के द्वारा: indu

प्रिय बंधु क्या आपने कन्ट्रोल पैनल में पहले लैंगवेज टैब पर क्लिक करने के उपरांत सप्लीमेंटल लैंगवेज सपोर्ट का पहला आप्शन टिक किया हैं तथा इसके बाद दिए गए डाउनलोड लिंक से हिन्दी इंडिक आईएमई प्रोग्राम की जिप फाईल डाउनलोड की हैं और उसे इंस्टाल किया है ? इसके पश्चात् एक बार फिर कन्ट्रोल पैनल में लैंगवेज टैब पर क्लिक करने के उपरांत डिटेल्स पर क्लिक कर इन्पूट लैंगवेज में हिन्दी् का चयन कर कीबोर्ड/लेआउट में हिन्दी इंडिक आईएमई का चयन किया है तो 27 मार्च 2010 के लेख-1 में दर्शाए अनुसार आपको एमएस वर्ड खोलकर पहले सफेद स्थान पर क्लिक करना है तत्पश्चा त दायें हाथ पर नीचे दिख रहे ईएन के निशान पर क्लिक कर हिन्दी का चयन करना हैं । यदि अभी भी कोई समस्या है तो निस्सकोंच लिखें । लेकिन यह भी स्पष्ट करें कि आपने लेख में बताई गई प्रत्येक क्रिया को पूर्ण किया है अथवा नहीं । तथा क्या अंत में टास्क बार अर्थात डेस्क टॉप पर नीचे दिखने वाले बार में इएन दिख रहा है अथवा नहीं । यदि नहीं तो आप उक्त बार पर राईट क्लिक कर टूलबार आप्श्न से होते हुए लैंगवेज बार का चयन करें तब उक्त इएन डेस्काटॉप पर दिखेगा । अरविन्द पारीक

के द्वारा: ARVIND PAREEK

के द्वारा: deepak joshi

के द्वारा: Rajeev

के द्वारा: Rajeev

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: Saday

के द्वारा: Pramod




  • ज्यादा चर्चित
  • ज्यादा पठित
  • अधि मूल्यित